मध्यप्रदेश की बेटी कल्पना मिश्रा और उसके अजन्मे बच्चे को न्याय कब? 14 दिन से भूख हड़ताल पर बैठा एक लाचार पिता
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रीवा। संजय गांधी अस्पताल में प्रसव के दौरान कल्पना मिश्रा और उसके बच्चे की मौत का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। बेटी और नाती को खोने के बाद न्याय की मांग को लेकर कल्पना के पिता पिछले 14 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। परिवार की मुख्य मांग है कि मामले में जिम्मेदार डॉक्टरों और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई की जाए।
परिवार का आरोप है कि कल्पना की मौत इलाज में लापरवाही के कारण हुई। परिजनों का कहना है कि घटना की जांच और प्रशासनिक कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन जब तक जिम्मेदार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं होती, तब तक उन्हें न्याय की उम्मीद पूरी होती नहीं दिख रही है।
धरना स्थल पर पिता की पीड़ा उस समय सामने आई, जब उन्होंने अधिकारियों से भावुक होकर कहा, “बेटी तो चली गई, अब इसी धरने पर मेरा भी क्रियाकर्म करा देना।” उनकी यह बात सुनकर धरना स्थल पर मौजूद लोगों का माहौल भी भावुक हो गया।
परिजनों का कहना है कि उनकी मांग किसी राजनीतिक विवाद को खड़ा करना नहीं, बल्कि बेटी और उसके बच्चे की मौत के लिए जिम्मेदारी तय कराना है। परिवार चाहता है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और यदि इलाज में लापरवाही या किसी की जिम्मेदारी सामने आती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाए।
लगातार 14 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे पिता की तबीयत भी चिंता का विषय बनी हुई है। इसके बावजूद परिवार का कहना है कि जब तक उनकी प्रमुख मांग पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, उनका संघर्ष जारी रहेगा।
कल्पना मिश्रा की मौत के साथ उसके अजन्मे बच्चे को भी खोने वाले परिवार के सामने अब एक ही सवाल है कि आखिर उन्हें न्याय कब मिलेगा। एक पिता अपनी बेटी की मौत का जवाब और जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर दो सप्ताह से धरने पर बैठा है। अब निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
💡 पृष्ठभूमि (Background)
मध्यप्रदेश के रीवा में एक अस्पताल में प्रसव के दौरान बेटी कल्पना मिश्रा और उसके अजन्मे बच्चे की मौत हो गई। पिता 14 दिन से भूख हड़ताल पर हैं, डॉक्टरों पर एफआईआर की मांग करते हुए न्याय की पुकार कर रहे हैं। यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर करती है, जिससे जनता का अस्पतालों पर विश्वास घट सकता है। यदि इस पर उचित कार्रवाई नहीं हुई तो रोगी परिवारों में भय और अविश्वास बढ़ेगा, और चिकित्सा क्षेत्र में सुधार के लिए दबाव बढ़ेगा।