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झांसी की रानी के सात वफादार पठान सिपाही:आज भी उनकी कब्रें देतीं हैं पराक्रम और देश प्रेम की गवाही

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 16 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
झांसी की रानी के सात वफादार पठान सिपाही:आज भी उनकी कब्रें देतीं हैं पराक्रम और देश प्रेम की गवाही

1857 की जंग-ए-आजादी में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल योद्धाओं में गुलाम गौस खां और खुदा बख्श जैसे नाम आज भी लोगों की जुबान पर हैं। लेकिन रानी की सेना में शामिल करीब 200 पठान सैनिकों में सात ऐसे भाई भी थे, जिनका जिक्र कम ही होता है। इन सातों भाइयों की कब्रें आज भी झांसी के अलीगोल खिड़की बाहर इलाके में मौजूद हैं। स्थानीय मान्यता है कि अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए इन पठान भाइयों की कब्रें रानी लक्ष्मीबाई के आदेश पर बनवाई गई थीं। पहले 2 तस्वीर देखिए... अलीगोल खिड़की बाहर स्थित कब्रिस्तान में बनी इन सात कब्रों को स्थानीय लोग रानी की सेना के उन पठान सैनिकों की याद से जोड़कर देखते हैं, जिन्होंने झांसी की रक्षा के लिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। कब्रिस्तान के मुतवल्ली और जुविनाइल जस्टिस बोर्ड के सदस्य रहे आबिद खान बताते हैं कि यह कब्रिस्तान उन्हीं पठान भाइयों को समर्पित है। उनके अनुसार, सातों भाई रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल थे और जीवनभर रानी की रक्षा के साथ झांसी को अंग्रेजों से सुरक्षित रखने के लिए लड़ते रहे। रानी के आदेश पर बनवाई गईं कब्रें आबिद खान के मुताबिक, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सातों पठान भाई शहीद हो गए थे। इसके बाद रानी लक्ष्मीबाई के आदेश पर उनकी कब्रें बनवाई गईं। उनका कहना है कि रानी ने इस स्थान को पठान सैनिकों के लिए समर्पित किया था, ताकि झांसी की रक्षा के लिए बलिदान देने वाले इन सैनिकों की याद कायम रहे। आज समय के साथ इन कब्रों की हालत जर्जर होती जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि झांसी के इतिहास और 1857 की क्रांति से जुड़ी इस विरासत को संरक्षित किए जाने की जरूरत है। रानी ने बनवाई थी माई साहब की मस्जिद इसी इलाके में रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ी एक और ऐतिहासिक विरासत मौजूद है। बताया जाता है कि रानी ने अपनी सेना में शामिल पठान सैनिकों को सम्मान देने के लिए एक मस्जिद का निर्माण कराया था। यह मस्जिद आज माई साहब की मस्जिद के नाम से जानी जाती है। रानी लक्ष्मीबाई की सेना में अलग-अलग समुदायों के सैनिक शामिल थे। गुलाम गौस खां और खुदा बख्श जैसे मुस्लिम योद्धाओं ने भी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसे में सात पठान भाइयों की कब्रें और माई साहब की मस्जिद झांसी की उस विरासत की याद दिलाती हैं, जिसमें रानी की सेना के सैनिकों ने मिलकर अंग्रेजों का मुकाबला किया था। इतिहास के पन्नों से बाहर रह गए सात योद्धा झांसी की 1857 की क्रांति की चर्चा होते ही रानी लक्ष्मीबाई, गुलाम गौस खां और खुदा बख्श जैसे नाम सामने आते हैं। लेकिन रानी की सेना में शामिल इन सात पठान भाइयों की कहानी अपेक्षाकृत कम सामने आई है। अलीगोल खिड़की बाहर में मौजूद उनकी कब्रें आज भी उस दौर की कहानी अपने भीतर समेटे हुए हैं। स्थानीय लोगों के लिए ये सिर्फ कब्रें नहीं, बल्कि उन सैनिकों की निशानी हैं जिन्होंने झांसी की रक्षा करते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी। जरूरत इस बात की है कि ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों की पहचान कर उनका संरक्षण किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी झांसी की इस साझा विरासत और 1857 की जंग में दिए गए बलिदानों से परिचित हो सकें।

📡 स्रोत: NewsData.io

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