मताधिकार से वंचित करने वाली प्रक्रिया मनमानी:सुप्रीम कोर्ट के जज बोले- कोई बहाना इसे सही नहीं ठहरा सकता, मताधिकार के बिना नागरिक अर्थहीन
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि लाखों भारतीयों को मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी है। ऐसी प्रक्रिया संवैधानिक व्यवस्था को नकारती है। कोई भी बहाना इसे सही नहीं ठहरा सकता। जस्टिस भुइयां रविवार को हैदराबाद में NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
हालांकि, अपने भाषण में उन्होंने किसी खास प्रक्रिया या अथॉरिटी का नाम नहीं लिया। जस्टिस भुइयां की स्पीच, 5 बड़ी बातें… अरबपति हो रिक्शा चालक, दोनों के वोट बराबर जस्टिस भुइयां ने कहा, “भारतीय नागरिकों का मतदान का अधिकार, विदेशी शासन के खिलाफ भारत के लंबे संघर्ष से जुड़ा हुआ है। यह हमारी आजादी की अभिव्यक्ति है।
अनुच्छेद 326 में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं किया जा सकता।” उन्होंने कहा- "एक व्यक्ति अरबपति हो सकता है और दूसरा रिक्शा चालक; फिर भी दोनों के पास अपने वोट होंगे और उनके वोटों का मूल्य बराबर होगा।" अमेरिकी जज जस्टिस फेलिक्स फ्रैंकफर्टर की टिप्पणी का हवाला देते हुए कि लोकतंत्र में सर्वोच्च पद नागरिक का होता है, जस्टिस भुइयां ने पूछा- “मतदान के अधिकार के बिना एक नागरिक का क्या मूल्य है?” --------------------- ये खबर भी पढ़ें… केरलम सरकार का ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जांच का आदेश: 2006 में PWD इंजीनियर की आत्महत्या का मामला; CEC तब राज्य में सचिव थे केरलम के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने 4 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं।
मामला मलेशियाई सिविल इंजीनियर ली सी बीन की आत्महत्या से जुड़ा है। वह केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (KSTP) के तहत MC रोड के अपग्रेडेशन का काम कर रहे PATI-BEL कंसोर्टियम से जुड़े थे। पढ़ें पूरी खबर…
📡 स्रोत: Dainik Bhaskar
💡 पृष्ठभूमि (Background)
मताधिकार से वंचित करने की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने मनमानी कहा है, यह कहते हुए कि ऐसी कोई भी व्यवस्था संवैधानिक ढांचे को नकारती है। यह विषय भारतीय लोकतंत्र के मूलभूत अधिकार पर प्रकाश डालता है, क्योंकि मताधिकार नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी का आधार है। खबर की महत्ता इसलिए है क्योंकि यह न्यायपालिका की भूमिका को उजागर करती है, जो नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय है। यदि ऐसी मनमानी प्रक्रियाएँ जारी रहती हैं, तो आम जनता के मतदान के अधिकार पर असर पड़ेगा, जिससे लोकतांत्