क्यों नहीं राहुल गांधी की अगुवाई वाले सांसदों को दिया समय? चुनाव आयोग ने बताया
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लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल और प्रियंका गांधी के साथ 50 सांसदों समेत करीब ढाई सौ लोगों को मंगलवार की देर रात हिरासत में लेने के बाद किग्सवें कैम्प पुलिस लाइन से रिहा कर दिया गया.
इससे पहले, करीब 9 घंटे तक आकाशवाणी भवन के परिसर में राहुल-प्रियंका समेत इंडिया ब्लॉक के नेताओं का हाई वोल्टेज ड्रामा जारी रहा. बीजेपी ने राहुल का करारा हमला बोलते हुए कहा कि झूठ का चेहरा बेनकाब हो गया.
इस बीच निर्वाचन आयोग मुख्यालय के पास मंगलवार को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के अन्य नेताओं के प्रदर्शन के बीच आयोग ने कहा कि उसे किसी भी राजनीतिक दल की ओर से बैठक के लिए कोई अनुरोध नहीं मिला था.
इससे पहले संसद मार्ग से निर्वाचन आयोग के मुख्यालय तक इंडिया गठबंधन के विरोध मार्च के दौरान काफी हंगामा हुआ.
राहुल गांधी, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा और कुछ अन्य नेता आयोग के कार्यालय तक पहुंचने की कोशिश के दौरान आकाशवाणी भवन परिसर में बैठ गए.
निर्वाचन आयोग के अधिकारियों से जब पूछा गया कि क्या राहुल गांधी समेत इंडिया गठबंधन के नेताओं ने आयोग से मुलाकात का अनुरोध किया था, तो उन्होंने कहा कि मंगलवार को किसी भी राजनीतिक दल की ओर से बैठक के लिए कोई अनुरोध नहीं किया गया था.
दिनभर हाई वोल्टेज ड्रामा
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी और डेरेक ओ'ब्रायन समेत विपक्ष के कई नेताओं को मार्च रोके जाने के बाद पुलिस ने हिरासत में ले लिया.
इससे पहले राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई सांसदों को संसद मार्ग पर आकाशवाणी भवन और नीति आयोग के कार्यालय के सामने सुरक्षा कर्मियों ने रोक दिया था.
विपक्षी नेता मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मार्च कर रहे थे.
यह मार्च 25 सितंबर को प्रकाशित अखबार इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के बाद कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लगातार जारी प्रदर्शनों के तहत आयोजित किया गया था.
📡 स्रोत: ABP Live
💡 पृष्ठभूमि (Background)
यह खबर बताती है कि चुनाव आयोग ने राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसदों को हिरासत में लेने के बाद उन्हें रिहा कर दिया। विषय है चुनाव आयोग की हिरासत नीति और राजनेताओं के साथ उसका व्यवहार। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि चुनाव आयोग किस प्रकार विपक्ष के नेताओं को संभालता है और क्या यह प्रक्रिया पारदर्शी है। आम जनता पर इसका असर यह हो सकता है कि नागरिकों को चुनावी प्रक्रियाओं पर विश्वास बढ़े या घटे, और राजनैतिक असंतोष के बीच चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठें।