मोमबत्तियों की बढ़ती चमक में फीकी पड़ रही मिट्टी के दीयों की रोशनी
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देशभर में 8 नवंबर को दिवाली का त्योहार धूमधाम से मनाया जाएगा। तो वही लोगों के द्वारा अब अपने घरों को सजाने का काम भी पूरा किया जा रहा है। दिवाली को लेकर सारे बाजार सज गए हैं और विभिन्न तरह की सजावटी वस्तुएं भी बाजारों में बिक्री शुरू हो गई है। ऐसे में लोग दिवाली के दिन बिजली की झालरों के साथ-साथ मिट्टी के दियों से अपने घर को भी सजाते हैं।
लेकिन मोमबत्ती और चाइनीज झालरों के चलते अब मिट्टी के दियों का कारोबार बीते सालों के मुकाबले आधा रह गया है। इतना ही नहीं इस काम में कमाई ना होने के चलते अब युवा पीढ़ी भी इससे मुंह मोड़ रही है। जिससे व्यापारियों के साथ-साथ छोटे दुकानदार और मिट्टी का सामान बनाने वाले कुम्हारों का जीवन भी मुश्किल में पड़ता जा रहा है।
दीवाली के त्यौहार को लेकर पहले जहां मिट्टी के दीयों की खूब मांग रहती थी। लेकिन अब मोमबत्तियों और अन्य सजावटी विकल्पों के बढ़ते चलन ने कुम्हारों के इस पुराने कारोबार को प्रभावित किया है। जिला कुल्लू के मुख्यालय ढालपुर में भी बाहरी इलाकों से छोटे दुकानदार मिट्टी के दिया बेचने के लिए यहां पहुंचे हैं।
उन्हें उम्मीद है कि लोग दिवाली के अवसर पर तो इनकी खरीदारी करेंगे। उनका कहना है कि पहले हर धार्मिक कार्यों के साथ-साथ घरों में मिट्टी के दीयों का प्रयोग किया जाता था। लेकिन जैसे-जैसे अब बाजारों में मोमबत्ती, प्लास्टिक के सजावटी सामान और चाइनीज बिजली की झालर आई है। तब से उनका कारोबार अब आधा रह गया है।
जिसके चलते उन्हें अब इस काम में कोई फायदा भी नजर नहीं आ रहा है।
ढालपुर में मिट्टी का सामान बेचने आए बिलासपुर के संजय का कहना है कि बीते वर्ष की तुलना में इस बार मिट्टी के दीयों का कारोबार घटकर करीब आधा रह गया है। इससे पारंपरिक मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने वाले कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट भी खड़ा होने लगा है। उन्होंने बताया कि पहले दिवाली के दौरान मिट्टी के दीयों की अच्छी मांग रहती थी। लोग बड़ी संख्या में दीये खरीदकर घरों, मंदिरों और आंगनों में सजाते थे। लेकिन अब बाजार में मोमबत्तियों, बिजली की लड़ियों और आकर्षक सजावटी लाइटों के विकल्प उपलब्ध होने से मिट्टी के दीयों की मांग कम हो गई है।
बाइट - संजय
कारीगर देवेंद्र कुमार ने बताया कि वह दशहरा उत्सव में मिट्टी के दिया, गुल्लक व अन्य सामान लेकर आए हैं। हालांकि इनकी बिक्री काफी कम हो रही है। क्योंकि लोग प्लास्टिक व अन्य चीजों को इसका विकल्प मानकर खरीद रहे हैं। अब उन्हें उम्मीद है की दिवाली के दिन लोग मिट्टी के दियों से अपना घर सजाएंगे जिससे उनका कारोबार भी अच्छा चलेगा और इस कारोबार से जुड़े लोगों को भी फायदा होगा।
बाइट - देवेंद्र कुमार
बिलासपुर जिला से आए दुकानदार जगत पाल का कहना है कि मिट्टी के दीये तैयार करने में काफी मेहनत लगती है। मिट्टी जुटाने से लेकर दीये बनाने, सुखाने और पकाने तक कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद बाजार में उचित कीमत नहीं मिल पाती। कम कमाई और लगातार घटती मांग के चलते युवा पीढ़ी भी इस पारंपरिक व्यवसाय से दूरी बना रही है। युवाओं को लगता है कि इतनी मेहनत करने के बाद भी इस काम से परिवार का गुजारा करना मुश्किल है।
बाइट - जगत पाल
कुल्लू की रहने वाली सोमवती बताया कि वह पिछले 20 सालों से मिट्टी के बर्तन बेचने का काम कर रही है। लेकिन हर साल यह काम कम होता जा रहा है। दिवाली के दिन लोग मिट्टी के दिया की खरीदारी करते हैं। ऐसे में उन्हें उम्मीद है कि इस साल भी उनका कारोबार अच्छा रहेगा। लेकिन मिट्टी के बर्तन व अन्य वस्तुओं के खरीददारी का कारोबार अब धीरे-धीरे कम हो रहा है।
बाइट - सोमवती
💡 पृष्ठभूमि (Background)
मिट्टी के दीयों की रोशनी पर मोमबत्तियों और चाइनीज झालरों का प्रभाव। यह विषय दिखाता है कि परम्परागत दिवाली सजावट धीरे-धीरे आधुनिक, विद्युत आधारित प्रकाश से बदल रही है। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पर्यावरणीय, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर असर पड़ता है। परम्परागत दीयों का घटता उपयोग जलवायु पर असर डाल सकता है, साथ ही मिट्टी के दिये बनाने वाले छोटे व्यवसायों को नुकसान पहुँच सकता है। आम जनता को यह बदलाव ऊर्जा बचत, सुरक्षा और परम्परागत संस्कृति के संरक्षण के लिए जागरूकता बढ़ाने का अवसर देता है।