नारियलखेड़ा में बुलडोजर चला, अब जमीन के सौदागरों और रजिस्ट्री कराने वालों पर कार्रवाई कब?

भोपाल। नारियलखेड़ा में उपासना जौहरी को न्याय मिलने के बाद निजी जमीन पर बने मकानों और दुकानों पर कार्रवाई हुई।
जिन लोगों ने जमीन पर निर्माण किया, उनके मकान और दुकानें तो टूट गईं, लेकिन अब इस कार्रवाई के बाद एक बड़ा और असहज सवाल खड़ा हो गया है—क्या कार्रवाई सिर्फ उन लोगों तक सीमित रहेगी जिन्होंने जमीन पर निर्माण किया, या उस पूरी व्यवस्था की भी जांच होगी जिसने इस जमीन की खरीद-फरोख्त और रजिस्ट्रियों को संभव बनाया?
अगर निजी जमीन पर किसी ने प्लॉट काटकर लोगों को बेचे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्लॉट काटने वाला कौन था और उसे ऐसा करने का अधिकार किसने दिया? अगर किसी दूसरे व्यक्ति की जमीन को किसी और के नाम रजिस्टर्ड किए जाने का आरोप है, तो फिर सवाल सिर्फ खरीदार और मकान बनाने वाले पर क्यों? वह रजिस्ट्री किस आधार पर हुई?
दस्तावेजों की जांच किसने की? रजिस्ट्री किसने स्वीकार की? और उस पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी किसकी थी? सबसे बड़ा सवाल तो सरकारी सिस्टम से है। जब जमीन की खरीद-फरोख्त हुई, तब सरकार ने स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन शुल्क लिया।
अगर आज उसी जमीन के सौदे को लेकर विवाद और कार्रवाई की नौबत आई है, तो क्या यह जांच नहीं होनी चाहिए कि उस समय दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर हुई थी?
मकान टूटे, लेकिन सवाल जस के तस
आज जिन लोगों के मकान और दुकानें टूट रही हैं, उनमें से कई लोगों ने संभवतः अपनी जिंदगी की जमा-पूंजी जमीन खरीदने और घर बनाने में लगा दी होगी। लेकिन अगर जमीन का सौदा ही विवादित या गलत तरीके से हुआ था, तो सवाल यह है कि गलती की पूरी कीमत सिर्फ अंतिम खरीदार ही क्यों चुकाए?
जिसने प्लॉट काटे, जिसने जमीन बेची, जिसने दस्तावेज तैयार किए, जिसने रजिस्ट्री कराई और जिस सरकारी व्यवस्था ने उस लेन-देन को वैध प्रक्रिया के तहत दर्ज किया—इन सभी कड़ियों की जिम्मेदारी तय होगी या नहीं?
अब असली परीक्षा प्रशासन की
बुलडोजर चलाना आसान है। लेकिन उस सिस्टम तक पहुंचना मुश्किल है, जिसने किसी जमीन को विवादित स्थिति तक पहुंचने दिया। अगर किसी ने नियमों के खिलाफ प्लॉटिंग की है तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। अगर किसी ने गलत दस्तावेजों के आधार पर जमीन की रजिस्ट्री कराई है तो उसकी जांच होनी चाहिए।
अगर रजिस्ट्री प्रक्रिया में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। और अगर सरकारी खजाने ने स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन शुल्क लिया है, तो सरकार को यह भी जवाब देना चाहिए कि जिस जमीन के दस्तावेजों पर सरकारी मुहर लगी, उसकी वैधता की जांच उस समय क्यों नहीं हुई?
नारियलखेड़ा का मामला अब सिर्फ मकान टूटने या बचने का मामला नहीं रह गया है। यह सवाल जवाबदेही का है। सवाल यह है कि कार्रवाई का बुलडोजर सिर्फ उन गरीब या आम खरीदारों के दरवाजे तक पहुंचेगा, जिन्होंने अपनी जमा-पूंजी लगाकर घर बनाया...
या फिर उस पूरी श्रृंखला तक भी पहुंचेगा जिसने जमीन को प्लॉट में बदला, प्लॉट को बेचा और फिर उसकी रजिस्ट्री सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज कराई? न्याय तब पूरा होगा, जब सिर्फ निर्माण नहीं टूटेगा—बल्कि अगर जांच में गड़बड़ी साबित होती है तो जिम्मेदारी की वह दीवार भी टूटेगी, जिसके पीछे असली जवाबदेह लोग छिपे हैं।
अब नारियलखेड़ा पूछ रहा है— मकान तोड़ने के बाद अगला बुलडोजर किस पर चलेगा? प्लॉट काटने वालों पर? गलत रजिस्ट्री कराने वालों पर? या फिर उन सरकारी जिम्मेदारों पर, जिनकी निगरानी में यह पूरा लेन-देन हुआ? इन सवालों का जवाब अब प्रशासन को देना होगा।