लखीसराय भगदड़–7 मौतों में लापरवाही के जिम्मेदार चेहरे:डीएम भीड़ का आंकलन नहीं कर पाए, JE पोल देखने तक नहीं गए, पुलिस क्राउड कंट्रोल में फेल
सावन की तीसरी सोमवारी पर लखीसराय के अशोक धाम में पूजा करने पहुंचे श्रद्धालुओं के बीच भगदड़ मच गई। इसमें 7 महिलाओं की मौत हो गई। हादसे का कारण बिजली का पोल गिरना और करंट की अफवाह बताया जा रहा है, लेकिन मौके की स्थिति और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों से कई सवाल सामने आ रहे है। मंदिर से करीब एक किलोमीटर पहले संकरी सड़क पर हजारों श्रद्धालु जमा थे। यहां एक लाइन की जगह तीन-तीन लाइनें लग गई थीं। इसी बीच लखीसराय हॉल्ट पर दो ट्रेनें आने से भीड़ और बढ़ गई। मौके पर मौजूद लोगों के मुताबिक, बैरिकेडिंग के पास सिर्फ चार पुलिसकर्मी थे। अचानक बिजली का पोल गिरा तो करंट की अफवाह फैल गई और लोग बचने के लिए भागने लगे। इसी दौरान बैरिकेडिंग टूट गई और कई महिलाएं एक-दूसरे के ऊपर गिरती चली गईं। इस भगदड़ में लापरवाही के जिम्मेदार चेहरे कौन हैं? जेई ने बिजली व्यवस्था पर ध्यान क्यों नहीं दिया? सावन के सोमवारी से पहले पोल की जांच क्यों नहीं करवाई गई? क्या डीएम भीड़ का आंकलन नहीं कर पाए? भीड़ नियंत्रण करने वाली पुलिस कहां थी? इन 7 महिलाओं की मौत की लापरवाही में जिम्मेदार चेहरे कौन हैं। पढ़िए स्पेशल रिपोर्ट... जमीन से जुड़े दो जिम्मेदार चेहरे- JE और लाइनमैन 1. JE: 20 दिन पहले मिट्टी कट गई, फिर भी पोल की जांच नहीं की घटना से 20 दिन पहले का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें दिख रहा है जहां बिजली का पोल लगा है उसके आगे खेत है। उस खेत का किसान बिना किसी को जानकारी दिए वहां से मिट्टी खोदकर निकालता दिख रहा है। वीडियो के अनुसार किसान ने पोल के आगे करीब 2 से 3 फीट तक मिट्टी निकालकर वहां गड्ढा कर दिया है। क्या जिम्मेदारी थी? संबंधित इलाके के बिजली विभाग के JE नवीन केवट की पहली जिम्मेदारी फील्ड में लगे पोल और बिजली लाइन की निगरानी करनी थी। किसी पोल के आसपास की जमीन कट जाए, पोल टेढ़ा हो जाए या उसके गिरने का खतरा बने तो JE को मौके पर जाकर जांच करना होता है। जरूरत पड़ने पर लाइन बंद कराने और पोल को सही कराने की प्रक्रिया को भी शुरू करना होता है, लेकिन JE ने इस तरह का कोई कदम नहीं उठाया। अशोक धाम में यह जिम्मेदारी और अहम थी क्योंकि सावन की सोमवारी पर हजारों श्रद्धालुओं के आने की जानकारी पहले से प्रशासन को रहती है। जैसे-जैसे भीड़ बढ़ी पोल के पास गड्ढा रहने के कारण वो झुकता चला गया और एक दिन पहले बारिश होने की वजह से गीली मिट्टी के कारण आसानी से पोल खेत में गिर गया। लापरवाही कहां हुई? JE निरीक्षण करते तो शायद ये हादसा नहीं होता...उस रास्ते से प्रशासन भक्तों के लिए मंदिर में एंट्री राेक सकता था। जब 20 दिनों तक इस पोल की हालत नहीं सुधरी तो बिजली विभाग की फील्ड निगरानी तक यह मामला क्यों और कैसे नहीं पहुंचा? इस मामले को लेकर जब JE नवीन केवट से भास्कर ने बात की, तो उन्होंने कहां हमें पोल टेढ़ा होने की जानकारी थी, लेकिन उससे कोई करंट नहीं निकला है। मुझे जब जानकारी मिली की मौके पर बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जुट रही है, तो मैंने 6 बजकर 9 मिनट पर अपने लाइनमैन को मौके पर भेज दिया था। इतना ही नहीं यहां से उस पोल की लाइन भी काट दी गई थी। इसके बावजूद पोल गिरने पर लोगों ने हंगामा किया जिसकी वजह से हादसा हुआ। जानकारी के अनुसार नवीन केवट ने अभी 15 दिन पहले ही इस जगह पर ज्वाइन किया है। 