ISRO निजीकरण विवाद: असली तस्वीर क्या है और इसके क्या मायने हैं?
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भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को लेकर इस समय एक अहम बहस खड़ी हो गई है. क्या ISRO धीरे-धीरे निजीकरण की ओर बढ़ रहा है?
यह सवाल अचानक नहीं उठा. 4 सितंबर 2026 को ISRO के नौ कर्मचारी संगठनों ने अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती निजी भागीदारी और खास तौर पर लॉन्च व्हीकल के निर्माण को निजी क्षेत्र या PSU को सौंपे जाने की दिशा पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा.
कर्मचारी संगठनों की चिंता की एक बड़ी वजह IN-SPACe के चेयरमैन पवन गोयनका का वह बयान था, जिसमें उन्होंने कहा था कि भविष्य में ISRO लॉन्च व्हीकल नहीं बनाएगा. इसके बाद ISRO चेयरमैन वी.
नारायणन ने कर्मचारियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि ISRO का निजीकरण नहीं हुआ है और कर्मचारियों को अपने रोजगार और भविष्य को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है.
उन्होंने साफ किया कि निजी क्षेत्र को आगे लाने का उद्देश्य ISRO की भूमिका कम करना नहीं, बल्कि भारत के पूरे स्पेस इकोसिस्टम की क्षमता को कई गुना बढ़ाना है.
यहीं से इस पूरे विवाद को समझने की शुरुआत होती है.
पहला सवाल, क्या ISRO का सचमुच निजीकरण हो रहा है?
सीधा जवाब है मौजूदा घोषित नीति के आधार पर इसे ISRO का निजीकरण कहना सही नहीं होगा.
निजीकरण का सामान्य अर्थ किसी सरकारी संस्था के स्वामित्व, नियंत्रण या मूल संचालन को निजी हाथों में देना होता है.
अभी ऐसा कोई घोषित फैसला सामने नहीं है जिसमें ISRO को निजी संस्था बनाने या उसका सरकारी नियंत्रण खत्म करने की बात हो.
बल्कि सरकार की मौजूदा नीति का जोर Space Sector Reforms के तहत निजी कंपनियों और Non-Government Entities यानी NGEs को अंतरिक्ष क्षेत्र की पूरी वैल्यू चेन में प्रवेश देने पर है.
इसलिए मौजूदा बदलाव को ज्यादा सटीक तरीके से ऐसे समझा जा सकता है, ISRO खत्म नहीं हो रहा है, बल्कि ISRO की पारंपरिक भूमिका का पुनर्गठन हो रहा है.
और यही बदलाव आज की पूरी बहस का केंद्र है.
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📡 स्रोत: ABP Live