इतिहास

झांसी का किला: चार सौ साल पुरानी इन दीवारों ने क्या-क्या देखा है? पत्थरों में दबी है एक रानी के शौर्य की अमर कहानी

लेखक: Ranu Parihar अंतिम अपडेट: 30 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
झांसी का किला: चार सौ साल पुरानी इन दीवारों ने क्या-क्या देखा है? पत्थरों में दबी है एक रानी के शौर्य की अमर कहानी

1613 में राजा बीर सिंह देव ने बनवाया था बंगरा पहाड़ी पर यह दुर्ग, 'झिंसी' से कैसे बना झांसी, जानिए मराठों से लेकर लक्ष्मीबाई तक का पूरा इतिहास आज ड्रोन से जब आप झांसी के इस विशाल किले को देखते हैं, तो पहली नजर में सिर्फ पत्थर दिखाई देते हैं।

ग्रेनाइट की मजबूत चट्टानों पर खड़ी ऊंची-ऊंची प्राचीरें, कंगूरे, बुर्ज और एक के बाद एक दस विशाल दरवाजे। लेकिन ये सिर्फ दीवारें नहीं हैं। ये चार सौ साल के इतिहास की मूक गवाह हैं।

इन दीवारों ने राजाओं का अहंकार देखा है, रानियों की दूरदर्शिता देखी है, मुगलों के हमले देखे हैं, मराठों का पराक्रम देखा है और सबसे बढ़कर... एक विधवा रानी को तलवार उठाकर अंग्रेजी हुकूमत को ललकारते हुए देखा है। सवाल वही है जो हर पर्यटक के मन में आता है - आखिर इस किले को यहां बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसे किसने बनवाया?

और बलवंतनगर कैसे बन गया झांसी? आइए, इन दीवारों की जुबानी ही इस कहानी को सुनते हैं। कहानी की शुरुआत - जब यह झांसी नहीं, बलवंतनगर था इतिहास के पन्ने पलटिए तो 17वीं सदी की शुरुआत में यह पूरा इलाका बुंदेलखंड का हिस्सा था। इसका नाम था बलवंतनगर। यह ओरछा रियासत के अधीन आता था। ओरछा उस समय बुंदेलों की सबसे शक्तिशाली रियासत थी।

ओरछा की गद्दी पर तब बैठे थे महाराजा बीर सिंह देव जूदेव। बुंदेला वंश के सबसे प्रतापी राजाओं में से एक। इतिहासकार बताते हैं कि बीर सिंह देव न केवल एक कुशल योद्धा थे, बल्कि महान निर्माता भी थे। ओरछा का प्रसिद्ध जहांगीर महल, मथुरा का केशवराय मंदिर, इन सबका निर्माण उन्हीं के काल में हुआ।

सामरिक दृष्टि से बलवंतनगर बहुत महत्वपूर्ण था। उत्तर भारत से दक्षिण की ओर जाने वाला मार्ग यहीं से गुजरता था। बुंदेलखंड की रक्षा के लिए एक मजबूत सैन्य चौकी की जरूरत थी। इसी जरूरत को समझते हुए राजा बीर सिंह देव ने 1613 ईस्वी में बंगरा नाम की ऊंची पहाड़ी पर एक अभेद्य किला बनवाने का निर्णय लिया।

पहाड़ी की ऊंचाई, उसके चारों ओर ग्रेनाइट की प्राकृतिक चट्टानें... यह स्थान किले के लिए सबसे उपयुक्त था। कारीगर लगे, मजदूर लगे और देखते ही देखते एक ऐसा किला खड़ा हो गया, जिसे भेदना दुश्मन के लिए लगभग असंभव था। नामकरण की लोककथा - 'झिंसी-झिंसी' से झांसी कैसे बना?

