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जमुई कांड-10 दिन से कमरे से नहीं निकले छात्र-छात्रा:स्कूल-ट्यूशन बंद, दोस्तों से दूरी, सोशल मीडिया से किनारा; परिवार बोले-मेंटल स्टेटस संभलने में टाइम लगेगा

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 3 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
जमुई कांड-10 दिन से कमरे से नहीं निकले छात्र-छात्रा:स्कूल-ट्यूशन बंद, दोस्तों से दूरी, सोशल मीडिया से किनारा; परिवार बोले-मेंटल स्टेटस संभलने में टाइम लगेगा

19 सितंबर की शाम जमुई के मड़वा पहाड़ पर हुई घटना को 10 दिन बीत चुके हैं। पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। SIT लगातार मामले की जांच कर रही है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो को हटाने की कार्रवाई भी हुई है, लेकिन इस पूरे कांड का असर अब तक दोनों बच्चों की लाइफस्टाइल पर दिखने लगा है।

घटना के बाद से छात्र और छात्रा करीब 10 दिन से घर से बाहर नहीं निकले हैं। स्कूल-ट्यूशन जाना बंद है। दोनों ने फोन से भी दूरी बना रखी है। परिवार का कहना है कि 'जब भी वे इंस्टाग्राम या फेसबुक खोलते हैं, उनकी आंखों के सामने वही वीडियो आ जाता है। इसकी वजह से वे फिर से मेंटली डिस्टर्ब हो जाते हैं।

दोनों बच्चों का ज्यादातर समय कमरे के अंदर ही बीत रहा है। नॉर्मल लाइफस्टाइल में लौटने में अभी समय लगेगा, लेकिन बच्चों के पास टाइम कम है। 2 महीने बाद प्री-बोर्ड है और फिर फरवरी-मार्च 2027 में बोर्ड। पढ़ाई के लिए ज्यादा समय नहीं बचा है।' साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर निधि सिंह ने बताया, 'फैमिली वालों को अभी बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा टाइम स्पेंड करना चाहिए।

उन्हें अकेले नहीं छोड़ना चाहिए, जिससे की उनका ट्रामा कम होता जाए। ट्रामा बढ़ेगा तो कुछ गलत कदम भी उठा सकते हैं। इसी वजह से अभी छात्र-छात्रा का अच्छे से केयर करें। उन्हें कमरे में अकेले न रहन दें। सोते वक्त भी साथ रहें।' पहले दोनों की कुछ फोटो देखिए… छेड़खानी से लड़कियों की जिंदगी में क्या ट्रामा आता है?

आगे की लाइफ में किस तरह की परेशानी होती है?

जिस लड़के के साथ मारपीट हुई वो किन बातों से डर रहा है? 10वीं क्लास में स्कूल-कोचिंग बंद होने से पढ़ाई पर क्या असर पड़ेगा? इन बातों पर साइकलॉजिस्ट का क्या कहना है?

इन सारे सवालों के जवाब यहां पढ़िए… पहले स्कूल-ट्यूशन से सुबह की होती थी शुरुआत छात्र-छात्रा के पेरेंट्स का कहना है, घटना से पहले बच्चों की लाइफस्टाइल नॉर्मल थी। दोनों की सुबह 6-6.30 बजे के करीब नींद खुल जाती थी। इसके बाद वे तैयार होते थे और 7.30 तक स्कूल के लिए निकल जाते थे। इस बीच घरवालों से बातें भी हो जाती थीं और ब्रेकफास्ट भी हो जाता था।

जिस दिन स्कूल नहीं होता था, उस दिन सुबह ट्यूशन के लिए चले जाते थे। घटना से पहले बच्चों का फोकस पूरी तरह से पढ़ाई पर था। इस बार 10th में रहने के कारण स्कूल में एक्स्ट्रा क्लासेस भी चलती थी। दोपहर करीब 2 बजे स्कूल की छुट्टी होने के बाद एक घंटे तक एक्स्ट्रा क्लास होती थी। कई बार समय कम होने पर बच्चे स्कूल से सीधे ट्यूशन चले जाते थे।

छात्र के परिजन ने बताया- स्कूल, ट्यूशन और सेल्फ स्टडी मिलाकर वह करीब 14 से 15 घंटे पढ़ाई करता था। ज्यादातर समय पढ़ाई और इससे जुड़ी गतिविधियों में ही व्यस्त रहता था। दिनभर की हर छोटी-बड़ी बात वह रात में खाना खाते समय हमलोगों को बताता था। हमलोगों से उसका ऐसा जुड़ाव था कि वह कोई बात हमसे छिपाता नहीं था।

