इतिहास

मनपुरा गढ़ी में छिपा है धंधरे चौहानों और खंगार वंश की विरासत का इतिहास

लेखक: Ranu Parihar अंतिम अपडेट: 16 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
मनपुरा गढ़ी में छिपा है धंधरे चौहानों और खंगार वंश की विरासत का इतिहास

पिछोर के आसपास के गांवों पर रहा धंधरे चौहानों का प्रभाव, स्थानीय परंपराओं में इस भूभाग को कहा जाता है ‘धंधेलखण्ड’; संरक्षण के अभाव में करीब 500 साल पुरानी गढ़ी हो रही जर्जर

मनपुरा, पिछोर। शिवपुरी जिले की पिछोर तहसील का ग्राम मनपुरा आज भले ही एक सामान्य ग्रामीण क्षेत्र के रूप में जाना जाता हो, लेकिन यहां मौजूद पुरानी गढ़ी इस इलाके के रियासतकालीन इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है। स्थानीय इतिहासकारों और बुजुर्गों के अनुसार, यह गढ़ी धंधरे चौहानों से जुड़ी रही है और आसपास का क्षेत्र लंबे समय तक ‘धंधेलखण्ड’ के नाम से जाना जाता था।

स्थानीय भाटों और इतिहास के जानकारों के अनुसार, बुंदेलखंड में खंगार वंश का प्रभाव 12वीं शताब्दी में स्थापित हुआ। मान्यता है कि पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख सामंत खेत सिंह खंगार ने परमार वंश के गढ़पति को पराजित कर गढ़कुंडार दुर्ग पर अधिकार किया और खंगार वंश की नींव रखी। गढ़कुंडार को खंगारों की राजधानी बताया जाता है, जहां से दक्षिण-पश्चिम बुंदेलखंड के विभिन्न क्षेत्रों में उनके प्रभाव का विस्तार हुआ।

पिछोर क्षेत्र भी इसी ऐतिहासिक विस्तार से जुड़ा माना जाता है। हालांकि पिछोर नगर की स्थापना 16वीं-17वीं शताब्दी में जाट राजा भागीरथ देव देवदरिया द्वारा गढ़ी के रूप में किए जाने का उल्लेख मिलता है, लेकिन आसपास के ग्रामीण इलाकों में खंगारों और बाद में चौहान वंश की विभिन्न शाखाओं के ठिकानों का प्रभाव रहा।

स्थानीय इतिहास परंपरा के अनुसार, पृथ्वीराज चौहान के बाद चौहान वंश की कई शाखाएं मध्य भारत की ओर आईं। इन्हीं शाखाओं में धंधरे चौहानों का भी उल्लेख मिलता है। धंधरे चौहान स्वयं को खंगारों से अलग परंपरा के बजाय उनसे जुड़े सहयोगी वंश-समूह के रूप में देखते हैं।

कहा जाता है कि 14वीं और 15वीं शताब्दी के दौरान धंधरे सरदारों का पिछोर क्षेत्र के कई गांवों पर प्रभाव स्थापित हुआ। स्थानीय मान्यता के अनुसार उनका प्रभाव 12 से 24 गांवों तक रहा। ऊंचे स्थानों पर गढ़ियों का निर्माण कर इन ठिकानों से क्षेत्र की सुरक्षा और महत्वपूर्ण मार्गों पर निगरानी रखी जाती थी। इसी प्रभाव वाले भूभाग को स्थानीय तौर पर ‘धंधेलखण्ड’ कहा जाने लगा और मनपुरा की गढ़ी को उनकी प्रमुख कचहरी और ठिकाने के रूप में बताया जाता है।

मनपुरा की पुरानी गढ़ी की संरचना भी इस क्षेत्र की पारंपरिक गढ़ियों की याद दिलाती है। गढ़ी में मिट्टी और लाखौरी ईंटों से बनी मोटी दीवारों, बुर्ज, बड़े प्रवेश द्वार तथा अंदर अन्न भंडारण और शिव मंदिर के अवशेष बताए जाते हैं। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, लंबे समय तक यह गढ़ी क्षेत्रीय गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रही।

समय के साथ रियासतों और जमींदारी व्यवस्था का अंत होने के बाद गढ़ी का राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व समाप्त हो गया। देखरेख के अभाव में ऐतिहासिक संरचना अब धीरे-धीरे जर्जर होती जा रही है। पिछोर के मुख्य किले को लेकर पुरातत्व विभाग की गतिविधियां और सर्वे सामने आने के बावजूद मनपुरा की इस पुरानी गढ़ी की ओर अभी अपेक्षित ध्यान नहीं पहुंचा है।

ग्रामीणों और धंधरे चौहान समाज की मांग है कि मनपुरा गढ़ी का पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक सर्वे कराया जाए और इसके महत्व का आकलन करने के बाद संरक्षण की दिशा में कदम उठाए जाएं। उनका कहना है कि यदि गढ़ी का संरक्षण कर यहां छोटा संग्रहालय या विरासत केंद्र विकसित किया जाए तो पिछोर और आसपास के क्षेत्र के इतिहास को सामने लाने के साथ पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।

मनपुरा की यह गढ़ी आज संरक्षण की प्रतीक्षा कर रही है। यदि समय रहते इसकी ऐतिहासिक संरचना को सुरक्षित नहीं किया गया तो बुंदेलखंड के खंगार और धंधरे चौहान इतिहास से जुड़ी स्थानीय विरासत का यह महत्वपूर्ण प्रमाण धीरे-धीरे समाप्त हो सकता है।

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Ranu Parihar

रानू परिहार शिवपुरी के वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो लंबे समय से जनसमस्याओं और सामाजिक मुद्दों को अपनी पत्रकारिता के माध्यम से सामने लाते हैं। वे जमीनी स्तर की खबरों और जनसरोकार से जुड़े विषयों को प्रमुखता से उठाते हैं।