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मध्यप्रदेश में छात्रावासों की बदहाली: शिक्षा के सपनों के बीच संघर्ष करते विद्यार्थी

लेखक: Kumari Priyanka अंतिम अपडेट: 21 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
मध्यप्रदेश में छात्रावासों की बदहाली: शिक्षा के सपनों के बीच संघर्ष करते विद्यार्थी

मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के विद्यार्थियों के लिए संचालित छात्रावासों की स्थिति को लेकर लगातार सामने आ रही खबरें और शिकायतें बेहद चिंताजनक और पीड़ादायक हैं।

जिन छात्रावासों को सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का सहारा, सुरक्षित आवास और बेहतर भविष्य की आधारशिला बनना चाहिए, उन्हीं छात्रावासों में अनेक विद्यार्थी आज मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं।

प्रदेश के किसी न किसी जिले से लगभग निरंतर छात्रावासों की अव्यवस्था, जर्जर भवन, भोजन, पेयजल, बिजली, स्वच्छता, सुरक्षा और अन्य आवश्यक सुविधाओं के अभाव की खबरें सामने आती रहती हैं।

कहीं विद्यार्थी अपनी समस्याओं को लेकर कई किलोमीटर पैदल चलकर जिला मुख्यालय और कलेक्ट्रेट पहुंचते हैं, तो कहीं घंटों तेज धूप में बैठकर प्रशासनिक अधिकारियों से मिलने और अपना आवेदन देने की प्रतीक्षा करते हैं।

उनके हाथ में कोई विशेष सुविधा या विलासिता की मांग नहीं होती, बल्कि अपनी बुनियादी जरूरतों और अधिकारों से संबंधित आवेदन होता है।

विडंबना यह है कि जिन विद्यार्थियों का बहुमूल्य समय पढ़ाई, पुस्तकालय और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगना चाहिए, उन्हें अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। कई बार अधिकारी से संवाद के लिए भी उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ता है।

यह स्थिति केवल प्रशासनिक अव्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि उन विद्यार्थियों की उम्मीदों, आत्मसम्मान और भविष्य से भी जुड़ा गंभीर प्रश्न है। ग्रामीण, गरीब और सामाजिक रूप से वंचित परिवारों से आने वाले अनेक विद्यार्थियों के लिए छात्रावास केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि शिक्षा तक पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम है।

परिवार की सीमित आर्थिक परिस्थितियों के बीच ये विद्यार्थी अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए घर से दूर रहकर पढ़ाई करते हैं। उनके माता-पिता अनेक कठिनाइयों के बावजूद अपने बच्चों को इस उम्मीद से पढ़ने भेजते हैं कि शिक्षा उनके जीवन की दिशा बदलेगी।

ऐसे में छात्रावास की खराब व्यवस्था का असर केवल वर्तमान सुविधा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विद्यार्थी की शिक्षा, स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति, सुरक्षा और भविष्य तक पहुंचता है।

सबसे अधिक चिंता तब होती है, जब छात्रावासों में रहने वाली छात्राओं से जुड़ी ऐसी शिकायतें सामने आती हैं कि उनसे रोटियां बनवाई जाती हैं और भोजन तैयार करने जैसे कार्य कराए जाते हैं।

अनेकों ट्राईवल क्षेत्र के कन्या छात्रावास में अधीक्षकों के द्वारा छात्राओं से इस प्रकार का कार्य कराया जा रहा है, यह अत्यंत गंभीर विषय है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। छात्राएं छात्रावास में पढ़ने, आगे बढ़ने और अपने भविष्य का निर्माण करने आती हैं।

उनके हाथों में किताब और कलम होनी चाहिए, न कि व्यवस्था की कमी के कारण उन्हें छात्रावास की रसोई में खड़े होकर रोटियां बनाने के लिए मजबूर होना पड़े।

यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब छात्रावासों में भोजन व्यवस्था के लिए बजट, संसाधन और जिम्मेदार व्यवस्था निर्धारित है, तो छात्राओं से भोजन तैयार करने का कार्य क्यों कराया जा रहा है? ऐसी शिकायतों को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

कन्या छात्रावासों में छात्राओं की शिक्षा, सुरक्षा, गरिमा और सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच अंतर क्यों?

मध्यप्रदेश शासन की विभिन्न छात्रावास योजनाओं में विद्यार्थियों को आवास, भोजन, बिजली-पानी, फर्नीचर, बिस्तर, पुस्तकालय और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों दिखाई देता है?