लड़के की मां ने बताया, वह शुरू से ही दूसरों की मदद करने वाला इंसान बनना चाहता है। उसका सपना बिजनेसमैन बनने का है। वह अक्सर कहता है, बड़ा होकर अपना बिजनेस खड़ा करेगा और ज्यादा से ज्यादा लोगों को नौकरी देगा। घटना के बाद देर से उठना, पूरा दिन कमरे में ही बिताना 19 सितंबर को भी दोनों हर दिन की तरह स्कूल गए थे।

इसके बाद घर लौटे और करीब 4 बजे ट्यूशन के लिए निकले। शाम 6 बजे तक क्लास करने के बाद मौसम अच्छा देखकर घूमने का प्लान बनाया। दोनों मड़वा पहाड़ की तरफ गए, लेकिन वहां से लौटते वक्त उनके साथ घटना हुई। पेरेंट्स का कहना है, घटना के बाद से दोनों बच्चे सामान्य तरीके से दिन नहीं बिता पा रहे हैं।

सुबह समय पर उठने की जगह अब 9-10 बजे के बाद उठते हैं। कमरे से बाहर निकलने में भी इंटेस्ट्र नहीं दिखाते हैं। लड़की की मां ने बताया, सुबह नाश्ते के लिए पूछने पर कई बार वो मना कर देती है। खाने और पढ़ाई में भी पहले जैसी रुचि नहीं दिखा रही है। मैं अपने भाई-भाभी और उनके बच्चों को भी घर पर बुलाई हूं ताकि मेरी बेटी का माइंड उस घटना से डाइवर्ट हो जाए।

घर पर ज्यादा लोग रहेंगे तो शायद बातें करने से उसका मन लग जाए। पहले तो मैं चाहती हूं, वो पूरी तरह से उस घटना से बाहर निकले और अपने पढ़ाई पर फोकस करे। हमलोग कई बार उसे जबरदस्ती कमरे से बाहर निकालकर हंसाने की कोशिश करते हैं, लेकिन 5-10 मिनट बैठने के बाद वो फिर से उसी जोन में चली जाती है।

TV-फोन से दूर रख रहे, बैक टू नॉर्मल लाइफ में लाने की कोशिश दोनों के पेरेंट्स का कहना है, अभी हम यही ध्यान दे रहे हैं कि बच्चों को अकेले न छोड़ें। साथ ही उनलोगों को जितना फोन, सोशल मीडिया और टीवी से दूर रख सकें उतना उनलोगों के लिए बेस्ट होगा। परिजन का कहना है, घटना के बाद बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हुई है।

स्कूल और ट्यूशन बंद हैं। दोस्तों से मिलना-जुलना भी बंद है। अभी हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि बच्चों को बैक टू नॉर्मल लाइफ में कैसे लाना है। अब पढ़िए इस मामले पर साइकोलॉजिस्ट का क्या कहना है… कमरे में रहने से डिप्रेस होंगे बच्चे, गलत कदम उठा सकते हैं साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर निधि सिंह ने बताया, अगर बच्चे पूरा दिन कमरे में रहें और किसी से बात न करें तो इसका उनकी मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ सकता है।

ऐसी स्थिति में बच्चों के अंदर डिप्रेशन, गुस्सा, चिड़चिड़ापन, शर्मिंदगी, गिल्टी फील और खुद को दूसरों से कम समझने जैसी फीलिंग्स आ सकती हैं। उन्हें लग सकता है कि उन्होंने कुछ गलत किया है और इसी वजह से उन्हें अकेले रहना पड़ रहा है। खासकर कम उम्र में स्कूल जाना, दोस्तों से मिलना, खेलना-कूदना और अलग-अलग एक्टिविटीज में हिस्सा लेना बहुत जरूरी होता है।

दोस्तों और आसपास के लोगों से बातचीत के जरिए बच्चे अपनी बातें शेयर करते हैं। इससे घरवालों को भी पता चलता रहता है कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है, लेकिन अगर बच्चा इन सबसे कट जाए और लगातार अकेले कमरे में रहने लगे तो उसके मन की स्थिति समझना मुश्किल हो जाता है। जमुई में बच्चों के साथ जो घटना घटी है, ऐसे में दोनों के देखने का नजरिया और दुनिया को लेकर उनकी सोच बदल सकती है।

ट्रॉमा के बाद कई तरह की नेगेटिव फीलिंग्स मन में आ सकती हैं। कुछ मामलों में बच्चा खुद को चोट पहुंचाने या कुछ गलत करने की स्थिति में भी जा सकता है, इसलिए ऐसी स्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस समय परिवार के अलावा किसी पर नहीं करेंगे भरोसा इस समय परिवार, केयरगिवर्स और बच्चे के भरोसेमंद लोगों की भूमिका बहुत अहम होती है।

बच्चे की बात को गलत बताने या उस पर शक करने की जगह उसकी बात ध्यान से सुननी चाहिए। उसे यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि परिवार उसके साथ है, उसकी बात सुनी जा रही है और उसे समझने की कोशिश की जा रही है। हम सभी सोशल लोग हैं। लंबे समय तक लोगों से कटकर और अकेले रहने से मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ सकता है।

