नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान क्यों पहुंचे हाईकोर्ट, जानें
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नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को शुक्रवार को गिरफ्तार किया गया था. उन्हें 3 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया है.
मिलन प्रधान ने हिरासत में लिए जाने के खिलाफ कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया है. इस याचिका पर मंगलवार को कोर्ट ने सुनवाई होगी.
4 अक्टूबर तक होगी कैंपेनिंग
प्रधान की ओर से पेश होते हुए उनके वकील ने कहा कि चुनाव 6 अक्टूबर को होने हैं, फिर भी याचिकाकर्ता पहले से ही हिरासत में है.
वकील ने यह भी बताया कि चुनाव प्रचार की आखिरी तारीख 4 अक्टूबर है और उन्होंने कोर्ट से सुरक्षा की मांग की.
इस बात पर ध्यान देते हुए, कोर्ट ने कहा, ठीक है, कल, यह इशारा करते हुए कि मामले पर मंगलवार को सुनवाई होगी.
क्यों लिया गया हिरासत में
मिलन प्रधान को एक पुराने हत्या के मामले में गिरफ्तार किए जाने के बाद अदालत में पेश किया गया था.
पूर्वी मेदिनीपुर जिला पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि मिलन प्रधान के खिलाफ पुराने हत्या मामले में पहले से गिरफ्तारी वारंट जारी था.
इसी वारंट के आधार पर उन्हें शुक्रवार को गिरफ्तार किया गया और शनिवार को अदालत में पेश किए जाने के बाद 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.
कांग्रेस उम्मीदवार की गिरफ्तारी ऐसे समय हुई, जब नंदीग्राम उपचुनाव का राजनीतिक माहौल गर्म है.
इससे एक दिन पहले तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार संचिता डे प्रधान ने अपना नामांकन वापस ले लिया था, जिसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नंदीग्राम सीट पर कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान किया.
कांग्रेस ने मिलन प्रधान की गिरफ्तारी को राजनीतिक साजिश बताया है.
पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (डब्ल्यूबीपीसीसी) के अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने आरोप लगाया कि चुनाव से ठीक पहले उनके उम्मीदवार के खिलाफ कार्रवाई कर विपक्ष को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है.
उन्होंने कहा कि भाजपा पश्चिम बंगाल में विपक्ष की राजनीति खत्म करना चाहती है.
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📡 स्रोत: ABP Live
💡 पृष्ठभूमि (Background)
नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी मिलन प्रधान को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जिसके बाद उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दायर की। यह घटना उपचुनाव की तैयारी में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, क्योंकि चुनाव केवल कुछ ही दिनों में तय हैं। यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि चुनावी प्रक्रियाओं में कानूनी हस्तक्षेप कैसे हो सकता है और उम्मीदवारों के अधिकारों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है। आम जनता के लिए इसका असर यह हो सकता है कि चुनावी माहौल में अनिश्चितता बढ़े, मतदाता