यदि व्यवस्था पर्याप्त है तो विद्यार्थी मूलभूत सुविधाओं के लिए कलेक्ट्रेट क्यों पहुंच रहे हैं? यदि निरीक्षण नियमित हैं तो जर्जर भवन, भोजन की समस्या, स्वच्छ पेयजल की कमी और अन्य अव्यवस्थाएं समय रहते क्यों नहीं सुधारी जातीं? यदि बजट उपलब्ध है तो उसका प्रभाव छात्रावासों की वास्तविक जमीनी स्थिति में दिखाई क्यों नहीं देता?

यह स्थिति केवल किसी एक अधिकारी या किसी एक छात्रावास की समस्या मानकर टाल देना उचित नहीं होगा। यह पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का प्रश्न है।

जरूरत है व्यापक ऑडिट और जवाबदेही की

सरकार को प्रदेश के सभी अनुसूचित जाति एवं जनजाति छात्रावासों की वास्तविक स्थिति का व्यापक भौतिक एवं सामाजिक ऑडिट कराना चाहिए। प्रत्येक छात्रावास की भवन स्थिति, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, भोजन, शौचालय, सुरक्षा, फर्नीचर, अध्ययन सुविधा, कर्मचारियों की उपलब्धता और बजट के उपयोग की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए।

विशेष रूप से कन्या छात्रावासों में छात्राओं से भोजन बनाने अथवा अन्य श्रम कराने संबंधी शिकायतों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्रावासों की शिकायतों के लिए केवल कागजी व्यवस्था न हो, बल्कि ऐसी प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली हो, जहां विद्यार्थी बिना किसी भय या दबाव के अपनी समस्या दर्ज करा सकें और निश्चित समय सीमा में उसका समाधान हो।

शिकायत करने वाले विद्यार्थी को ही समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराने या उसकी आवाज दबाने के बजाय शिकायत को व्यवस्था सुधारने का अवसर माना जाना चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक और संवेदनशील शासन की वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि वह समाज के सबसे कमजोर वर्ग के साथ कैसा व्यवहार करता है।

अनुसूचित जाति, जनजाति तथा पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थी किसी कृपा या दया के पात्र नहीं, बल्कि वे भी इसी समाज और इसी संविधान के नागरिक हैं। उन्हें सम्मानजनक जीवन, सुरक्षित वातावरण तथा शिक्षा के समान अवसर प्राप्त करने का पूरा अधिकार है।

किताबों की जगह शिकायतों का बोझ क्यों?

जिस विद्यार्थी को किताब लेकर कक्षा में होना चाहिए, यदि वह अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए कलेक्ट्रेट के बाहर घंटों धूप में बैठा है, तो यह केवल उस विद्यार्थी की परेशानी नहीं है। यह हमारी शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न है।

जिस छात्रा के हाथ में कलम और किताब होनी चाहिए, यदि वह व्यवस्था की कमी के कारण रोटियां बनाने के लिए मजबूर है, तो यह केवल एक छात्रावास की कहानी नहीं, बल्कि उन व्यवस्थागत कमियों का आईना है जिन्हें अब अनदेखा नहीं किया जा सकता।

विद्यार्थियों की आवाज को बार-बार आवेदन लेकर आने वाली भीड़ समझने के बजाय उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनना होगा। उन्हें आश्वासन नहीं, समाधान चाहिए। निरीक्षण की औपचारिकता नहीं, व्यवस्था में वास्तविक बदलाव चाहिए।

जर्जर छात्रावासों की मरम्मत और पुनर्निर्माण, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पेयजल, बिजली, स्वच्छता, सुरक्षित वातावरण और अध्ययन की सुविधाएं सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छात्रावासों को ऐसा विकसित किया जाए, जहां विद्यार्थी अपने भविष्य के सपने देख सकें और उन्हें पूरा करने के लिए एकाग्रता से पढ़ सकें। उन्हें अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करने, अधिकारियों के चक्कर लगाने और व्यवस्था की कमियों का बोझ अपने कंधों पर उठाने के लिए मजबूर न होना पड़े।

कब तक विद्यार्थी किताबों की जगह शिकायतों का बोझ उठाते रहेंगे? मध्यप्रदेश के छात्रावास मजबूरी का ठिकाना नहीं, विद्यार्थियों के सपनों की सुरक्षित नींव बनें। क्योंकि किताबों की उम्र में जब विद्यार्थी शिकायतों का बोझ उठाने लगे, तो सवाल केवल व्यवस्था का नहीं, सामाजिक न्याय की संवेदनशीलता का है।

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Kumari Priyanka

कुमारी प्रियंका वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं चिंतक हैं। जिनका समाज के विभिन्न हिस्सों और समस्याओं पर गहरा अध्ययन है।