इतिहास में तथ्य होते हैं और साथ में लोककथाएं भी चलती हैं, जो किसी जगह को और भी रोचक बनाती हैं। झांसी के नाम को लेकर भी एक ऐसी ही बेहद खूबसूरत लोककथा बुंदेलखंड में आज भी सुनाई जाती है। कहा जाता है कि जब किला बनकर तैयार हो गया, तो एक दिन राजा बीर सिंह देव अपनी रानी के साथ ओरछा के किले की छत पर खड़े थे।

वहां से दूर बंगरा पहाड़ी पर बना अपना नया किला उन्होंने रानी को दिखाया और गर्व से कहा, "रानी साहिबा, देखिए... मेरा नया किला कैसा बना है!" रानी ने दूर पहाड़ी पर बने किले को ध्यान से देखा।

धूप के कारण किले की परछाई और उसकी धुंधली आकृति देखकर रानी ने बुंदेली में जवाब दिया, "महाराज... वहां तो कुछ झिंसी-झिंसी सा दिखाई दे रहा है।" बुंदेली बोली में 'झिंसी' शब्द का अर्थ होता है - धुंधला, छाया या परछाईं।

कहा जाता है कि रानी के मुंह से निकले इसी शब्द 'झिंसी' के कारण उस स्थान का नाम झिंसी पड़ गया, जो धीरे-धीरे बदलते हुए झांसी हो गया। क्या सच में एक रानी के एक वाक्य से शहर का नाम पड़ गया? इतिहासकार इस पर एकमत नहीं हैं। कुछ इसे सिर्फ लोककथा मानते हैं।

लेकिन यही तो भारत के इतिहास की खूबसूरती है कि यहां तथ्य और किवदंती दोनों साथ-साथ चलते हैं और मिलकर किसी स्थान की पहचान बनाते हैं। इतिहास ने करवट ली - छत्रसाल और बाजीराव का अध्याय किला बन गया, झांसी बस गई। लगभग एक सदी तक सब शांत रहा। फिर 18वीं सदी में बुंदेलखंड की राजनीति में बड़ा भूचाल आया। 1729 का साल था।

मुगल सम्राट मुहम्मद शाह रंगीला के शक्तिशाली सूबेदार मोहम्मद खान बंगश ने बुंदेलखंड के सबसे बड़े नायक महाराजा छत्रसाल बुंदेला पर आक्रमण कर दिया। छत्रसाल बुंदेला उम्रदराज हो चुके थे और बंगश की विशाल सेना के सामने अकेले पड़ गए थे।

मुश्किल की इस घड़ी में छत्रसाल ने अपने दामाद कहे जाने वाले मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम को एक मार्मिक पत्र लिखा। कहा जाता है कि उन्होंने लिखा था - "जो गति गज की ग्राह ने पकड़ी, सो गति आज हमारी है, बाजी जात बुंदेलन की, बाजी राखो हमारी है।"

पेशवा बाजीराव प्रथम, जो अपनी तेज घुड़सवारी और युद्ध कौशल के लिए जाने जाते थे, तुरंत मदद के लिए आए। उन्होंने न सिर्फ बंगश को बुंदेलखंड से खदेड़ दिया, बल्कि उसे बुरी तरह पराजित किया। इस मदद से अभिभूत होकर महाराजा छत्रसाल ने 1731 में अपनी मृत्यु से पहले अपने राज्य का एक तिहाई हिस्सा पेशवा बाजीराव को सौंप दिया।

इस हिस्से में झांसी, सागर, कालपी और हटा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल थे। यहीं से झांसी के इतिहास में मराठा काल की शुरुआत हुई। मराठा सूबेदारों का दौर - शंकरगढ़ का निर्माण मराठों के लिए झांसी उत्तर भारत में अपनी शक्ति का केंद्र थी। उन्होंने यहां पेशवा के प्रतिनिधि के तौर पर सूबेदार नियुक्त करने शुरू किए।

1742 में झांसी के पहले मराठा सूबेदार के रूप में नरोशंकर, जिन्हें नारोशंकर भी कहा जाता है, को नियुक्त किया गया। नरोशंकर सिर्फ एक प्रशासक नहीं, बल्कि एक कुशल निर्माता भी थे। उन्होंने झांसी के किले का बड़े पैमाने पर विस्तार करवाया। किले का दक्षिणी हिस्सा, जो आज भी सबसे मजबूत माना जाता है, उन्हीं के कार्यकाल में बना।

इस नए विस्तार को उनके नाम पर 'शंकरगढ़' कहा गया। झांसी शहर की कई पुरानी इमारतें और मंदिर भी नरोशंकर के काल की हैं। नरोशंकर के बाद झांसी में कई मराठा सूबेदार आए।

