खेतड़ी में 400 साल पुरानी आस्था का केंद्र वराही देवी मंदिर, नवरात्र में उमड़ते हैं श्रद्धालु
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झुंझुनूं जिले के खेतड़ी में स्थित वराही देवी मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि करीब 400 वर्ष पूर्व माता की मूर्ति धरती से प्रकट हुई थी
झुंझुनूं, 16 अक्टूबर। राजस्थान के झुंझुनूं जिले के खेतड़ी में स्थित वराही देवी मंदिर श्रद्धा, आस्था और ऐतिहासिक मान्यताओं का अनूठा संगम है। करीब 400 वर्ष पुरानी मान्यता से जुड़ा यह मंदिर क्षेत्र के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। वराही देवी को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। नवरात्र के अवसर पर मंदिर में नौ दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना होती है और नवमी के दिन माता की झांकी निकाली जाती है।
खेतड़ी की धार्मिक पहचान में वराही देवी मंदिर का विशेष स्थान है। मान्यता है कि माता वराही 16 देवियों में से एक हैं और उनकी मूर्ति करीब 400 वर्ष पहले धरती से प्रकट हुई थी। इसके बाद निर्वाण वंश के राजा ने मूर्ति की स्थापना करवाई थी। तभी से माता वराही क्षेत्र के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बनी हुई हैं। खेतड़ी की बसावट और स्थानीय इतिहास में भी वराही देवी के स्वरूप को विशेष महत्व दिया जाता है। यहां के श्रद्धालु माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली तथा मंगलकामना के लिए माता के दरबार में शीश नवाते हैं।
नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। पूरे नौ दिनों तक पूजा-पाठ और दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंदिर के पुजारी प्रदीप जोशी विधि-विधान से माता की पूजा-अर्चना करवाते हैं। वहीं, नवरात्र की नवमी पर माता वराही की झांकी निकाली जाती है, जिसमें श्रद्धालु उत्साह और भक्तिभाव के साथ शामिल होते हैं। नवरात्र के दिनों में मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहता है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु माता के दर्शन कर परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। वराही देवी मंदिर आज भी खेतड़ी की प्राचीन धार्मिक परंपराओं, लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है।
खेतड़ी का वराही देवी मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक मान्यताओं और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का प्रतीक भी है। नवरात्र में यहां उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ माता के प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा को दर्शाती है।
बाइट - प्रदीप जोशी, पुजारी बाइट - अमर चंद, ग्रामीण
बाइट - सुधीर गुप्ता, इतिहासकार