राजनीति

करोड़ों रुपये से बनने वाले 4 साल से बंद पड़े 90 डिग्री ब्रिज पे पैसों की बर्बादी जैसे सवालों से बचने के लिए कभी काज़ीकैंप पर बम गिराया जाता है तो कभी गरबे में एंट्री के नाम पर गन्दी बयानबाजी

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 21 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति

भोपाल। राजधानी के ऐशबाग क्षेत्र में करीब 18 करोड़ रुपये की लागत से बने 90 डिग्री मोड़ वाले रेलवे ओवरब्रिज के लंबे समय से बंद रहने और इसके निर्माण व डिजाइन को लेकर उठे सवालों के बीच भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा के हालिया बयानों को लेकर सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। सोशल मीडिया यूजर्स का एक वर्ग सवाल उठा रहा है कि शहर की अधूरी और विवादित परियोजनाओं, सरकारी खर्च और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर जवाब मांगने के बजाय राजनीतिक बहस बार-बार दूसरे मुद्दों की ओर क्यों चली जाती है।

ऐशबाग क्षेत्र के इस ओवरब्रिज का निर्माण करीब 18 करोड़ रुपये की लागत से हुआ था। 90 डिग्री के तीखे मोड़ को लेकर इसके डिजाइन पर सवाल उठे थे और पुल को आम लोगों के लिए शुरू नहीं किया जा सका। मामले में जांच के बाद अधिकारियों पर कार्रवाई भी हुई और बाद में पुल के डिजाइन में बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ी। अप्रैल 2026 की रिपोर्टों के मुताबिक पीडब्ल्यूडी और रेलवे के बीच डिजाइन बदलने पर सहमति बनी थी।

इसी पृष्ठभूमि में सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने रामेश्वर शर्मा के हालिया बयानों को लेकर उनसे शहर और प्रदेश के दूसरे मुद्दों पर भी सवाल पूछे हैं। सोशल मीडिया पर सामने आए सवालों में शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, डॉक्टरों के स्टाइपेंड, शिक्षक भर्ती और किसानों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।

NEET की तैयारी कर रहे अंकित ने सवाल उठाते हुए पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था जैसे मुद्दे सामने रखे। अंकित की पोस्ट का मूल संदर्भ उपलब्ध होने पर ही उसके दावे की स्वतंत्र पुष्टि की जा सकती है, लेकिन सोशल मीडिया पर परीक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं की चिंता लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।

इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड को लेकर आंदोलन कर चुकीं निकिता ने चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े युवा डॉक्टरों के मुद्दे को उठाते हुए सवाल किया कि जब डॉक्टर अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने के लिए मजबूर होते हैं, तो राजनीतिक चर्चा में उनके मुद्दों को कितनी जगह मिलती है। मध्यप्रदेश में इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड में वृद्धि को लेकर हाल में आंदोलन और सरकार के बीच बातचीत हुई थी तथा स्टाइपेंड बढ़ाकर 21,500 रुपये किए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।

शिक्षक भर्ती में पद बढ़ाने की मांग को लेकर धरने पर बैठी टीना ने भर्ती और रोजगार के सवाल को चर्चा में लाते हुए पूछा कि युवाओं के लिए रोजगार और रिक्त पदों जैसे मुद्दों पर भी सार्वजनिक बहस होनी चाहिए या नहीं।

किसान आंदोलन में शामिल रहे पंकज ने किसानों से जुड़े सवालों को सामने रखा। उनका सवाल यह था कि राजनीतिक बहस में किसानों की आय, फसल का दाम, सिंचाई और कृषि से जुड़े व्यावहारिक मुद्दों पर भी उतनी ही गंभीरता से चर्चा क्यों नहीं होती।

सोशल मीडिया पर उठ रहे इन सवालों के बीच रामेश्वर शर्मा के दो हालिया बयानों की भी चर्चा हो रही है। सितंबर में करोंद क्षेत्र के एक कार्यक्रम के दौरान शर्मा ने काजी कैंप पर मिसाइल गिराने की बात कही थी। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनका संदर्भ भोपाल के काजी कैंप से नहीं, बल्कि इस्लामाबाद के काजी कैंप से था। इस बयान पर राजनीतिक विवाद हुआ और असदुद्दीन ओवैसी ने भी प्रतिक्रिया दी।

अब 21 सितंबर को गरबा आयोजनों में मुस्लिम युवकों की एंट्री को लेकर शर्मा का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम गरबा में आना चाहते हैं तो आएं, लेकिन अकेले क्यों आएं, अपनी बहन-बेटियों को भी साथ लेकर आएं। उन्होंने तिलक लगाने और जय श्रीराम बोलने की बात भी कही। इस बयान पर कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी प्रतिक्रिया दी है।

इन बयानों के बाद सोशल मीडिया पर बहस का एक हिस्सा यह सवाल उठा रहा है कि भोपाल में 90 डिग्री वाले पुल जैसी परियोजनाओं पर हुए सरकारी खर्च, उसकी वर्तमान स्थिति और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक चर्चा कब होगी। दूसरी ओर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, भर्ती और किसानों से जुड़े मुद्दे उठाने वाले सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि राजनीतिक विमर्श में इन विषयों को भी प्रमुखता मिलनी चाहिए।

💡 पृष्ठभूमि (Background)

भौपोलिक रूप से महत्वपूर्ण 90 डिग्री मोड़ वाला रेलवे ओवरब्रिज, जिसकी लागत 18 करोड़ रुपये है, चार वर्ष से बंद है। इसकी बंदी और डिजाइन में संभावित त्रुटियों पर सवाल उठे हैं, जिससे सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का संदेह है। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा के हालिया बयानों ने इस विवाद को और बढ़ा दिया, जिससे सोशल मीडिया पर तीव्र बहस छिड़ गई। यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सरकारी परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। यदि इस पर उचित कार्रवाई नहीं की गई, तो नागरिकों का विश्वास घट

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।