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कुल्लू दशहरा: मिट्टी और गोबर से तैयार होते हैं रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के मुखौटे

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 26 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
कुल्लू दशहरा: मिट्टी और गोबर से तैयार होते हैं रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के मुखौटे

जिला कुल्लू के मुख्यालय ढालपुर में 21 अक्टूबर से अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव की शुरुआत हो चुकी है। सात दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भगवान रघुनाथ की भव्य रथयात्रा के साथ विभिन्न धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया जाता है। उत्सव के पहले दिन भगवान रघुनाथ की विशाल रथयात्रा निकाली गई, जिसमें जिला कुल्लू के विभिन्न क्षेत्रों से सैकड़ों देवी-देवताओं ने भाग लिया।

उत्सव के अंतिम दिन लंका दहन की परंपरा निभाई जाएगी, जिसके बाद भगवान रघुनाथ अपने मंदिर लौट जाएंगे।कुल्लू दशहरे में लंका दहन की परंपरा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इस रस्म के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के मुखौटे मिट्टी और गोबर से तैयार किए जाते हैं। इन मुखौटों को बनाने की प्रक्रिया नवरात्रों के दौरान ही शुरू हो जाती है।

भगवान रघुनाथ के पुजारी दिनेश किशोर के निर्देशन में तैयार होने वाले इन मुखौटों को प्राचीन देव परंपरा के अनुसार लंका दहन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

मुखौटे बनाने के लिए सबसे पहले मिट्टी और गोबर को मिलाकर उनका ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद इन्हें कई दिनों तक धूप में सुखाया जाता है, ताकि ये कठोर हो जाएं। सूखने के बाद मुखौटों पर विभिन्न आकृतियां उकेरी जाती हैं और उन्हें रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद का स्वरूप दिया जाता है। रंग-रोगन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन्हें लंका दहन के लिए तैयार किया जाता है।

दशहरा उत्सव के अंतिम दिन भगवान रघुनाथ अपने अस्थायी शिविर से निकलकर रथ में विराजमान होते हैं और ढालपुर मैदान से लंका बेकर की ओर प्रस्थान करते हैं। यह स्थान ढालपुर मैदान के समीप कैटल ग्राउंड के पास स्थित है। यहां पारंपरिक देव विधि-विधान के साथ झाड़ियों और मिट्टी-गोबर से बने मुखौटों को जलाकर लंका दहन की रस्म पूरी की जाती है।

इस दौरान भगवान रघुनाथ के साथ विभिन्न देवी-देवताओं की उपस्थिति इस आयोजन को विशेष धार्मिक स्वरूप प्रदान करती है।भगवान रघुनाथ के पुजारी दिनेश किशोर ने बताया कि कुल्लू दशहरे में लंका दहन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोगों की आस्था, उत्साह और उल्लास का प्रतीक भी है। इस परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

उन्होंने कहा कि मुखौटे बनाने और लंका दहन की यह प्राचीन परंपरा कुल्लू की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही देव संस्कृति को जीवंत बनाए हुए है।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।