कश्मीर से ऑपरेशन सिंदूर तक पाकिस्तान के सुर में सुर मिला रहा तुर्की, अब मांग रहा SCO की फुल मेंबरशिप; क्या भारत की बढ़ेगी टेंशन
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अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बदलते समीकरणों और भू-राजनीतिक मंचों पर इन दिनों तुर्की (Turkey) की भूमिका को लेकर दुनिया भर के रणनीतिक विश्लेषकों की निगाहें टिकी हुई हैं।
एक तरफ जहां तुर्की लगातार अंतरराष्ट्रीय संधियों और मंचों पर भारत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान के बयानों का खुलकर समर्थन करता रहा है, वहीं दूसरी तरफ अब उसने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की पूर्ण सदस्यता (Full Membership) पाने के लिए जोरदार कोशिशें तेज कर दी हैं।
कश्मीर के संवेदनशील मुद्दे से लेकर भारत विरोधी हर मंच पर पाकिस्तान की पीठ थपथपाने वाला तुर्की यदि एससीओ जैसे अहम और प्रभावशाली यूरेशियाई संगठन का पूर्ण सदस्य बन जाता है, तो इससे भारत के सामरिक हितों और क्षेत्रीय कूटनीति के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
आज के इस विस्तृत और गहराई से विश्लेषण वाले लेख में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि आखिर तुर्की के इस नए कदम के पीछे के सामरिक मायने क्या हैं, कश्मीर और अन्य मुद्दों पर उसका रुख भारत के लिए कितना चिंताजनक है, और आने वाले समय में भारत इस मोर्चे पर कूटनीतिक रूप से कैसे अपनी स्थिति को मजबूत कर रहा है।
तुर्की और पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियां और कश्मीर पर उसका रवैया पिछले कुछ वर्षों में तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) की अगुवाई में अंकारा ने अपनी विदेश नीति में एक ऐसा आक्रामक रुख अपनाया है जो अक्सर भारत के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी करने वाला साबित हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों से लेकर इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) तक, तुर्की ने हमेशा कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के झूठे और भारत विरोधी प्रचार का समर्थन किया है।
इतना ही नहीं, रक्षा और सैन्य साजो-सामान के मोर्चे पर भी पाकिस्तान और तुर्की के बीच गहरी सांठगांठ देखने को मिली है, जहां ड्रोन तकनीक और अन्य हथियारों का आदान-प्रदान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को गहरा कर रहा है।
हाल ही में भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए ऑपरेशनों और रणनीतिक पहलों के खिलाफ भी तुर्की के मीडिया और राजनीतिक हलकों से कई बार भारत विरोधी सुगबुगाहट देखने को मिली है।
ऐसे में जब एक ऐसा देश जो खुले तौर पर भारत की संप्रभुता के खिलाफ खड़े पाकिस्तान का करीबी रणनीतिक साझेदार हो, वह किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन की पूर्ण सदस्यता के लिए पैरवी करता है, तो भारत के रक्षा और विदेश मंत्रालय के लिए यह स्वाभाविक रूप से एक गंभीर मंथन का विषय बन जाता है।
क्या है शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और इसकी वैश्विक महत्ता शंघाई सहयोग संगठन (SCO) यूरेशिया का एक बेहद प्रभावशाली और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा गठबंधन है, जिसमें भारत, रूस, चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देश शामिल हैं।
इस संगठन का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा को बनाए रखना, आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद से निपटना तथा सदस्य देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक सहयोग को बढ़ावा देना है।
