मंदिर नहीं पहुंच पाने वाले बुजुर्गों के घर पहुंचेगी भक्ति की टोली, श्री नारायण संदेश परिषद की अनूठी पहल
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भोपाल। वृद्धावस्था या अधिक दूरी के कारण मंदिर पहुंचकर पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों में शामिल नहीं हो पाने वाले बुजुर्गों को अब घर पर ही पूजा, भजन और सत्संग से जुड़ने का अवसर मिलेगा। श्री नारायण संदेश परिषद, कोलार रोड ने बुजुर्ग सदस्यों को धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों से जोड़े रखने के उद्देश्य से यह नई पहल शुरू की है।
परिषद ने निर्णय लिया है कि जो बुजुर्ग उम्र अधिक होने, स्वास्थ्य संबंधी परेशानी या मंदिर से दूरी के कारण नियमित रूप से मंदिर नहीं आ पाते, उनके घर परिषद के सदस्यों की टोली पहुंचेगी। वहां पूजा-अर्चना के साथ भजन-कीर्तन और सत्संग किया जाएगा। इसके माध्यम से बुजुर्गों को भक्ति से जोड़े रखने के साथ समाज के सदस्यों से उनका मेल-जोल और आत्मीय संबंध बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा।
इस अभियान की शुरुआत मंदिर के निकट रहने वाले परिषद के सदस्य के.जी. सुरेश के निवास से की गई। परिषद के सदस्य उनके घर पहुंचे और सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना एवं भजन-कीर्तन किया। इसके बाद अन्य परिवारों के घर भी पहुंचकर भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया।
परिषद के अध्यक्ष पी. सुभाष ने बताया कि इस पहल को आगे भी लगातार जारी रखा जाएगा और परिषद के सदस्यों के घर जाकर पूजा एवं भजन-कीर्तन आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि समाज में कई बुजुर्ग ऐसे हैं, जो अधिक उम्र या दूरी के कारण चाहकर भी मंदिर नहीं पहुंच पाते। ऐसे बुजुर्गों के मन में भक्ति का भाव बनाए रखने, उन्हें मानसिक शांति देने और समाज के लोगों के साथ उनका संपर्क एवं मेल-जोल कायम रखने के उद्देश्य से यह अभियान शुरू किया गया है।
परिषद का मानना है कि मंदिर तक नहीं पहुंच पाने की मजबूरी किसी बुजुर्ग को धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों से दूर करने का कारण नहीं बननी चाहिए। इसी सोच के साथ परिषद अब भक्ति और सत्संग को बुजुर्ग सदस्यों के घर तक पहुंचाने का प्रयास करेगी। पहल के शुभारंभ अवसर पर परिषद के अनेक सदस्य उपस्थित रहे।
💡 पृष्ठभूमि (Background)
भक्ति की टोली के रूप में श्री नारायण संदेश परिषद ने बुजुर्गों के लिए घर पर पूजा और भजन की व्यवस्था शुरू की है। यह पहल उन वरिष्ठ नागरिकों के लिए है जो उम्र, स्वास्थ्य या दूरी के कारण मंदिर नहीं पहुँच पाते। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बुजुर्गों की आध्यात्मिक और सामाजिक ज़रूरतों को पहचानती है और उन्हें समावेशी रूप से जोड़ने का प्रयास करती है। इसके परिणामस्वरूप वृद्धों का मनोबल बढ़ेगा, अकेलापन घटेगा और समाज में एकजुटता की भावना प्रबल होगी।