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नालंदा विश्वविद्यालय में 1 सितंबर को राष्ट्रीय कार्यशाला:पुरातत्व और बायोआर्कियोलॉजी पर होगा मंथन, जुटेंगे देशभर के विशेषज्ञ

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 31 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
नालंदा विश्वविद्यालय में 1 सितंबर को राष्ट्रीय कार्यशाला:पुरातत्व और बायोआर्कियोलॉजी पर होगा मंथन, जुटेंगे देशभर के विशेषज्ञ

नालंदा विश्वविद्यालय में 21वीं सदी के पुरातत्व विज्ञान और जैव-पुरातत्व (बायोआर्कियोलॉजी) के अनुप्रयोग पर कल 1 सितंबर को एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा।

यह महत्वपूर्ण अकादमिक संगोष्ठी नालंदा विश्वविद्यालय, भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (एएसआई) और काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हो रही है।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य आधुनिक विज्ञान, जेनेटिक्स, पुरातत्व और मानवविज्ञान के समावेश से प्राचीन समाजों, मानव इतिहास और जीवनशैली की वैज्ञानिक पुनर्रचना को गहराई से समझना है।

कार्यक्रम का उद्घाटन सत्र नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी के व्याख्यान से शुरू होगा, जिसमें वे अतीत की वैज्ञानिक खोज के रूप में नालंदा के दृष्टिकोण को रेखांकित करेंगे। इसके बाद देश के प्रख्यात विशेषज्ञ विभिन्न तकनीकी सत्रों में अपने शोध विचार प्रस्तुत करेंगे।

पुरातात्विक दृष्टिकोण पर विचार रखेंगे एनएमएचसी लोथल और सीसीएमबी हैदराबाद से जुड़े प्रोफेसर वसंत शिंदे भारतीय ज्ञान प्रणाली के पुरातात्विक दृष्टिकोण पर विचार रखेंगे।

वहीं, भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के निदेशक प्रोफेसर बीवी शर्मा ऐतिहासिक संदर्भ में बीमारियों के बदलते स्वरूप और पैटर्न पर चर्चा करेंगे, जबकि बीएचयू के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे प्राचीन डीएनए शोध और दक्षिण एशिया में मानव विकास व बसावट के वैज्ञानिक पहलुओं को साझा करेंगे।

मानवविज्ञान की भूमिका पर मंथन होगा कार्यशाला के विशेष प्लेनरी सत्र में प्राचीन समुदायों के अध्ययन में पुरातत्व और मानवविज्ञान की भूमिका पर विस्तृत मंथन होगा। इस सत्र में विश्वभारती शांतिनिकेतन की डॉ. अभिशिक्ता घोष रॉय, बीआरआईसी-सीडीएफडी के डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह, मानवविज्ञान सर्वेक्षण के डॉ. मंजुलिका गौतम व डॉ.

निंगोमबम सोमरजीत सिंह तथा नालंदा विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ हिस्टोरिकल स्टडीज के डीन प्रोफेसर गोदाबरीश मिश्र एवं संयोजक डॉ. एलोरा त्रिबेदी भी अपने विचार रखेंगे।

आयोजकों का मानना है कि यह कार्यशाला भारत के समृद्ध अतीत को आधुनिक वैज्ञानिक कसौटी पर परखने और नई पीढ़ी के शोधकर्ताओं को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने में मील का पत्थर साबित होगी।

📡 स्रोत: NewsData.io

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