वर्तमान में तुर्की इस संगठन में 'संवाद भागीदार' (Dialogue Partner) के रूप में जुड़ा हुआ है, लेकिन अब वह इसकी पूर्ण सदस्यता हासिल करने के लिए बेताब बैठा है। एससीओ के भीतर निर्णय आम सहमति से लिए जाते हैं, और यदि कोई देश किसी नए सदस्य के आने पर आपत्ति दर्ज कराता है, तो उसकी एंट्री मुश्किल हो सकती है।
भारत इस संगठन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और सक्रिय सदस्य है, जिसने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को हमेशा एससीओ के मंच पर प्रमुखता से उठाया है।
ऐसे में तुर्की की पूर्ण सदस्यता के आवेदन पर भारत का रुख आने वाले समय में बेहद निर्णायक साबित होने वाला है, क्योंकि जिस देश के संबंध आतंकवाद को पनाह देने वाले पाकिस्तान से इतने गहरे हों, उसकी उपस्थिति क्षेत्रीय सुरक्षा मंच पर आंतरिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत और तुर्की के मंसूबों पर नजर आज का भारत साल 2014 के पहले वाला कमजोर देश नहीं है, बल्कि ग्लोबल साउथ (Global South) का नेतृत्व करने वाला एक ऐसा शक्तिशाली राष्ट्र है जिसकी बात आज दुनिया के बड़े-बड़े देश सम्मान के साथ सुनते हैं।
भारत ने अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट' और 'एक्ट ईस्ट' नीतियों के साथ-साथ यूरोपीय और मध्य एशियाई देशों के साथ अपने संबंधों को पूरी परिपक्वता के साथ आगे बढ़ाया है।
जहां एक तरफ तुर्की भारत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान को खुश करने की कूटनीतिक भूल कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारत ने साइप्रस और ग्रीस (Greece) जैसे देशों के साथ अपने रणनीतिक और रक्षा संबंधों को मजबूत करके तुर्की को उसकी भाषा में करारा कूटनीतिक संदेश दे दिया है।
ग्रीस और साइप्रस के साथ भारत की बढ़ती दोस्ती सीधे तौर पर पूर्वी भूमध्य सागर (Eastern Mediterranean) में तुर्की के सामरिक दबाव को संतुलित करने का काम करती है।
भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जो देश भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान नहीं करेगा, उसके साथ कूटनीतिक और आर्थिक रिश्तों में भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखेगा।
इसलिए, तुर्की चाहे एससीओ की फुल मेंबरशिप के लिए कितनी भी जोर-आमाइश क्यों न कर ले, भारत के कूटनीतिक चक्रव्यूह को पार करना उसके लिए आसान नहीं होगा।
भविष्य के भू-राजनीतिक समीकरण और भारत के लिए संभावित चुनौतियां आने वाले दिनों में वैश्विक कूटनीति के अखाड़े में यूरेशियाई क्षेत्र का महत्व और अधिक बढ़ने वाला है, क्योंकि चीन और रूस मिलकर पश्चिमी ताकतों के प्रभुत्व को चुनौती दे रहे हैं।
ऐसे में एससीओ जैसे मंचों पर देशों का आपसी समीकरण वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा।
तुर्की का इस संगठन में पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होने का प्रयास न केवल क्षेत्रीय कूटनीति का विस्तार है, बल्कि यह तुर्की के राष्ट्रपति की उस ओटोमन महत्वाकांक्षा का भी हिस्सा है जिसके तहत वे खुद को इस्लामिक दुनिया के नेता के रूप में पेश करना चाहते हैं।
लेकिन भारत जैसे देश के लिए यह एक स्पष्ट परीक्षा की घड़ी होगी कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों की रक्षा करते हुए ऐसे तत्वों को कैसे हैंडल करता है। भारतीय विदेश मंत्रालय के रणनीतिकार हर एक गतिविधि पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए हैं।
अंत में यही कहा जा सकता है कि तुर्की की चाहे जितनी भी कोशिशें क्यों न हों, भारत अपनी कूटनीतिक सूझबूझ और मजबूत अंतरराष्ट्रीय साख के दम पर देश के सामरिक हितों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है और किसी भी भारत विरोधी षड्यंत्र को सफल नहीं होने देगा।
📡 स्रोत: NewsData.io