ट्रॉमा से गुजर रहे छात्र-छात्रा के लिए यह स्थिति और ज्यादा संवेदनशील होती है। ऐसे में परिवार का साथ, भरोसेमंद लोगों से बातचीत और जरूरत पड़ने पर साइकोलॉजिस्ट की मदद लेना बहुत जरूरी है। घटना के तुरंत बाद दिख सकते हैं ये असर अगर बच्चा अपनी बात बताता है और लोग उस पर भरोसा नहीं करते, उसकी बात को गलत बताते हैं या उसे ही दोष देने लगते हैं, तो उसका मानसिक तनाव और बढ़ सकता है।

उसे शर्मिंदा किया जाए, उसका मजाक बनाया जाए या उसे बार-बार वही घटना बताने के लिए मजबूर किया जाए तो परेशानी और बढ़ सकती है। घटना के बाद बच्चे बार-बार बीमार पड़ सकते हैं या शरीर से जुड़ी दूसरी परेशानियां महसूस कर सकते हैं। पढ़ाई में ध्यान लगाने में दिक्कत हो सकती है। किसी बात पर ध्यान केंद्रित करने और चीजों को याद रखने में भी परेशानी आ सकती है।

कई बार बच्चे को ऐसा लग सकता है कि उसका दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा है और वह कुछ सोच या समझ नहीं पा रहा है। घटना के बारे में बार-बार पूछे जाने पर बच्चा हर बात याद न रख पाए, यह भी संभव है। डर या घबराहट की वजह से वह उस समय कुछ बातें बता न पाए या बिल्कुल चुप हो जाए, इसलिए परिवार या आसपास के लोगों को बार-बार घटना के बारे में सवाल करने से बचना चाहिए।

कई बच्चों को घटना की तस्वीरें बार-बार याद आ सकती हैं। रात में डरकर नींद खुल सकती है, बुरे सपने आ सकते हैं या अचानक घबराहट होने लग सकती है। उनके व्यवहार और मूड में भी बदलाव आ सकता है। वे बहुत गुस्सा करने लग सकते हैं, बहुत उदास रह सकते हैं या छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़े हो सकते हैं। कुछ बच्चे अपनी उम्र से छोटे बच्चे की तरह व्यवहार करने लगते हैं।

उनके अंदर खुद को लेकर बुरा महसूस करने की भावना भी बढ़ सकती है। उन्हें अपनी पहचान, अपनी अहमियत और अपने शरीर को लेकर नकारात्मक सोच आने लग सकती है। गंभीर मामलों में बच्चा खुद को चोट पहुंचाने या आत्महत्या के बारे में सोच सकता है। कुछ बच्चे लोगों से बिल्कुल कटने लगते हैं। उन्हें दूसरों पर भरोसा करने में डर लग सकता है और लग सकता है कि कोई भी उन्हें धोखा दे सकता है।

इसका असर परिवार, दोस्तों और दूसरे करीबी लोगों के साथ उनके रिश्तों पर भी पड़ सकता है। आगे चलकर भी रह सकता है असर साइकोलॉजिस्ट के मुताबिक, ऐसी घटना का असर लंबे समय तक भी रह सकता है। कुछ लोगों में बाद में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसी परेशानी हो सकती है। चिंता, डिप्रेशन और शरीर से जुड़ी परेशानियां भी लंबे समय तक रह सकती हैं।

बड़े होने के बाद दोस्ती या दूसरे करीबी रिश्ते बनाने में भी दिक्कत आ सकती है। किसी पर भरोसा करने में परेशानी हो सकती है। अपनी पहचान और खुद को लेकर भी उलझन बनी रह सकती है। आगे चलकर जब वे खुद माता-पिता बनते हैं तो बच्चों की परवरिश को लेकर भी कुछ परेशानियां सामने आ सकती हैं। कुछ लोग अपने तनाव और परेशानी से बचने के लिए गलत तरीके अपना सकते हैं।

इनमें नशे का सहारा लेना या गुस्से में हिंसक व्यवहार करना शामिल हो सकता है। अगर घटना बचपन या किशोर उम्र में हुई हो तो शरीर और अपने रूप-रंग को लेकर भी लंबे समय तक चिंता बनी रह सकती है। उन्हें अपने शरीर को लेकर शर्मिंदगी या नापसंदगी महसूस हो सकती है। इसलिए ऐसी घटना के बाद बच्चे को अकेला छोड़ देने के बजाय उसके साथ रहना, उसकी बात सुनना और उस पर भरोसा करना जरूरी है।

परिवार और भरोसेमंद लोगों का साथ मिलने से बच्चे को इस मुश्किल दौर से बाहर आने में मदद मिल सकती है। जरूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक की मदद भी लेनी चाहिए।

📡 स्रोत: NewsData.io

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