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मुंबई में गूंजा अम्बा का दर्द, ‘मृत्युपर्यन्त’ के मंचन ने महाभारत के मानवीय द्वंद्वों को जीवंत किया

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 4 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
मुंबई में गूंजा अम्बा का दर्द, ‘मृत्युपर्यन्त’ के मंचन ने महाभारत के मानवीय द्वंद्वों को जीवंत किया

राजेश कुमार सिन्हा मुंबई. कुछ नाट्य प्रस्तुतियां केवल मंच पर घटित नहीं होतीं, वे दर्शकों के भीतर उतरकर लंबे समय तक अपना प्रभाव छोड़ती हैं. 30 अगस्त 2026 को वेदा चौबारा, वर्सोवा में यवनिका थिएटर ग्रुप, पुणे की प्रस्तुति ‘मृत्युपर्यन्त’ भी ऐसी ही रंगानुभूति लेकर सामने आई.

महाभारत के अम्बोपाख्यान पर्व से प्रेरित इस नाटक ने अम्बा की मार्मिक, जटिल और पीड़ादायक कथा को एक ऐसे रंग-परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया, जहां कथा के साथ उसके भीतर छिपे प्रेम, प्रतिज्ञा, कर्तव्य, अपमान, अस्मिता और प्रतिशोध के प्रश्न भी दर्शकों के सामने खुलते चले गए. ‘मृत्युपर्यन्त’ के केंद्र में महाभारत के चार महत्वपूर्ण पात्र भीष्म, अम्बा, अर्जुन और शिखंडी रहे.

इन चारों के माध्यम से नाटक ने उन अदृश्य बंधनों को टटोलने की कोशिश की, जो मनुष्य को कभी प्रेम से, कभी कर्तव्य से और कभी अपनी ही प्रतिज्ञाओं से बांध देते हैं.

राजकुमारी अम्बा मन ही मन राजा शालव को अपना पति स्वीकार कर चुकी थी, लेकिन स्वयंवर से भीष्म द्वारा अम्बा, अंबिका और अंबालिका का हरण उसकी नियति को पूरी तरह बदल देता है. इसके बाद घटनाओं की श्रृंखला अम्बा के अपमान और प्रतिशोध की अग्नि से गुजरते हुए शिखंडी के रूप में उसके पुनर्जन्म तक पहुंचती है.

कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन द्वारा शिखंडी को आगे रखकर भीष्म को शरशय्या पर पहुंचाने का प्रसंग इस कथा को निर्णायक परिणति देता है. इस प्रस्तुति की खासियत केवल कथा चयन में नहीं, बल्कि उसके निर्माण की प्रक्रिया में भी दिखाई दी.

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के कुछ प्रतिभाशाली पूर्व विद्यार्थियों ने मिलकर महाभारत जैसे विराट महाकाव्य का अध्ययन किया और उसके भीतर से उस कथा को चुना, जो उनकी रचनात्मक संवेदनाओं के सबसे करीब थी. इसी सामूहिक रचनात्मक प्रक्रिया में निर्देशन की जिम्मेदारी उनके सहपाठी राजेन्द्र पांचाल को सौंपी गई.

राजेन्द्र पांचाल की रंग-दृष्टि पारंपरिक नाट्य प्रस्तुति से आगे जाने का प्रयास करती है. उनके लिए अभिनेता केवल पहले से लिखे संवाद या निर्देशक की कल्पना को मंच पर दोहराने वाला माध्यम नहीं है.

अभिनेता अपनी कल्पना, स्मृति, जिज्ञासा और अपनी विशिष्ट रचनात्मक पहचान के साथ प्रस्तुति को आकार देता है. ‘मृत्युपर्यन्त’ में भी इसी दृष्टिकोण की छाप दिखाई दी, जिसने पात्रों को केवल पौराणिक चरित्र बनाकर नहीं रखा, बल्कि उनके भीतर चल रहे मानवीय संघर्षों को मंच पर सामने लाने की कोशिश की.

नाटक की एक और विशिष्ट विशेषता इसका कूटियाट्टम शैली में तैयार किया जाना रहा. केरल की लगभग दो हजार वर्ष पुरानी इस रंग-अभिनय परंपरा को संस्कृत रंगमंच की प्राचीन परंपरा से जोड़ा जाता है और इसे यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में भी स्थान प्राप्त है.

इस शैली में कलाकारों को तैयार करने के लिए पुणे में एक महीने की कार्यशाला आयोजित की गई. संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली द्वारा अनुमोदित गुरु डॉ. अम्मानूर रजनीश चाक्यार ने कलाकारों को प्रशिक्षण दिया.

