लाहौल-स्पीति की घेपन झील के बढ़े जलस्तर को लेकर प्रशासन सतर्क, डीसी ने 14 किमी पैदल पहुंचकर लिया जायजा
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लाहौल-स्पीति में घेपन ग्लेशियल झील के बढ़े जलस्तर और संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे को देखते हुए जिला प्रशासन ने निगरानी और एहतियाती तैयारियां तेज कर दी हैं। उपायुक्त एवं जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की अध्यक्ष किरण भड़ाना ने मंगलवार को दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में स्थित घेपन झील का स्वयं दौरा कर स्थिति का जायजा लिया।
करीब 14 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई के बाद झील तक पहुंचीं उपायुक्त ने जलस्तर, आसपास के भू-भाग और पानी के संभावित बहाव मार्ग का निरीक्षण किया। करीब 4 हजार 70 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन झील को लेकर जिला प्रशासन लगातार निगरानी कर रहा है। निरीक्षण के दौरान उपायुक्त किरण भड़ाना ने अधिकारियों से झील की वर्तमान स्थिति और क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों की जानकारी ली।
उन्होंने संभावित GLOF की स्थिति में पानी के बहाव, जोखिम वाले क्षेत्रों और बचाव के संभावित उपायों पर अधिकारियों के साथ चर्चा की। उपायुक्त ने संबंधित विभागों को आपसी समन्वय के साथ वैज्ञानिक और तकनीकी आकलन करने के निर्देश दिए। निरीक्षण दल में विभिन्न विभागों के 15 अधिकारी और कर्मचारी शामिल रहे।
दुर्गम क्षेत्र होने के कारण टीम के अन्य सदस्यों के लिए झील के नीचे बेस कैंप में रात्रि विश्राम की व्यवस्था की गई, जबकि उपायुक्त निरीक्षण के बाद मंगलवार को ही वापस लौट आईं। उपायुक्त ने बताया कि प्रारंभिक आकलन के अनुसार आपदा की स्थिति में झील का पानी आबादी वाले क्षेत्र तक करीब 22 मिनट में पहुंच सकता है।
हालांकि, मौके की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन का आकलन है कि यह समय करीब पांच मिनट तक भी कम हो सकता है। ऐसे में संवेदनशील क्षेत्रों के लिए प्रभावी निकासी योजना, नियमित जागरूकता और मॉक ड्रिल को महत्वपूर्ण बताया गया है। जिला प्रशासन घेपन झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में भी काम कर रहा है।
इसका उद्देश्य जलस्तर समेत महत्वपूर्ण मानकों की रियल टाइम निगरानी और संभावित खतरे की स्थिति में समय रहते चेतावनी जारी करना है। प्रशासन के अनुसार सी-डैक, तिरुवनंतपुरम द्वारा विकसित प्रणाली का सिस्सु झील में परीक्षण किया जा चुका है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की विशेषज्ञ टीम भी झील और आसपास के क्षेत्र का अध्ययन कर चुकी है।
उपायुक्त ने कहा कि झील के आसपास मौजूद ग्लेशियरों और पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिरता की नियमित वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है। इसके लिए राज्य और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ समन्वय किया जाएगा। प्रशासन का कहना है कि ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में तेजी से बदलती प्राकृतिक परिस्थितियों को देखते हुए पूर्व तैयारी, निरंतर निगरानी, वैज्ञानिक आकलन और विभागीय समन्वय ही संभावित आपदा के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
बाइट- किरण भड़ाना, उपायुक्त लाहौल-स्पीति