राजनीति

मंत्रीजी ने गले लगाकर दी 'सांत्वना':सीढ़ियों पर बुलाकर अपने ही नेता पर टूट पड़े; घर में 'एंट्री' के लिए नाम वापस

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 4 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
मंत्रीजी ने गले लगाकर दी 'सांत्वना':सीढ़ियों पर बुलाकर अपने ही नेता पर टूट पड़े; घर में 'एंट्री' के लिए नाम वापस

नमस्कार, जिनकी झोली में टिकट नहीं आया वे भरे-भरे घूम रहे हैं। ऐसे कार्यकर्ताओं से सावधान रहने की जरूरत है। बीकानेर में टिकट कटने के बाद कार्यकर्ता ने जिलाध्यक्ष की पिटाई कर दी। वहीं जोधपुर में केंद्रीय मंत्री ने गले लगाकर कार्यकर्ता को सांत्वना दी। अजमेर में पत्नियों के लिए पतियों ने नाम वापस ले लिया।

केकड़ी में विधायकजी को काम गिनाने पड़ गए। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में... 1. झोली खाली तो 'भरे-भरे' घूम रहे कार्यकर्ताओं को टिकट देने में भूमिका निभाने वाले नेताओं को खबरदार किया जाता है कि कुछ दिन अपना बचाव करके रहें।

जिनकी झोली में टिकट नहीं आया, ऐसे कार्यकर्ता मार्केट में भरे-भरे घूम रहे हैं। टिकट से महरूम कोई कार्यकर्ता अगर आकर कहे कि दो मिनट अकेले में आइये, बात करनी है। तो उसके साथ कतई एकांत में न जाएं। यह कदम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। बीकानेर में कांग्रेस पदाधिकारी मदन गोपाल मेघवाल जी ने कार्यकर्ता पर भरोसा कर लिया।

वे उसके साथ कार्यालय से बाहर सीढ़ियों पर आ गए। वहीं मौका पाकर कार्यकर्ता ने टिकट न मिलने की खुन्नस मिटा ली। जानकारी के मुताबित कार्यकर्ता और उसके साथियों ने 5 सेकेंड में 17 थप्पड़ जमाए और टोली फरार हो गई।

पिटाई की स्पीड से अंदाजा लगाया जा सकता है कि टिकट मिलने पर यह कार्यकर्ता कितने कम समय में कितने अधिक कार्य कर सकता था। उधर, दूसरी पार्टी में संस्कारों की प्रबलता रही। केंद्रीय मंत्रीजी को सामने देखकर टिकटहीन रह गए कार्यकर्ता की रुलाई फूट पड़ी। वह निढाल प्रेमिका की तरह मंत्रीजी के गले जा लगा।

उनकी गर्दन के पास मुंह छुपाकर सुबक-सुबक कर रोया। मंत्रीजी ने कुशल प्रेमी की तरह उसे संभाला। सांत्वाना दी। पार्टी के साथ खड़े रहने का हौसला दिया। मंत्रीजी से इतनी आत्मीयता पाकर कार्यकर्ता का मलाल जाता रहा। वह मुस्कुराने लगा। दौसा में साहिबा दीदी के साथ अजब वाकया हो गया।

उनके नाम पर बीजेपी का टिकट आ गया और साहिबा जी को पता भी नहीं चला। न किसी ने सूचना दी और न कोई फोन आया। मजे के बात ये कि बीजेपी के टिकट के लिए उन्होंने पर्चा भी नहीं भरा था। वे तो नामांकन तक नहीं कर पाईं। बाद में पता चला कि गफलत हो गई थी। 2.

पत्नी के लिए वापस ले लिया नाम जहां चुनाव लड़ने पर आमादा कार्यकर्ता टिकट कटने पर जूता चलाने से नहीं चूक रहे। ऐसे में अजमेर में दो महानुभाव ने मिसाल पेश कर दी। दोनों ने निर्दलीय पर्चा भरा था। दोनों ही अपना नाम वापस लेने आए थे। एक ने कहा- मेरी पत्नी निर्दलीय चुनाव लड़ रही है। इसलिए अब मैं अपना नाम वापस ले रहा हूं।

दूसरे महोदय भाजपा के पुराने कार्यकर्ता निकले। टिकट नहीं मिला तो बागी हो गए। उन्होंने खुद भी निर्दलीय पर्चा भर दिया और पत्नी को भी निर्दलीय पर्चा भरवा दिया। अब पत्नी के समर्थन में अपना नाम वापस लेने पहुंचे थे। पत्रकार ने पूछा तो महोदय बोले- पत्नी अगर चुनावी मैदान में है तो उसके सामने लड़ने की हिम्मत कैसे कर सकता हूं।

घर में एंट्री भी तो चाहिए। इसलिए पत्नी के समर्थन में नाम वापस ले रहा हूं। चुनाव तो आने-जाने हैं। पांच साल बाद फिर होंगे। पत्नी से तो सात जन्म का रिश्ता है। पत्नी को नाराज करके इहलोक में अशांति थोड़े पैदा करनी है। हारकर जीतने वाले बाजीगरों से भले उनका सपना दूर हो गया, लेकिन पत्नियों को मौका देकर वे उनकी नजर चढ़ गए। 3.