इतिहास के दस्तावेजों के अनुसार, उनके बाद माधव गोविंद काकिर्दे और फिर बाबूलाल कनहाई ने झांसी की सूबेदारी संभाली। 1766 से 1769 तक यह जिम्मेदारी विश्वास राव लक्ष्मण के पास रही। हर सूबेदार ने झांसी को थोड़ा-थोड़ा समृद्ध किया, लेकिन असली बदलाव तब आया जब झांसी की बागडोर नवलकर परिवार के हाथों में आई।

नवलकर परिवार - जिसने झांसी को नया रूप दिया मराठा इतिहास में नवलकर परिवार का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। रघुनाथ राव द्वितीय नवलकर जब झांसी के सूबेदार बने, तो उन्होंने झांसी के प्रशासन को व्यवस्थित किया। उनके बाद शिवराव भाऊ नवलकर ने झांसी की सत्ता संभाली।

शिवराव भाऊ के पुत्र थे रघुनाथ राव तृतीय, रामचंद्र राव और अंत में राजा गंगाधर राव नवलकर। इसी परिवार ने झांसी को एक छोटी सूबेदारी से एक समृद्ध रियासत में बदल दिया। उन्होंने ओरछा गेट के पास महालक्ष्मी मंदिर बनवाया, शहर के बाजार विकसित किए और झांसी को बुंदेलखंड का सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बना दिया।

और फिर आईं वो - रानी लक्ष्मीबाई झांसी के इतिहास का सबसे स्वर्णिम और सबसे दर्दनाक अध्याय शुरू होता है 1842 से। इसी साल झांसी के राजा गंगाधर राव नवलकर का विवाह वाराणसी के एक मराठी परिवार की कन्या मणिकर्णिका तांबे से हुआ। विवाह के बाद मणिकर्णिका का नाम रखा गया - रानी लक्ष्मीबाई।

तब कौन जानता था कि यह नाम आने वाले समय में पूरे देश में वीरता और बलिदान का पर्याय बन जाएगा। 1851 में रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश कुछ महीनों बाद ही बालक की मृत्यु हो गई। राजा गंगाधर राव इस सदमे से टूट गए और उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा।

राज्य के उत्तराधिकारी के लिए उन्होंने अपने ही परिवार के एक बालक दामोदर राव को गोद ले लिया। 21 नवंबर 1853 को राजा गंगाधर राव का निधन हो गया। रानी लक्ष्मीबाई उस समय मात्र 18 साल की थीं। और यहीं पर अंग्रेजों ने अपनी सबसे बड़ी कूटनीतिक चाल चली। डलहौजी की हड़प नीति और झांसी का विद्रोह

उस समय भारत के गवर्नर-जनरल थे लॉर्ड डलहौजी। उन्होंने एक नीति बना रखी थी - 'Doctrine of Lapse' यानी हड़प नीति।

इस नीति के अनुसार, यदि किसी रियासत के राजा की मृत्यु बिना किसी प्राकृतिक उत्तराधिकारी के हो जाती है और उसने दत्तक पुत्र गोद लिया है, तो अंग्रेज उस दत्तक पुत्र को मान्यता नहीं देंगे और रियासत को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लेंगे। इसी नीति के तहत अंग्रेजों ने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया।

झांसी को ब्रिटिश शासन में मिलाने का फरमान जारी कर दिया गया। रानी को आदेश दिया गया कि वे किला खाली कर दें और झांसी के रानी महल में जाकर रहें। बदले में उन्हें 60 हजार रुपये सालाना पेंशन देने की बात कही गई।

कहा जाता है कि इसी समय रानी लक्ष्मीबाई के मुंह से वो ऐतिहासिक शब्द निकले थे, जो आज भी हर भारतीय के रोंगटे खड़े कर देते हैं - "मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।" अंग्रेज यह समझ नहीं पाए कि झांसी सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं थी। झांसी की अपनी आत्मा थी और उस आत्मा का नाम था - लक्ष्मीबाई। फिर आया 1857।

पूरे उत्तर भारत में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आग भड़क उठी। मेरठ से शुरू हुई चिंगारी दिल्ली, कानपुर, लखनऊ और झांसी तक पहुंच गई। जून 1857 में झांसी में तैनात सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया और झांसी पर रानी लक्ष्मीबाई का स्वतंत्र शासन स्थापित हो गया।

