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मेवाड़ की गवरी: आस्था और संस्कृति का उत्सव

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 30 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
मेवाड़ की गवरी: आस्था और संस्कृति का उत्सव

मेवाड़ की 40 दिवसीय गवरी लोक परंपरा आज भी आस्था, अनुशासन और सामूहिक संस्कृति को जीवंत बनाए हुए है। डॉक्टर से लेकर शिक्षक और अलग-अलग पेशों से जुड़े लोग किरदार निभाकर नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का संदेश दे रहे हैं।

उदयपुर, 30 सितंबर। मेवाड़ में गवरी सिर्फ एक लोक नाट्य नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और सामूहिक संस्कृति का जीवंत उत्सव है। उदयपुर में करीब 40 दिनों तक चलने वाली इस परंपरा में मेवाड़ की संस्कृति की ऐसी तस्वीर देखने को मिलती है, जहां आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार के बीच परंपराओं की जड़ें आज भी मजबूती से जुड़ी हुई हैं।

गवरी के दौरान अलग-अलग गांवों में मंच सजता है और कलाकार पारंपरिक किरदारों के जरिए लोककथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत करते हैं। खास बात यह है कि गवरी में शामिल कलाकारों को इस दौरान कई कठोर नियमों और अनुशासन का पालन करना होता है। अलग-अलग पेशों से जुड़े लोग अपने रोजमर्रा के कामकाज से समय निकालकर गांव-गांव गवरी का मंचन करते हैं।

हवाला गांव की गवरी में डॉ. गणेश लाल बंजारे कृष्ण का किरदार निभा रहे हैं। अस्पताल में मरीजों के इलाज की जिम्मेदारी संभालने वाले डॉक्टर जब गवरी के मंच पर पहुंचते हैं, तो वहां उनकी पहचान उनके पद से नहीं, बल्कि उनके किरदार से होती है।

इसी तरह बच्चों को टेनिस सिखाने वाले खेमराज गमेती गवरी में गोमा के भाई की भूमिका निभा रहे हैं। उनका मानना है कि आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ना किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।

गवरी की यह परंपरा बताती है कि मेवाड़ में लोक संस्कृति केवल इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि आज भी लोगों के जीवन और सामाजिक जुड़ाव का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।

होल्ड वाईट

1- डॉ. गणेश लाल, चिकित्सक।

2- भगवान लाल, शिक्षक।

3- खेमराज गोमती।

4- नारायण लाल डांगी, ग्रामीण।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।