काम गिनाओ अभियान विधायकजी की परीक्षाएं शुरू हो गई हैं। अब उन्हें शहर की गली-गली घूमकर अपने पार्षदों को पक्ष में माहौल बनाना पड़ रहा है। केकड़ी से भाजपा विधायक तो साम दान दंड भेद सब कुछ लगाकर अपने पार्षदों की जीत के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। यहां तक वे विरोधी पार्टी का चेयरमैन तक पकड़ लाए थे।

दावे के मुताबिक उसे डरा-धमका कर पटका पहनवा दिया था और बाइक पर लेकर शहर में घूमे थे। लेकिन दो दिन बाद विरोधी पार्टी ने पूरा जोर लगाकर अपने चेयरमैन को वापस पार्टी में खींच लिया। विधायकजी की किरकिरी हो गई। चुनाव में तो यह रस्साकशी चलती ही रहती है। असली परीक्षा को अब शुरू हुई है। नाम फाइनल हो चुके हैं।

प्रत्याशी मैदान में हैं। अब जनता से सामना हो रहा है। जनता के मन में इस समय सड़क, बिजली, पानी, नाली, शिक्षा, चिकित्सा सब घूम रहा है। एक चुनाव का वक्त ही तो होता है जब पांच साल सोयी पड़ी जनता जाग जाती और उसके मन में सवाल कुलबुलाने लगते हैं। तो विधायक जी अपने एक पार्षद के लिए नुक्कड़ सभा कर रहे थे।

जनता की मांग पर वे काम निगा रहे थे। वे बोले- बड़े तालाब का काम शुरू हो गया। जनता बोली- हां हो गया। श्मशानों का काम शुरू हो गया। हां हो गया। सड़कें बन रही हैं। इस पर जनता में घुसमुस होने लगी। एक जागरूक वोटर बोला- मांजी के तिबारा की सड़क का क्या अपडेट है?

विधायकजी बोले- मांजी के तिबारे की सारी सड़कें बन रही हैं और ये सड़क भी जल्दी बन जाएगी। इससे पहले दूसरा वोटर जागता, पार्षद प्रत्याशी ने ताली बजाकर माहौल में गड़गड़ाहट पैदा कर दी। 4. चलते-चलते.. जेन-जी और अल्फा का नाम आते ही लगता है कि ये किन्हीं हथियारों के नाम हैं। जिनके जरिए व्यवस्थाओं पर हमला बोला जा सकता है।

ऐसा सोचकर हम जेन-जी और अल्फा की ताकत को कम आंकते हैं। जालोर की 12-13 साल की बच्ची श्री राजपुरोहित कम उम्र में ही राजस्थानी गीतों की मुरीद हो गई है। राजस्थानी गीत और भजन गाने की ऐसी दीवानगी कि वह घर पर बाकायदा रियाज करती है। साथ ही जब भी मौका मिलता है वह भजन की प्रस्तुति देती है।

प्रोफेशनल सिंगर की तरह हजारों के हुजूम में बेझिझक गीत गाती है और श्रोताओं को गायन में शामिल करती है। राजस्थान की आन-बान और शान के गीत वह अपनी क्लास में भी सुनाती है। श्री का एक वीडियो सामने आया जिसमें वह क्लास में घूम-घूमकर मेवाड़ी सरदार महाराणा प्रताप के शौर्य और वीरता का गीत सुना रही है।

सभी बच्चे शांति से गीत सुन रहे हैं। जेन-जी और अल्फा बनी-बनाई दोषपूर्ण व्यवस्था को बदलने का माद्दा तो रखते ही हैं। साथ ही सदियों की समृद्ध विरासत को बचाने की ताकत भी रखते हैं। इनपुट सहयोग- जयदीप पुरोहित (जोधपुर), अनुराग हर्ष (बीकानेर), भरत मूलचंदानी (अजमेर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें।

अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगाी।

📡 स्रोत: NewsData.io

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