2. लाइनमैन: फील्ड में खतरा दिखा तो जानकारी किसे दी? लाइनमैन बिजली व्यवस्था का सबसे नजदीकी फील्ड कर्मचारी होता है। पोल की स्थिति, तार और बिजली लाइन में खतरा दिखाई देने पर उसे JE और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी देनी होती है। यह अशोक धाम जाने वाला रास्ता था और सावन की सोमवारी पर यहां 50 हजार से ज्यादा लोगों के पहुंचने की जानकारी पहले से थी। अब जांच में यह भी देखना होगा कि क्या लाइनमैन ने पोल को टेढ़ा देखा था? क्या उसने JE को इसकी जानकारी दी थी? क्या कोई शिकायत या निरीक्षण रिपोर्ट बनी थी? क्या पोल को सहारा देने, बदलने या सोमवार से पहले बिजली बंद करने का कोई प्रयास हुआ था? इन सवालों का जवाब जरूरी है, क्योंकि हादसे के वक्त लोगों ने पोल को गिरते देखा। इसके बाद करंट की बात फैली। लोग डरकर भागने लगे। अगर लाइनमैन पहले ही पोल को असुरक्षित घोषित कर देता तो उस रास्ते से श्रद्धालुओं को हटाया जा सकता था। 3. एग्जीक्यूटिव इंजीनियर: फील्ड की जानकारी ऊपर तक क्यों नहीं पहुंची? JE और लाइनमैन के ऊपर बिजली विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी भी बनती है। बड़े धार्मिक आयोजन से पहले संवेदनशील इलाकों की बिजली व्यवस्था की समीक्षा और फील्ड स्टाफ से रिपोर्ट लेना जरूरी होता है। लापरवाही कहां हुई 20 दिन पहले मिट्टी काटी गई। पोल की स्थिति कमजोर हुई। इसके बाद भी विभाग ने उसे नहीं सुधारा। 4. DM: 50 हजार की भीड़ का आकलन क्यों नहीं हुआ? सावन से पहले DM और मंदिर समिति के अध्यक्ष शैलेंद्र कुमार ने अशोक धाम की व्यवस्था को लेकर कई बार बैठक की थी। इतना ही नहीं एसपी प्रेरणा कुमारी और एसडीएम प्रभाकर कुमार के साथ मिलकर मौके का निरीक्षण भी किया था। इसके बावजूद किसी भी अधिकारी की पोल पर नजर नहीं गई। क्या जिम्मेदारी थी DM जिले में इतने बड़े आयोजन के प्रशासनिक समन्वय के प्रमुख अधिकारी होते हैं। पुलिस, बिजली, स्वास्थ्य, रेलवे और स्थानीय प्रशासन के बीच तालमेल जरूरी था। कितनी भीड़ आएगी, कहां से आएगी और उसे किस रास्ते से नियंत्रित किया जाएगा, इसकी योजना पहले से बननी चाहिए थी... 50 हजार से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचने की स्थिति में व्यवस्था को चरणबद्ध करना जरूरी था। दो ट्रेनें आने वाली हों तो उससे बढ़ने वाली भीड़ का भी आकलन होना चाहिए था। लापरवाही कहां हुई? हादसे के वक्त 50 हजार से ज्यादा श्रद्धालु मौजूद थे। हाल्ट से मंदिर तक करीब एक किलोमीटर तक लाइन लगी थी। संकरी सड़क पर एक लाइन की जगह तीन-तीन लाइन चल रही थी। घुमावदार रास्ता होने की वजह फिसलन भी ज्यादा थी। निरीक्षण के बावजूद मौके पर एक भी CCTV मौजूद नहीं। घुमावदार रास्ता होने के कारण 80-80 मीटर पर CCTV होना चाहिए था, ताकि मौके पर कंट्रोल रूम से नजर रखी जा सके। 100 से ज्यादा SSB जवान तैनात थे, लेकिन कोई भी मौके पर मौजूद नहीं थे। सभी कंट्रोल रूम के पास थे, जो दुर्घटना वाली जगह से करीब 200 मीटर दूर था। बिना सीसीटीवी के ये सभी कैसे भक्तों पर नजर रखते? 5. SDM: आंखों के सामने तीन लाइन चल रही थीं, फिर भी सिंगल नहीं कराई क्या जिम्मेदारी थी SDM प्रभाकर कुमार को भीड़ की स्थिति देखनी थी। रास्ते में खतरा दिखे तो पुलिस और संबंधित विभाग को सूचना देनी थी। भीड़ ज्यादा हो तो लाइन रोकनी थी। जरूरत पड़ने पर रास्ता बदलना था। डीएम से पहले सारी व्यवस्थाओं की जांच पड़ताल करने की जिम्मेदारी भी एसडीएम की होती है। जिसे सही से नहीं निभाया गया। लापरवाही कहां हुई? हादसे वाली सड़क संकरी थी। यहां श्रद्धालु एक लाइन की जगह तीन-तीन लाइन में खड़े थे। इससे सड़क पर भीड़ का दबाव कई गुना बढ़ गया? अगर बैरिकेडिंग सही से बनवाई जाती तो हादसा नहीं होता.. 50 हजार से ज्यादा लोग पहुंच चुके थे। दो ट्रेनें और आ गईं। इसके बावजूद भीड़ को बैच में आगे भेजने की व्यवस्था नहीं की गई। एक साथ बड़ी संख्या में महिलाएं आगे बढ़ने लगीं। मौके पर सिर्फ करीब चार पुलिसकर्मी खड़े थे। भीड़ का दबाव लगातार बढ़ता रहा, जिसके कारण हादसा हुआ। 