क्रिमिनल केस में जज अपनी नैतिक सोच न थोपें:सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द किया
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जमानत और आपराधिक मामलों में अदालतें अपनी निजी नैतिक सोच के आधार पर फैसला नहीं कर सकतीं। फैसला कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एएस चंद्रकुर की बेंच ने 23 सितंबर को यह बात कही। कोर्ट ने यौन शोषण के एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का जमानत खारिज करने वाला फैसला रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि आरोपी की रिहाई से सामाजिक व्यवस्था और पीड़िता के परिवार की नैतिकता पर असर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी एक साल से ज्यादा समय से जेल में है और केस की सुनवाई पूरी होने में अभी समय लग सकता है। इन बातों को देखते हुए कोर्ट ने आरोपी को जमानत दे दी।
आरोपी पर लगे आरोप आरोपी के खिलाफ मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में FIR दर्ज की गई थी। इसमें BNS की विभिन्न धाराओं के साथ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट, 2012 (POCSO Act) और शेड्यूल्ड कास्ट्स एंड शेड्यूल्ड ट्राइब्स (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज) एक्ट, 1989 की धाराएं लगाई गई थीं।
आरोपी पीड़िता के पड़ोस में किराएदार के रूप में रहता था। आरोप है कि शादीशुदा होने के बावजूद उसने पीड़िता की बड़ी बहन को अगवा करने की कोशिश की। इसके बाद मामला दर्ज हुआ। बाद में पीड़िता ने अपनी मां को बताया कि आरोपी ने करीब एक महीने तक उसका यौन शोषण किया। इसके बाद मौजूदा मामले में FIR दर्ज की गई।
बचाव पक्ष की दलील आरोपी के वकील ने कहा कि यह मामला आरोपी के पीड़िता की बड़ी बहन के साथ संबंधों का नतीजा है। वकील के मुताबिक, बड़ी बेटी के साथ संबंधों को लेकर आरोपी को परेशान करने के लिए यह मामला दर्ज कराया गया। एक साल से ज्यादा समय से जेल में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि आरोपी एक साल से ज्यादा समय से हिरासत में है।
ट्रायल पूरा होने में अभी कुछ और समय लग सकता है। बेंच ने कहा, “इन परिस्थितियों में हम मानते हैं कि आरोपी को जमानत देने का आधार बनता है।” इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। बेंच ने निर्देश दिया कि आरोपी को अधिकतम सात दिनों के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार वाली स्पेशल कोर्ट में पेश किया जाए।
इसके बाद तय शर्तों और जमानत की शर्तों के अनुसार उसे रिहा किया जाए।
📡 स्रोत: Dainik Bhaskar
💡 पृष्ठभूमि (Background)
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जमानत आदेश को रद्द कर दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि जमानत और आपराधिक मामलों में अदालतों को अपनी व्यक्तिगत नैतिक सोच से प्रभावित नहीं होना चाहिए। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रियाओं में निष्पक्षता और कानून के शासन को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। इस फैसले से यह संदेश मिलता है कि न्यायिक निर्णय तथ्य और कानून पर आधारित होने चाहिए, न कि व्यक्तिगत भावनाओं पर। जनता के लिए इसका अर्थ है कि न्याय प्रणाली अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय होगी, जिससे न्याय के प्रति विश्वास