कूटियाट्टम की अभिनय परंपरा में भावों और शारीरिक अभिव्यक्ति का विशेष महत्व है. ‘मृत्युपर्यन्त’ में इस परंपरा का इस्तेमाल महाभारत के पात्रों के आंतरिक संसार को सामने लाने के लिए किया गया. संवादों के साथ-साथ चेहरे के भाव, देह की गति और मौन ने भी कथा को आगे बढ़ाया.

यही वजह रही कि प्रस्तुति कई ऐसे क्षण रच सकी, जहां बिना बहुत कुछ कहे भी पात्रों की पीड़ा और मनःस्थिति दर्शकों तक पहुंचती रही. सेवक नैयर द्वारा निर्मित इस प्रस्तुति में भीष्म की भूमिका ऋचा भट्टाचार्य ने निभाई. अम्बा के रूप में गीत गुहा, अर्जुन की भूमिका में टीना भाटिया और शिखंडी के रूप में हर्षित जैन नजर आए.

मिलाव पर कलामंडलम रवि कुमार और कलामंडलम अभिषेक ने साथ दिया, जबकि प्रकाश संचालन ओंम पांडेय ने किया. कलाकारों और तकनीकी टीम के सामूहिक प्रयास ने प्रस्तुति को एक विशिष्ट रंग-रूप प्रदान किया. प्रस्तुति देखने वाले दर्शकों और रंगकर्मियों ने भी इसकी विशेष रूप से सराहना की.

प्रसिद्ध शॉर्ट फिल्म निर्माता शरीफा रॉय ने कहा कि ‘मृत्युपर्यन्त’ ने उन्हें स्तब्ध कर दिया. उनके अनुसार कलाकारों की संवाद अदायगी में दिखाई दी सहजता और तीव्रता बेमिसाल थी. उन्होंने महाभारत के महत्वपूर्ण प्रसंगों को जिस शिद्दत और मार्मिकता के साथ मंच पर उकेरा गया, उसे एक ऐसा रंगमंचीय अनुभव बताया जिसे छोड़ना नहीं चाहिए.

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व फैकल्टी सदस्य सुरेश भारद्वाज ने भी प्रस्तुति को लेकर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उन्होंने नाटक के जादू को महसूस भी किया और देखा भी.

विशेष रूप से बिना एक शब्द बोले किए गए उत्कृष्ट सात्त्विक अभिनय को उन्होंने उल्लेखनीय माना. ‘मृत्युपर्यन्त’ की सार्थकता शायद यही रही कि उसने महाभारत को केवल अतीत की कथा बनाकर मंच पर नहीं रखा. उसने उन सवालों को आज के मनुष्य के सामने ला खड़ा किया, जिनसे मनुष्य सदियों से जूझता आया है.

कर्तव्य और इच्छा के बीच का संघर्ष, प्रतिज्ञा और उसके परिणामों का बोझ, प्रेम के अस्वीकार से पैदा हुई पीड़ा और अपमान से जन्म लेने वाला प्रतिशोध—ये सभी भाव अम्बा की कथा में अपनी पूरी तीव्रता के साथ दिखाई दिए. अम्बा की पीड़ा केवल एक स्त्री की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह जाती.

वह अस्मिता के उस आघात का प्रतीक बन जाती है, जो व्यक्ति के भीतर वर्षों तक जीवित रह सकता है. ‘मृत्युपर्यन्त’ ने इसी पीड़ा को मंच पर संवेदना के साथ छुआ और यह प्रश्न दर्शकों के सामने छोड़ दिया कि प्रतिशोध की यात्रा में मनुष्य अंततः स्वयं को बचाता है या अपनी ही पीड़ा का विस्तार करता चला जाता है.

यही कारण है कि वर्सोवा की उस शाम ‘मृत्युपर्यन्त’ का मंचन समाप्त होने के बाद भी उसकी कथा जैसे समाप्त नहीं हुई. पात्र मंच से विदा हुए, लेकिन उनके भीतर के सवाल दर्शकों के साथ लौटे. शायद अच्छे रंगमंच की यही सबसे बड़ी पहचान है कि पर्दा गिरने के बाद भी उसके संवाद भीतर कहीं चलते रहते हैं.

📡 स्रोत: NewsData.io

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अमभा की पीड़ा हमें याद दिलाती है कि संघर्षों का सामना सहानुभूति और संवाद से करना चाहिए। जब भी किसी के दर्द का सामना हो, कानूनी मदद, मध्यस्थता या मनोवैज्ञानिक समर्थन का सहारा लें। समाज को ऐसे मंचों की आवश्यकता है जहाँ संघर्षों को रचनात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाए, जिससे हम सभी मिलकर शांति और समझ की दिशा में कदम बढ़ा सकें।

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