जबलपुर- दो दिवसीय नर्मदा महोत्सव के समापन पर बिखरे कला, संस्कृति, सुर और संगीत के रंग
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संगमरमरी सौंदर्य के लिए दुनियाभर में मशहूर भेड़ाघाट में दो दिवसीय नर्मदा महोत्सव के समापन पर शास्त्रीय नृत्य, भजन गायन एवं पारंपरिक वाद्य यंत्र ढ़ोल-ताशा का श्रोताओं और कला रसिकों ने जमकर आनंद उठाया। शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की दूधिया रोशनी से नहाई भेड़ाघाट की संगमरमरी वादियों का सौंदर्य भी आज प्रकृति-प्रेमियों के लिए अद्भुत नजारा पेश कर कर रहा था।
नर्मदा महोत्सव के दूसरे दिन के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मुख्य आकर्षण इंडियन आयडल फेम मुंबई की अरुणिता कांजीलाल और सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका ऋचा शर्मा द्वारा भजनों का गायन था। परम्परागत रूप से नर्मदा पूजन के बाद शुरू हुए दूसरे दिन के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आगाज त्रिभंग कला अकादमी, जबलपुर की सुश्री कौतुकी उपाध्याय द्वारा कत्थक शैली में शिव स्तुति की प्रस्तुति से हुआ।
इसके तुरंत बाद महाराष्ट्र की शिवमुद्रा संस्था के कलाकारों की ढ़ोल-ताशा की जोशीली और मनमोहक प्रस्तुति ने श्रोताओं में उत्साह का संचार कर दिया। ढ़ोल और ताशा महाराष्ट्र के प्रसिद्ध वाद्ययंत्र हैं जो मुख्य रूप से दशहरा, नवरात्रि, गुड़ीपड़वा और अन्य बड़े सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में बजाये जाते हैं।
लोक निर्माण राकेश सिंह ने नर्मदा महोत्सव को सांसांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक बताया है। लोक निर्माण मंत्री श्री सिंह ने दो दिनों के नर्मदा महोत्सव के समापन दिवस पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या से वर्चुअली जुड़कर सभी को शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं दीं।
श्री सिंह ने कहा कि 23 वर्षों से निरंतर आयोजित किये जा रहे इस महोत्सव को और अधिक भव्य एवं यादगार बनाने के साथ पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में निरंतर प्रयास किए जायेंगे, ताकि नर्मदा तट की सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सुंदरता देश-दुनिया तक पहुंचे। राज्यसभा सांसद सुमित्रा वाल्मीकि ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि शरद पूर्णिमा की रात मां नर्मदा की लहरों को निहारना और उनकी अनुपम छटा का आनंद लेना आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करता है।
मां नर्मदा के प्रति श्रद्धा और आस्था हमारी सनातन परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने भेड़ाघाट की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्ता का उल्लेख करते हुए चौसठ योगिनी मंदिर और पुराने संसद भवन से जुड़े अपने अनुभव भी साझा किए।