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कानपुर नगर निगम में मास्टरमाइंड गोविंद शर्मा का दबदबा:KDA के सुपरवाइजर से बना टेंडर किंग, बड़े-छोटे टेंडरों पर सिंडीकेट का कब्जा

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 26 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
कानपुर नगर निगम में मास्टरमाइंड गोविंद शर्मा का दबदबा:KDA के सुपरवाइजर से बना टेंडर किंग, बड़े-छोटे टेंडरों पर सिंडीकेट का कब्जा

कानपुर नगर निगम के हर बड़े टेंडरों में फरार गोविंद शर्मा के सिंडीकेट का दखल रहता था। नगर निगम के बड़े टेंडरों पर गोविंद का ऐसा प्रभाव था कि उसके खिलाफ कोई ठेकेदार टेंडर डालने की हिम्मत नहीं करता था। उसके सिंडीकेट में 10 से 12 ठेकेदार शामिल हैं, जो नगर निगम के साथ ही दूसरे विभागों के टेंडरों में भी खेल करते थे।

गोविंद शर्मा को हर छोटे-बड़े कामों में दखलंदाजी रखने वाले ऐसे सफेदपोश सरगना का संरक्षण है कि कोई भी इसके ​खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर सकता है। अब जांच में सिंडीकेट के नेटवर्क, टेंडरों के आवंटन और पिछले वर्षों में मिली बड़ी परियोजनाओं का ब्योरा खंगाला जा रहा है।

करीब 13 करोड़ रुपये के काम करा चुकी गोविंद शर्मा की फर्म मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्ती के बाद नगर निगम ने ठेकों में भ्रष्टाचार करने वाले दबंगों से लेकर सिंडीकेट में शामिल ठेकेदारों पर कार्रवाई शुरू की है। नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय की जांच के बाद फजलगंज और स्वरूपनगर थाने में कई मामलों में एफआईआर दर्ज हो चुकी है।

अब फरार चल रहे गोविंद शर्मा की जांच भी तेज कर दी गई है। नगर निगम के रिकॉर्ड के मुताबिक, उसकी कंपनी कैला इंटरप्राइजेज अब तक करीब 13 करोड़ रुपये के काम करा चुकी है।

टेंडर से लेकर फर्म चुनने तक रहता दखल नगर निगम सूत्रों के मुताबिक, गोविंद शर्मा का सिंडीकेट यह तय करता था कि किस पंजीकृत फर्म को कितना काम मिलेगा, किस कीमत पर टेंडर डाला जाएगा और किस कंपनी को ठेका दिलाया जाएगा।

इसके सिंडीकेट में शामिल ठेकेदारों के बीच पहले से रणनीति बनाई जाती थी और उसी के मुताबिक टेंडर प्रक्रिया में भाग लिया जाता था। गोविंद शर्मा आगरा का रहने वाला है। करीब 20 से 25 साल पहले वह कानपुर आया था। इससे पहले छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में काम करता था। कानपुर आने के बाद उसने धीरे-धीरे ठेकेदारी का नेटवर्क तैयार किया।

इसके सिंडीकेट में संदीप जैन, रज्जन बाजपेई समेत 10 से 12 बड़े-छोटे ठेकेदारों शामिल हैं। टेंडर सिंडीकेट का सरगना गोविंद शर्मा गोविंद शर्मा कभी केडीए में सुपरवाइजर था। बताया जाता है कि साल 2001 में नौकरी छोड़ने के बाद गोविंद आगरा विकास प्राधिकरण चला गया।

लेकिन वहां इसकी दाल नहीं गली तो उसने नगर निगम आगरा में टेंडर पूलिंग शुरू कर दी। इसकी भनक तत्कालीन नगर आयुक्त इंद्र विक्रम सिंह को लगते ही उन्होंने इसके कार्यालय आने पर रोक लगा दी थी।

आगरा के बाद गोविंद कानपुर पहुंचा और यहां केडीए-नगर निगम में अधिकारियों व कुछ राजनीतिक सरपरस्तों की मदद से नगर निगम के टेंडरों में उसका दबदबा बढ़ता गया। हॉट मिक्स प्लांट के टेंडरों में भी उसके हस्तक्षेप की चर्चा रही।

उसने अपने आवास की नेम प्लेट पर भाजपा की नेम प्लेट भी लगवा रखी है। 15 प्रतिशत डाउन पर टेंडर, बाद में लकी ड्रॉ का खेल गोविंद शर्मा ठेकेदारों पर दबाव बनाकर करीब 15 प्रतिशत डाउन रेट पर टेंडर डलवाता था। इसके बाद 85 प्रतिशत पर एक ही रेट खुलने पर लकी ड्रॉ निकाला जाता था।

इस पूरी प्रक्रिया के बाद गोविंद की जुड़ी फर्म को ही टेंडर मिलता था। इसके सिंडीकेट में शामिल फर्मों को 0.05 से एक प्रतिशत पर ठेके मिल जाते थे, जबकि 15 प्रतिशत तक कम दर पर टेंडर डालने वालों को ठेका नहीं मिल पाता था। इस अंतर का फायदा माफियाओं और सिंडीकेट से जुड़े लोगों को मिलता था।

गोविंद का सिंडीकेट ही नगर निगम के ठेकों में दबदबा बनाता था। फर्जी फर्मों के रजिस्ट्रेशन का भी आरोप गोविंद शर्मा ही फर्जी फर्मों का रजिस्ट्रेशन भी कराता था। इतना ही नहीं ठेकों को मैनेज भी कराता था। इसने कई ऐसी फर्मों का भी पंजीकरण कराया, जिनके पास सड़क निर्माण जैसे कार्यों के लिए जरूरी प्लांट और संसाधन तक नहीं थे।

इन्हीं फर्मों को टेंडर प्रक्रिया में शामिल कराकर टेंडर कराया जाता था। इसमें सात से 15 प्रतिशत तक कमीशनखोरी का खेल लगातार फल-फूल रहा है। इसकी दबंगई ऐसी थी कि 15 प्रतिशत बिलो टेंडर डालने वालों को ठेका नहीं मिलता था, लेकिन एक प्रतिशत बिलो टेंडर डालने वालों को ठेका मिल जाता है।

राजस्व का चूना .05 से 01 प्रतिशत वालों को ठेका देकर ही लगाया जा रहा है। वेबसाइट पर बड़े टेंडर देर से अपलोड होते नगर निगम के छोटे ठेकेदारों का कहना है कि टेंडर प्रक्रिया में ऑनलाइन स्तर पर भी गड़बड़ी की जाती थी।

उन्होंने बताया कि अगर नगर निगम के 100 टेंडर निकले, तो उसमें कई बड़े टेंडर दिखते ही नहीं थे, बल्कि निर्धारित समय से कुछ देर पहले वेबसाइट पर दिखाई देते थे। उदाहरण के तौर पर अगर टेंडर बंद होने की अंतिम समय सीमा दोपहर 4 बजे है तो कुछ टेंडर एक घंटे पहले ही वेबसाइट पर अपलोड होते हैं।

इससे दूसरे ठेकेदार उसमें हिस्सा नहीं ले पाते थे और गोविंद शर्मा के सिंडीकेट से जुड़े ठेकेदारों को फायदा मिल जाता है। यह पूरी प्रक्रिया सेटिंग से की जाती थी।

📡 स्रोत: NewsData.io

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