जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा है कि हाल के दिनों में आई कई प्राकृतिक आपदाओं से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ठोस प्रयास जरूरी हैं। नई दिल्ली में पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता के भविष्य पर आयोजित सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय जलवायु जोखिम को लेकर गंभीर चेतावनी दे रहा है।
उन्होंने स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर सभी पक्षों के बीच सक्रिय सहयोग मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। राष्ट्रपति ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से जैव विविधता में कमी, जल संकट और भूमि क्षरण जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि जल संकट वाले क्षेत्रों में कृषि जल-संरक्षण इकाइयाँ स्थानीय समुदायों के लिए उपयोगी हो सकती हैं।
राष्ट्रपति मुर्मु ने पर्यावरण संबंधी कानूनी मामलों में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि न्यायाधिकरण ने बड़ी संख्या में मामलों का तेजी से निपटारा किया है और नदियों, वायु गुणवत्ता तथा कचरा प्रबंधन से जुड़े मामलों में प्रभावी अनुपालन व्यवस्था विकसित की है।
केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल, सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित किया।
💡 पृष्ठभूमि (Background)
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का बयान है। यह विषय वैश्विक पर्यावरणीय संकट और उसकी तात्कालिकता को दर्शाता है। यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सरकार की ओर से जलवायु जोखिमों पर गंभीर चेतावनी को स्वीकार करती है और नीति निर्धारण में बदलाव का संकेत देती है। आम जनता पर इसका असर यह है कि जलवायु अनुकूलन और संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ेगी, जिससे आपदाओं से निपटने की क्षमता और जीवन-यापन की सुरक्षा में सुधार संभव है।