रानी ने किले की मरम्मत करवाई, तोपें बनवाईं और अपनी एक महिला सेना तैयार की, जिसमें झलकारी बाई और सुंदर-मुंदर जैसी वीरांगनाएं शामिल थीं। इन दीवारों ने वो समय भी देखा, जब किले की बुर्जों से तोपें गरज रही थीं। 1858 का महासंग्राम - जब दीवारों ने युद्ध देखा

अंग्रेजों के लिए झांसी को दोबारा जीतना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। मार्च 1858 में जनरल सर ह्यूरोज के नेतृत्व में एक विशाल अंग्रेजी सेना ने झांसी को चारों तरफ से घेर लिया। किले के अंदर रानी के पास लगभग 15 हजार सैनिक थे। किले की प्राचीरों पर 'भवानी शंकर' और 'घनगर्ज' जैसी विशाल तोपें तैनात थीं।

लगभग दो हफ्ते तक भीषण युद्ध चला। किले की दीवारों पर अंग्रेजों के तोप के गोले बरसते रहे। किले के अंदर से भी जवाबी कार्रवाई होती रही। झांसी के 10 ऐतिहासिक दरवाजे - खांडेराव गेट, दतिया दरवाजा, उन्नाव गेट, झरना गेट, लक्ष्मी गेट, सागर गेट, ओरछा गेट, सैनयर गेट और चांद गेट... हर दरवाजे पर भीषण लड़ाई हुई।

इतिहासकार बताते हैं कि जब अंग्रेज किसी तरह किले की दीवारों को तोड़कर अंदर घुसने में कामयाब होने लगे, तब रानी ने किले में रहने के बजाय बाहर निकलकर लड़ने का फैसला किया। कहा जाता है कि वे अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को अपनी पीठ पर बांधकर घोड़े पर सवार होकर किले की दीवार से कूद गईं और कालपी की ओर निकल गईं।

हालांकि इस घटना को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। कुछ का कहना है कि रानी ओरछा गेट से निकली थीं। लेकिन लोकमानस में यही छवि अमर है - एक वीरांगना, पीठ पर बच्चा, हाथ में तलवार और हवा में उड़ता घोड़ा। आज क्या बचा है? आज झांसी का किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है।

किले के अंदर रानी महल, शिव मंदिर, गणेश मंदिर और कड़क बिजली तोप आज भी मौजूद हैं। किले की दीवारों पर आज भी तोप के गोलों के निशान देखे जा सकते हैं। हर साल लाखों पर्यटक यहां आते हैं। वे पत्थर देखते हैं, लेकिन उस शौर्य को महसूस नहीं कर पाते जो इन पत्थरों में बसता है। अगर ये दीवारें बोल पातीं, तो वे क्या बतातीं?

वे बतातीं कि सत्ता कैसे आती-जाती है, लेकिन वीरता अमर रहती है। वे बतातीं कि राजा बीर सिंह देव ने इसे सुरक्षा के लिए बनवाया था, मराठों ने इसका विस्तार किया, नवलकरों ने इसे सजाया, लेकिन इसे पहचान दी तो एक 23 साल की विधवा रानी ने दी, जिसने अपने प्राण देकर भी झांसी को झुकने नहीं दिया।

तो सवाल आपसे है - झांसी की कहानी में सबसे महत्वपूर्ण कौन है? किला बनाने वाले बीर सिंह देव, बुंदेलखंड को बचाने वाले महाराजा छत्रसाल, इसे विस्तार देने वाले नरोशंकर, या इसे अमर बनाने वाली रानी लक्ष्मीबाई? शायद जवाब है - झांसी किसी एक की नहीं, इन सबकी मिलीजुली कहानी है।

लेकिन अगर वीरता को ही पहचान मानें, तो झांसी मतलब रानी लक्ष्मीबाई और रानी लक्ष्मीबाई मतलब झांसी।

R
Ranu Parihar

रानू परिहार शिवपुरी के वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो लंबे समय से जनसमस्याओं और सामाजिक मुद्दों को अपनी पत्रकारिता के माध्यम से सामने लाते हैं। वे जमीनी स्तर की खबरों और जनसरोकार से जुड़े विषयों को प्रमुखता से उठाते हैं।