महिला सशक्तिकरण का दावा खोखला... स्व-सहायता समूहों को भुगतान न कर महिलाओं को परेशान कर रही भाजपा सरकार..... रमेश के साहू एडवोकेट
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महीनों से भुगतान लंबित, महंगाई के बावजूद वर्षों पुरानी दरों पर पोषण आहार बनाने को मजबूर महिलाएं..
इटारसी नर्मदापुरम
कांग्रेस नेता एवं अधिवक्ता रमेश के. साहू ने आंगनबाड़ियों और विद्यालयों में बच्चों के लिए पोषण आहार तैयार करने वाली स्व-सहायता समूहों की महिलाओं की समस्याओं को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार महिला सशक्तिकरण और महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर मेहनत करने वाली महिलाओं को समय पर भुगतान तक नहीं दिया जा रहा है।
रमेश के साहू ने कहा कि प्रदेश में हजारों महिलाएं स्व-सहायता समूहों के माध्यम से उक्त कार्य में लगी है जिनको तीन से चार महीने तक भुगतान नहीं मिलना गंभीर लापरवाही है।
एडवोकेट साहू ने कहा कि वर्ष 2018 से नाश्ते के लिए मात्र 3 रुपये और भोजन के लिए 5 रुपये प्रति बच्चे की दर निर्धारित है, जबकि बीते वर्षों में खाद्यान्न, दाल, सब्जी, तेल, मसाले और रसोई गैस की कीमतों में कई गुना वृद्धि हो चुकी है। इतनी कम राशि में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है।
श्री साहू ने कहा कि जिन महिलाओं के श्रम पर बच्चों की पोषण व्यवस्था निर्भर है, उन्हीं महिलाओं को भुगतान के लिए सड़क पर उतरना पड़े तो सरकार के महिला सशक्तिकरण के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की कि स्व-सहायता समूहों का समस्त लंबित भुगतान तत्काल जारी किया जाए, नाश्ता एवं भोजन की दरें वर्तमान महंगाई के अनुसार बढ़ाई जाएं, राशन की मात्रा में कम से कम 20 प्रतिशत वृद्धि की जाए,तय तिथि पर भुगतान हो ताकि कार्य प्रभावित न हो।
श्री साहू ने कहा कि महिला समूहों की उक्त समस्याओं के लिए कांग्रेस उनके साथ है और आवश्यकता पड़ने पर सरकार के खिलाफ युक्ति युक्त कार्रवाई की जाएगी।
💡 पृष्ठभूमि (Background)
यह खबर महिला सशक्तिकरण के दावे के पीछे की असमानता पर प्रकाश डालती है, जहाँ स्व‑सहायता समूहों को भुगतान नहीं मिलता और उन्हें महंगाई के बावजूद पुराने दरों पर पोषण आहार बनाने के लिए मजबूर किया जाता है। यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि सरकार की नीतियाँ महिलाओं के आर्थिक अधिकारों को कैसे प्रभावित कर रही हैं। यदि इस पर कार्यवाही नहीं की गई, तो महिलाएँ आर्थिक रूप से और सामाजिक रूप से पीछे रह सकती हैं, जिससे ग्रामीण समाज की समग्र प्रगति पर नकारात्मक असर पड़ेगा।