6. थानाध्यक्ष: हजारों महिलाएं एक साथ घुसीं; 4 जवान देखते रहे क्या जिम्मेदारी थी पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भीड़ को नियंत्रित करना था। संकरी सड़क पर एक ही लाइन चलानी थी। आगे जगह खाली होने के बाद पीछे की भीड़ को भेजना था। महिलाओं और बुजुर्गों की भीड़ को अलग तरीके से नियंत्रित करना था। दो ट्रेनें आने के बाद भीड़ बढ़ी तो अतिरिक्त फोर्स लगानी थी। खतरे वाले पोल के आसपास लोगों को रोकना था। लापरवाही कहां हुई? ग्राउंड इनपुट के मुताबिक संकरी सड़क पर एक लाइन की जगह तीन-तीन लाइन चल रही थीं। पुलिस के जवानों ने लाइन को सिंगल नहीं किया। एक साथ हजारों महिलाएं आगे की तरफ बढ़ने लगीं। मौके पर करीब चार पुलिसकर्मी खड़े थे। वे भीड़ को देख रहे थे, लेकिन भीड़ को बैच में आगे भेजने या पीछे रोकने की प्रभावी व्यवस्था नहीं दिखी। यही सबसे बड़ा भीड़ प्रबंधन फेलियर था। 7. मंदिर प्रबंधन: रास्ते की सुरक्षा पर नजर क्यों नहीं रही? क्या जिम्मेदारी थी मंदिर प्रबंधन को प्रशासन और पुलिस के साथ मिलकर श्रद्धालुओं की आवाजाही की व्यवस्था करनी थी। प्रवेश और निकास की व्यवस्था सुरक्षित रखनी थी। बैरिकेडिंग मजबूत होनी चाहिए थी। भीड़ बढ़ने पर प्रशासन को सूचना देनी थी। बिजली के पोल के पास खतरा दिखाई देता तो उसकी सूचना बिजली विभाग और प्रशासन को देना भी जरूरी था। लापरवाही कहां हुई? मंदिर प्रबंधन को भीड़ के दबाव की जानकारी प्रशासन को लगातार देनी चाहिए थी। अगर मंदिर प्रबंधन प्रशासन को जानकारी देता रहता तो ये रास्ता रोका जाएगा। DM ने पहले ही कराई थी मापी, गाड़े गए थे सीमांकन के पिलर बता दें कि पिछले महीने लखीसराय के डीएम शैलेंद्र ने इसी रास्ते का निरीक्षण किया था। रास्ते की चौड़ाई और जमीन को लेकर चर्चा के दौरान अतिक्रमण का मामला सामने आया था। इसके बाद अमीन से मापी कराकर जमीन का सीमांकन कराया गया और सीमेंटेड पिलर भी गाड़े गए थे। इसके बावजूद स्थानीय लोगों का आरोप है कि मिट्टी की कटाई बंद नहीं हुई। लगातार मिट्टी कटने और बारिश का पानी लगने से बिजली पोल की नींव कमजोर होती गई। हादसे से दो दिन पहले पोल के झुकने की बात भी स्थानीय लोगों ने प्रशासन को बताई थी। अगर यह बात सही है तो यह प्रशासन और बिजली विभाग की निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। FSL की जांच में मिट्टी कटाई की कड़ी सामने आई हादसे के करीब पांच घंटे बाद फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की टीम घटनास्थल पर पहुंची। टीम ने मौके से साक्ष्य जुटाए और बिजली पोल, जमीन और बैरिकेडिंग की स्थिति की जांच की। प्रारंभिक जांच में मिट्टी की कटाई से पोल की नींव कमजोर होने और बैरिकेडिंग की पकड़ प्रभावित होने की बात सामने आई है। जमीन के कमजोर होने के कारण बांस-बल्लियों से बनी बैरिकेडिंग भी भीड़ का दबाव नहीं झेल सकी। यही कमजोर बैरिकेडिंग और उसके पास खड़ा बिजली पोल हादसे के समय एक साथ गिरा, जिसके बाद भगदड़ की स्थिति पैदा हुई। ग्रामीण बोले- पहले ही चेताया था घटनास्थल पर मौजूद हेमंत कुमार, दिवाकर सिंह और राजीव कुमार समेत अन्य स्थानीय लोगों ने बताया कि इस रास्ते की समस्या नई नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, पिछले कई सालों से रास्ता संकरा है। अशोक धाम में हर साल सावन के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती है, लेकिन इसके बावजूद इस 200 मीटर हिस्से का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर सड़क और बिजली पोल के आसपास की जमीन नहीं काटी जाती तो पोल और बैरिकेडिंग की स्थिति मजबूत रहती और शायद हादसा टल सकता था। ग्रामीणों ने यह भी दावा किया कि रास्ते में अभी भी दो अन्य बिजली पोल कमजोर स्थिति में खड़े हैं, जिन्हें लेकर तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।
📡 स्रोत: NewsData.io