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मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को गति दे रहा छत्तीसगढ़

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 26 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को गति दे रहा छत्तीसगढ़

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ के विजन के अनुरूप भिलाई इस्पात संयंत्र आने वाले वर्षों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ तकनीकी नवाचार, कस्टमाइजेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ग्रीन स्टील पर फोकस बढ़ाने की तैयारी में है। संयंत्र की प्रस्तावित विस्तार योजना के तहत इसकी क्षमता को मौजूदा स्तर से लगभग डेढ़ गुना तक बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

भिलाई इस्पात संयंत्र के वरिष्ठ जनसंपर्क अधिकारी अमूल्य प्रियदर्शी ने बताया कि देश के इंफ्रास्ट्रक्चर, रेलवे और रक्षा क्षेत्र में BSP लंबे समय से महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है। भविष्य में इस योगदान को और व्यापक बनाने के लिए विस्तार परियोजनाओं के साथ नई तकनीक और जरूरत के मुताबिक उत्पाद तैयार करने पर जोर रहेगा।

डेढ़ गुना बढ़ेगी संयंत्र की क्षमता अमूल्य प्रियदर्शी के मुताबिक, भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए एक बड़ा एक्सपेंशन प्रोजेक्ट प्रस्तावित है। इसके पूरा होने के बाद संयंत्र की उत्पादन क्षमता लगभग डेढ़ गुना बढ़ाई जा सकेगी। इस विस्तार के तहत नए विभाग और नई शॉप्स विकसित की जाएंगी।

रेल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए URSN नाम से नई योजना पर भी काम किया जा रहा है। प्रियदर्शी के अनुसार, यह पुराने रेल से जुड़े शॉप की जगह विकसित किया जाएगा। इसके लिए जगह और प्लानिंग की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और जल्द ही काम शुरू होने की बात कही गई है।

बाइट = अमूल्य प्रियदर्शी, प्रभारी महाप्रबंधक जनसंपर्क भिलाई इस्पात संयंत्र

भिलाई इस्पात संयंत्र लंबे समय से देश के रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए रेल निर्माण और आपूर्ति करता रहा है। इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में भी BSP की स्टील प्लेटों का इस्तेमाल कई महत्वपूर्ण युद्धपोतों के निर्माण में हुआ है।

बताया गया कि आईएनएस विक्रांत, आईएनएस नीलगिरी, आईएनएस उदयगिरि, आईएनएस हिमगिरि और आईएनएस विंध्यगिरि जैसे युद्धपोतों के निर्माण में भिलाई इस्पात संयंत्र की प्लेटों का उपयोग किया गया है।

देश के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भी SAIL और BSP के स्टील का योगदान रहा है। इनमें चिनाब रेलवे ब्रिज, मुंबई का बांद्रा-वर्ली सी लिंक, अटल सेतु, अटल टनल, ढोला-साधिया पुल और बोगीबील पुल जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं।

अब ‘एक जैसा उत्पाद’ नहीं, जरूरत के हिसाब से कस्टमाइजेशन

BSP के भविष्य के फोकस में Customization को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। प्रियदर्शी ने बताया कि ग्राहकों की जरूरत के अनुसार उत्पादों में बदलाव किया जा रहा है।

रेलवे हो या रक्षा क्षेत्र, अलग-अलग संस्थानों की तकनीकी और उपयोग संबंधी जरूरतें अलग होती हैं। ऐसे में भविष्य में जरूरत के मुताबिक स्टील उत्पादों को विकसित और संशोधित करने पर और ज्यादा ध्यान दिया जाएगा।

उनके मुताबिक तकनीक लगातार बदल रही है और आज जिस उत्पाद की जरूरत है, आने वाले वर्षों में उसकी आवश्यकता और तकनीकी मानक बदल सकते हैं। इसलिए लगातार नवाचार जरूरी है।

उत्पादन में AI का बढ़ता इस्तेमाल भिलाई इस्पात संयंत्र उत्पादन प्रक्रिया में Artificial Intelligence के इस्तेमाल को भी बढ़ा रहा है। तकनीक के माध्यम से उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता और प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए Green Steel पर भी फोकस किया जा रहा है। BSP का कहना है कि औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियों को भी संतुलित रखना जरूरी है।

एंसिलरी उद्योगों ने भी निभाई बड़ी भूमिका

भिलाई के विकास की कहानी केवल बड़े इस्पात संयंत्र तक सीमित नहीं है। इसके साथ विकसित हुए स्थानीय छोटे और एंसिलरी उद्योग भी BSP की औद्योगिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।

बाइट = अमूल्य प्रियदर्शी, प्रभारी महाप्रबंधक जनसंपर्क, भिलाई इस्पात संयंत्र

बी एस पी एंसिलरी इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष रतन दास गुप्ता ने बताया कि स्थानीय एंसिलरी उद्योग पिछले करीब 50 वर्षों से भिलाई स्टील प्लांट से जुड़े हुए हैं।

उन्होंने बताया कि ‘मेक इन इंडिया’ की सोच के तहत स्थानीय उद्योगों ने कई ऐसे उत्पाद विकसित किए हैं, जो पहले जर्मनी जैसे देशों से आयात किए जाते थे। इन उत्पादों को Reverse Engineering के जरिए स्थानीय स्तर पर तैयार किया गया।

रतन दास गुप्ता के मुताबिक, अभी भी कई ऐसे स्पेयर्स हैं, जो इस्पात संयंत्र में इस्तेमाल होते हैं और आयात किए जाते हैं। स्थानीय एंसिलरी उद्योग इन्हें भी भारत में विकसित करने की क्षमता रखते हैं।

इसके लिए उन्होंने IIT और MSME Tool Room जैसी संस्थाओं के तकनीकी सहयोग की जरूरत बताई। उनका कहना है कि सरकार से सहयोग और अवसर मिलने पर ऐसे आयातित स्पेयर्स को भी रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए देश में विकसित किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि भिलाई एक बड़ा इंजीनियरिंग क्लस्टर है और यहां एंसिलरी तथा MSME सेक्टर में आगे विकास की काफी संभावनाएं हैं।

‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य में एंसिलरी सेक्टर की भूमिका

रतन दास गुप्ता ने कहा कि स्थानीय एंसिलरी उद्योग प्रधानमंत्री के ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य के अनुरूप काम करना चाहते हैं। इसके लिए उद्योगों को तकनीकी सहयोग, अवसर और प्रोत्साहन की जरूरत है।

उनके मुताबिक, यदि स्थानीय MSME और एंसिलरी उद्योगों को पर्याप्त समर्थन मिलता है तो भिलाई का इंजीनियरिंग क्लस्टर और मजबूत हो सकता है और आयातित औद्योगिक उत्पादों के घरेलू विकल्प विकसित करने की दिशा में काम आगे बढ़ सकता है।

भिलाई के लिए आगे की तस्वीर कुल मिलाकर BSP के विस्तार, AI आधारित तकनीकी बदलाव, ग्रीन स्टील, कस्टमाइजेशन और स्थानीय एंसिलरी उद्योगों के विकास को एक साथ देखा जाए तो भिलाई के औद्योगिक इकोसिस्टम में आने वाले वर्षों में बड़े बदलाव की संभावना है। एक तरफ संयंत्र की उत्पादन क्षमता बढ़ाने की तैयारी है, तो दूसरी ओर स्थानीय MSME और एंसिलरी इकाइयां आयातित उत्पादों के स्वदेशी विकल्प विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती हैं।

बाइट = रतन दासगुप्ता, अध्यक्ष बी एसपी एंसिलरी इंडस्ट्रीज एसोसिएशन, भिलाई

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।