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कांकेर में मुख्यधारा की मिठास: पहली बार राखी बना रही हैं सरेंडर महिला नक्सली, मुल्ला कैंप में 1000 से अधिक राखियां तैयार

लेखक: DD Raipur अंतिम अपडेट: 26 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति

कांकेर में मुख्यधारा की मिठास: पहली बार राखी बना रही हैं सरेंडर महिला नक्सली, मुल्ला कैंप में 1000 से अधिक राखियां तैयार छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित कांकेर जिले के मुल्ला कैंप में इस बार रक्षाबंधन का पर्व उम्मीद और बदलाव की नई बयार लेकर आया है।

सालों तक जंगलों में भटकने और त्योहारों से दूर रहने के बाद, सरेंडर कर चुके पूर्व नक्सली अब पुनर्वास केंद्र में समाज की मुख्यधारा से जुड़कर एक नया जीवन शुरू कर रहे हैं।

​हाल ही में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (OSD) कमलोचन कश्यप ने मुल्ला कैंप का दौरा कर पुनर्वासित पूर्व नक्सलियों का हालचाल जाना और केंद्र में चल रहे स्वरोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रमों का जायजा लिया।

कांकेर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) आकाश श्रीश्रीमाल ने बताया कि पुनर्वास केंद्र में महिला और पुरुष सदस्यों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं, ताकि वे सम्मानजनक आजीविका कमा सकें। ​रक्षाबंधन पर झलका पहली बार त्योहार मनाने का उत्साह

​पुनर्वास केंद्र में रह रही पूर्व महिला नक्सलियों ने इस रक्षाबंधन पर पहली बार अपने हाथों से 1000 से अधिक सुंदर राखियां तैयार की हैं, जिन्हें स्थानीय बाजारों में बेचा भी जा चुका है। ​सुनीता कोवाची (सरेंडर नक्सली): "इतने सालों तक हम जंगलों में रहे, कभी कोई त्योहार नहीं मनाया और न ही कभी राखी बनाई।

इस बार कैंप में सबने मिलकर राखी बनाई है। हम सुरक्षाकर्मियों और साथियों को राखी बांधकर त्योहार मनाना चाहते हैं।" ​शांति कोवाची (सरेंडर नक्सली): "जीवन में पहली बार राखी बनाई है। हम सबने मिलकर दो दिनों में ही 700 से अधिक राखियां तैयार कर लीं।"

​मानवती पोटाई (सरेंडर नक्सली): "हमने पहली बार अपने हाथों से 500 राखियां बनाई हैं। ऐसा लग रहा है जैसे नया जीवन मिला हो।" ​संकाय उसेंडी (सरेंडर नक्सली): "समूह की दीदियों ने आकर हमें सिर्फ एक सैंपल दिखाया था, जिसे देखकर हम सबने मिलकर 800 राखियां बना डालीं।"

​देवकी पुरामें (सरेंडर नक्सली): "पहले सिर्फ सुना करते थे कि रक्षाबंधन नाम का कोई त्योहार होता है। इस बार जब दीदियों के सिखाने पर खुद 750 से ज्यादा राखियां बनाईं, तो बहुत खुशी हुई।"

​पुनर्वास केंद्र में मिल रहे इस प्रशिक्षण और त्योहार के उत्साह से साफ है कि हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे ये लोग अब शांति और स्वावलंबन की ओर मजबूती से कदम बढ़ा चुके हैं।

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DD Raipur

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