मिट्टी पवित्र...तो हम कैसे अपवित्र, एक दिन मिलता है सम्मान:बिहार में मां दुर्गा की मूर्ति में वेश्यालय के आंगन की मिलाई जाती है मिट्टी
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →"पूरे साल समाज हमें नीची नजर से देखता है। अपमानजनक नामों से पुकारता है, लेकिन दुर्गा पूजा आते ही हमारे आंगन की एक मुट्ठी मिट्टी पवित्र मानकर मां दुर्गा की प्रतिमा में मिलाई जाती है। साल के 365 दिन हमें तिरस्कार मिलता है, लेकिन साल में एक बार इसी मिट्टी के बहाने सम्मान दिया जाता है।
सवाल यह है कि अगर हमारी मिट्टी पवित्र हो सकती है, तो हम अपवित्र कैसे हो गए?" यह सवाल किशनगंज के खगड़ा रेड लाइट एरिया में सेक्स वर्कर के तौर पर काम करने वाली महिलाओं और लड़कियों का है। दुर्गा पूजा के दौरान मूर्ति बनाने में वेश्यालय के आंगन की मिट्टी शामिल करने की परंपरा उनके लिए सिर्फ धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि समाज के दोहरे रवैये पर सवाल उठाने का जरिया भी है।
किशनगंज में वैशाली की मिट्टी से बनती है प्रतिमा बिहार में दुर्गा प्रतिमा बनाने के दौरान अलग-अलग स्थानों की मिट्टी मिलाने की परंपरा रही है। कुछ परंपराओं में गंगा तट, गोशाला, चौराहे और वेश्यालय के आंगन की मिट्टी शामिल करने का उल्लेख मिलता है। हालांकि, यह परंपरा हर जगह एक जैसी नहीं है।
इसके पीछे की धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग हैं। किशनगंज में मूर्तिकार वैशाली से मिट्टी लाकर प्रतिमा निर्माण में उसका इस्तेमाल करते हैं। इसमें वहां के वेश्यालय के आंगन की मिट्टी भी शामिल होती है। पहले खबर से जुड़ी तस्वीरें देखिए… अब सिलसिलेवार तरीके से पढ़िए पूरी खबर… 9 स्थानों की मिट्टी से प्रतिमा बनाने की परंपरा मूर्तिकार अनुराग कुमार बताते हैं पारंपरिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए अलग-अलग स्थानों से मिट्टी एकत्र की जाती है।
कुछ परंपराओं में नौ स्थानों की मिट्टी मिलाने का विधान बताया जाता है। इनमें गंगा तट, गोशाला, चौराहा और वेश्यालय के आंगन जैसे स्थान शामिल हैं। हालांकि, मिट्टी जुटाने की प्रक्रिया अलग-अलग मूर्तिकारों और पूजा समितियों के यहां अलग हो सकती है। अनुराग बताते हैं, हमारे परिवार में कई पीढ़ियों से इस परंपरा का पालन किया जा रहा है।
पहले मेरे पिता खुद वैशाली जाकर मिट्टी लाते थे। अब मैं इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा हूं। वैशाली से लाई गई मिट्टी को दूसरी मिट्टियों के साथ मिलाकर प्रतिमा बना रहे हैं। प्रतिमा निर्माण केवल मिट्टी को आकार देने का काम नहीं है। इसमें धार्मिक मान्यताओं के साथ पारिवारिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की भी भूमिका होती है।
वेश्यालय के आंगन की मिट्टी को भी इसी परंपरा के तहत शामिल किया जाता है। मिट्टी की पवित्रता से जुड़ी हैं अलग-अलग मान्यताएं मां दुर्गा की प्रतिमा में वेश्यालय के आंगन की मिट्टी मिलाने के पीछे एक प्रचलित धार्मिक मान्यता है। धनंजय पंडित बताते हैं कोई व्यक्ति वेश्यालय में प्रवेश करता है तो अपनी अच्छाई और सामाजिक प्रतिष्ठा को बाहर छोड़कर जाता है।
इसका मतलब बाहर छूटने वाले पुण्य को उस स्थान की मिट्टी से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, यह इस परंपरा का एक्सप्लेनेशन है। इसके पीछे की मान्यताओं को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में अलग विचार मिलते हैं। इस परंपरा को सामाजिक समावेश के नजरिए से भी देखा जाता है। मां दुर्गा को शक्ति, संरक्षण और मातृत्व का प्रतीक माना जाता है।
ऐसे में समाज में रहने वाले लोगों से जुड़े स्थान की मिट्टी को देवी की प्रतिमा में शामिल करना एक प्रतीकात्मक सवाल खड़ा करता है- जब उस स्थान की मिट्टी को धार्मिक रूप से स्वीकार किया जा सकता है, तो वहां रहने वाले लोगों को समाज में बराबरी और सम्मान क्यों नहीं मिलता?
