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केज कल्चर से बदली मछुआरों की जिंदगी, आदिवासी परिवारों को मिला आय का नया आधार

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 30 सितंबर 2026 👁️ 1 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
केज कल्चर से बदली मछुआरों की जिंदगी, आदिवासी परिवारों को मिला आय का नया आधार

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और जिला खनिज न्यास निधि की पहल से आदिवासी मछुआ परिवारों की आजीविका को नई दिशा मिली है। मल्हनिया जलाशय में पिंजरा मछली पालन यानी केज कल्चर के जरिए मछुआरा सहकारी समिति के सदस्य अब पारंपरिक मत्स्याखेट के साथ आधुनिक तकनीक से मछली उत्पादन कर रहे हैं। 54 केज में हो रहे मछली पालन से समिति की आमदनी बढ़ी है और सदस्यों को रोजगार का नियमित माध्यम मिला है।

गौरेला विकासखंड के ग्राम देवरगांव स्थित मल्हनिया जलाशय... कभी जहां मछुआरों की आजीविका मुख्य रूप से पारंपरिक मत्स्याखेट पर निर्भर थी, वहीं अब आधुनिक तकनीक ने इस व्यवसाय को नई रफ्तार दी है।

यहां जय बूढ़ा देव मल्हनिया आदिवासी मछुआ सहकारी समिति मर्यादित के सदस्य पिंजरा मछली पालन यानी केज कल्चर के जरिए मछली उत्पादन कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और जिला खनिज न्यास निधि के सहयोग से जलाशय में 54 केज स्थापित किए गए हैं, जिनमें उन्नत प्रजातियों की मछलियों का पालन किया जा रहा है।

बाइट-01

देवेंद्र कुमार वर्मा, सहायक संचालक, मत्स्य विभाग, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही

वर्ष 2002 से संचालित इस सहकारी समिति से वर्तमान में 44 आदिवासी मछुआरे जुड़े हैं। इनमें 26 सदस्य विशेष पिछड़ी जनजाति यानी पीवीटीजी बैगा समुदाय से हैं।

पहले समिति के सदस्य जलाशय में सामान्य मत्स्याखेट कर मछलियां बेचते थे। जलाशय की लीज और अन्य खर्चों के बाद समिति को सालाना करीब ढाई से तीन लाख रुपये की आय होती थी।

आय बढ़ाने और रोजगार के अवसरों को मजबूत करने के उद्देश्य से मत्स्य विभाग और जिला प्रशासन ने समिति को आधुनिक पिंजरा मछली पालन से जोड़ा।

केज कल्चर का असर अब समिति की आय पर भी दिखाई दे रहा है।

समिति द्वारा एक वर्ष में करीब 10 से 15 लाख रुपये की मछली का विक्रय किया गया है। वर्तमान में भी केजों में लगभग 10 से 15 टन मछली उपलब्ध है।

इस गतिविधि से समिति के सदस्यों को नियमित काम मिल रहा है और वे प्रतिमाह लगभग 6 से 7 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर रहे हैं।

बाइट-02 आसाढ़ सिंह बैगा — मत्स्य पालक कृषक

बाइट-03 बिरसिया बाई बैगा — मत्स्य पालक कृषक

मल्हनिया जलाशय में केज कल्चर ने सिर्फ मछली उत्पादन का तरीका नहीं बदला, बल्कि मछुआरा परिवारों की आजीविका को भी मजबूत किया है।

महिलाएं और पुरुष मिलकर मछली पालन की गतिविधियों में भागीदारी कर रहे हैं। नियमित रोजगार और बढ़ी हुई आमदनी से परिवारों को आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का अवसर मिला है।

बाइट-04 समुदिया बाई बैगा — मत्स्य पालक कृषक

बाइट-05 सावन सिंह — मत्स्य पालक कृषक

परंपरागत मत्स्य व्यवसाय के साथ आधुनिक तकनीक का यह मेल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का उदाहरण बन रहा है।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के माध्यम से मिले सहयोग और जिला प्रशासन की पहल से मछुआरों को अधिक उत्पादन और बेहतर आय का अवसर मिला है।

बाइट-06 भोग लाल — मत्स्य पालक कृषक

बाइट-07 कलिन्दर — सचिव, जय बूढ़ा देव मल्हनिया आदिवासी मछुआ सहकारी समिति

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।