हमारी जमीन की मिट्टी को पैसे देकर खरीदते हैं लोग खगड़ा रेड लाइट एरिया में काम करने वाली महिलाएं कहती हैं, अगर हमारे दरवाजे की मिट्टी मां दुर्गा की प्रतिमा में नहीं मिलाई जाएगी, तो उसे शुभ नहीं माना जाएगा। अच्छे-अच्छे घरों से भी लोग 251 या 551 रुपए शगुन के तौर पर देकर हमसे मिट्टी लेकर जाते हैं।
हम खानदानी हैं, हमारी कई पीढ़ियां नाच-गाने से जुड़ी रही हैं। सेक्स वर्कर्स के परिवारों को लेकर समाज में कई तरह की गलत धारणाएं हैं। लोगों को लगता है कि अगर किसी सेक्स वर्कर के घर बेटी पैदा होती है, तो परिवार उसे भी इसी धंधे में लगा देगा। यह सोच बिल्कुल गलत है। कोई भी मां अपनी बेटी के लिए ऐसी जिंदगी नहीं चाहेगी।
सेक्स वर्कर्स भी अपनी बच्चियों की सुरक्षा करती हैं और उन्हें बेहतर भविष्य देना चाहती हैं। सेक्स वर्कर्स को सालभर में सिर्फ एक बार, वह भी मां दुर्गा की प्रतिमा के लिए एक मुट्ठी मिट्टी देने पर सम्मान मिलता है। पूरे साल समाज हमें नीची नजर से देखता है। जिन महिलाओं को लोग गंदा कहते हैं, उसी मिट्टी को धर्म में पवित्र और सम्मानित स्थान दिया जाता है।
मूर्तिकार निमाई चंद्रपाल भी निभा रहे परंपरा मूर्तिकार निमाई चंद्रपाल बताते हैं, मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए वैशाली से मिट्टी लाई जाती है। इसके अलावा किशनगंज के अलग-अलग स्थानों से भी मिट्टी एकत्र की जाती है। इन सभी को मिलाकर प्रतिमा बनाई जाती है। इसमें वैशाली के वेश्यालय के आंगन की मिट्टी भी शामिल होती है।
यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। हालांकि, हर मंदिर या पूजा समिति में इसका पालन अनिवार्य रूप से हो, ऐसा नहीं है। कुछ जगहों पर मूर्तिकार इस परंपरा को निभाते हैं, जबकि अन्य स्थानों पर प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया अलग होती है। खगड़ा रेड लाइट एरिया का इतिहास मेले से जुड़ा किशनगंज के खगड़ा इलाके में मौजूद रेड लाइट एरिया का इतिहास स्थानीय लोगों की स्मृतियों और खगड़ा मेले से जुड़ी कहानियों में मिलता है।
वरिष्ठ पत्रकार सह अधिवक्ता राजीव रंजन बताते हैं, खगड़ा इलाके का विकास मेले के आसपास हुआ था। नवाब सैयद अता हुसैन खान ने मेले की शुरुआत की थी। साल 1911 में प्रकाशित पूर्णिया के ओल्ड गजेटियर में भी खगड़ा मेले का उल्लेख मिलता है। गजेटियर में बाबा कमली शाह नाम के एक सूफी फकीर की सलाह का जिक्र है।
बताया जाता है कि उन्होंने नवाब को व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने के उद्देश्य से मेले की शुरुआत करने का सुझाव दिया था। मेले के आयोजन का विचार तत्कालीन पूर्णिया के जिलाधिकारी ए.
वीक्स और किशनगंज के अनुमंडल पदाधिकारी राय बहादुर दास दत्ता के सामने भी रखा गया था। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद मेले का आयोजन शुरू हुआ। मेले के कारण इलाके में व्यापारिक गतिविधियां बढ़ीं। बाहर से दुकानदारों और दूसरे लोगों का आना-जाना होने लगा। धीरे-धीरे खगड़ा मेला किशनगंज के सामाजिक और आर्थिक जीवन का हिस्सा बन गया।
कभी संगीत-मुजरे की महफिलों के लिए जाना जाता था इलाका स्थानीय निवासी अजय कुमार पासवान बताते हैं बुजुर्गों से सुनी बातों के अनुसार, नवाबों और जमींदारों के दौर में खगड़ा इलाके में संगीत और नृत्य की महफिलें सजती थीं। बाहर से कलाकार आते थे और गाने-मुजरे की प्रस्तुतियां होती थीं। उस दौर में कलाकारों को यहां रहने के लिए जगह भी दी जाती थी।
कलाकारों की आवाजाही से इलाके की अलग पहचान बनी थी। समय के साथ संगीत और मुजरे की परंपरा कमजोर पड़ने लगी। बाद के वर्षों में यह इलाका देह व्यापार के केंद्र के रूप में पहचाना जाने लगा। आज भी कायम है खगड़ा मेले की पहचान स्थानीय लोगों के अनुसार, खगड़ा में आज भी मेला आयोजित होता है। हालांकि, अतिक्रमण और जगह की कमी के कारण इसका स्वरूप बदल गया है।
लोगों का कहना है कि पहले की तुलना में मेले के आयोजन के लिए उपलब्ध जगह कम हो गई है। खगड़ा की कहानी एक इलाके की बदलती सामाजिक पहचान को भी सामने लाती है। कभी व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र की छवि समय के साथ बदलती गई। आज यहां रहने वाली सेक्स वर्कर्स को सामाजिक पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है।
दुर्गा प्रतिमा में मिट्टी शामिल करने की परंपरा के बीच इन महिलाओं का सवाल धार्मिक मान्यता से आगे बढ़कर सामाजिक बराबरी तक पहुंचता है। उनके लिए मुद्दा सिर्फ एक मुट्ठी मिट्टी का नहीं, बल्कि उस सम्मान का है जो उन्हें साल के बाकी दिनों में भी मिलना चाहिए।
📡 स्रोत: NewsData.io