नेपाल की बाढ़ ने बदला हिमालयी आपदा का चेहरा, अब खतरा सिर्फ ग्लेशियल झीलों तक सीमित नहीं
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काठमांडू. नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी आपदाओं को समझने की अब तक की स्थापित धारणा को एक नई चुनौती दी है. शुरुआती जांच और उपग्रह तस्वीरों से सामने आया है कि रसुवा क्षेत्र में तबाही किसी सामान्य मानसूनी बाढ़ या पारंपरिक ग्लेशियल झील के फटने से शुरू नहीं हुई थी.
ऊंचाई पर ग्लेशियर और चट्टान के बड़े हिस्से के अचानक टूटने से पैदा हुई रॉक-आइस एवलांच की श्रृंखला नीचे पहुंची, मलबा नदी तंत्र में आया और देखते ही देखते यह घटना विनाशकारी बाढ़ में बदल गई.
उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार आपदा का स्रोत करीब 5,000 से 5,200 मीटर की ऊंचाई पर था और घटनाक्रम इतना तेज था कि शुरुआती भूकंपीय संकेत और बाढ़ के पहुंचने के बीच केवल कुछ मिनट का अंतर रहा. यही समय का अंतर इस आपदा को असाधारण बनाता है.
रसुवागढ़ी क्षेत्र में सुबह करीब 8:37 बजे पर्वतीय ढलान के टूटने से जुड़ा भूकंपीय संकेत दर्ज हुआ और करीब सात मिनट बाद बाढ़ का प्रभाव वहां दिखाई देने लगा. यानी जिस घटना को रोकने या उससे लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए चेतावनी तंत्र सक्रिय होना था, उसके लिए लगभग कोई समय ही उपलब्ध नहीं था.
प्रारंभिक आकलन के मुताबिक मलबे और पानी ने नीचे की ओर बढ़ते हुए नदी घाटी को प्रभावित किया और बाद में भोटेकोशी-त्रिशूली नदी तंत्र में तबाही का दायरा लगातार बढ़ता गया. 1 सितंबर तक नेपाल में मृतकों की संख्या एक हजार के पार पहुंच चुकी है और करीब चार हजार लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं.
चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी 16 मौतें दर्ज हुई हैं. बचाव अभियान में हजारों सुरक्षाकर्मी, सेना के जवान और विशेषज्ञ दल जुटे हैं. सड़कें और पुल टूटने के कारण कई प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना कठिन बना हुआ है.
हेलीकॉप्टरों और अस्थायी संपर्क मार्गों के सहारे राहत और बचाव कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है. आपदा का एक बेहद गंभीर पहलू जलविद्युत परियोजनाओं पर पड़ा असर है.
नेपाल की अर्थव्यवस्था और बिजली व्यवस्था में जलविद्युत का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन इस घटना ने दिखा दिया कि ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में बने बिजली संयंत्र और निर्माणाधीन परियोजनाएं भी अचानक पैदा होने वाली आपदाओं के सामने कितनी असुरक्षित हो सकती हैं.
रिपोर्टों के अनुसार कई परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं और बड़ी संख्या में कर्मचारी अब भी लापता हैं. कुछ श्रमिकों के सुरंगों में फंसे होने की आशंका ने बचाव अभियान को और जटिल बना दिया है.
इस त्रासदी का सबसे बड़ा सबक शायद यही है कि हिमालयी आपदा प्रबंधन को केवल नदी के जलस्तर या ग्लेशियल झीलों की निगरानी तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा. अभी तक हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ के संदर्भ में ग्लेशियल झीलों के फटने का खतरा प्रमुख चिंता रहा है.
ऐसी झीलों की पहचान, उपग्रह निगरानी और जलस्तर में बदलाव की जानकारी के आधार पर जोखिम का अनुमान लगाया जा सकता है. लेकिन रसुवा की घटना ने एक अलग तरह का खतरा सामने रखा है—ऐसा खतरा जो किसी बड़ी झील के अस्तित्व पर निर्भर नहीं है और जिसमें पहाड़ का ही एक हिस्सा अचानक आपदा का स्रोत बन सकता है.
यही कारण है कि भविष्य की निगरानी व्यवस्था में केवल पानी नहीं, बल्कि पहाड़ की स्थिरता को भी निगरानी के केंद्र में लाना होगा. ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पीछे हटने, चट्टानी ढलानों की स्थिरता, पर्माफ्रॉस्ट की स्थिति, बर्फ की परतों में बदलाव और संभावित भूस्खलन क्षेत्रों की नियमित निगरानी जरूरी होगी.
आईसीआईएमओडी की 2026 की रिपोर्ट भी बताती है कि हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियरों का क्षरण तेजी से बढ़ा है. 1975 के बाद करीब 89 प्रतिशत दर्ज वर्षों में ग्लेशियरों का द्रव्यमान संतुलन नकारात्मक रहा है और वर्ष 2000 के बाद बर्फ के नुकसान की गति और तेज हुई है. बदलता हिमालय केवल ग्लेशियरों के सिकुड़ने की कहानी नहीं है.
आईसीआईएमओडी ने इस साल क्षेत्रीय क्रायोस्फीयर रणनीति जारी करते हुए बताया है कि ग्लेशियरों के साथ बर्फ और पर्माफ्रॉस्ट भी तेजी से बदल रहे हैं तथा नदी प्रवाह अधिक अनिश्चित हो रहा है. इसके साथ हिमस्खलन, मलबा प्रवाह और भूस्खलन जैसे खतरों के बढ़ने की आशंका भी जुड़ी है.
इसका अर्थ यह है कि हिमालय में आपदाएं अब एक ही कारण से पैदा होने वाली अलग-अलग घटनाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि कई प्राकृतिक प्रक्रियाएं एक-दूसरे से जुड़कर बहुत कम समय में बड़ी तबाही पैदा कर सकती हैं. जलवायु परिवर्तन के साथ इस घटना का संबंध भी इसी व्यापक संदर्भ में देखना होगा.
वैज्ञानिकों ने अभी यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि 26 अगस्त की आपदा सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण हुई. किसी एक पर्वतीय ढलान के टूटने के पीछे स्थानीय भूगर्भीय संरचना, बर्फ की स्थिति, तापमान, वर्षा और ढलान की स्थिरता जैसे कई कारण हो सकते हैं.
लेकिन व्यापक वैज्ञानिक प्रमाण यह जरूर बताते हैं कि हिमालय का क्रायोस्फीयर तेजी से बदल रहा है. ऐसे बदलाव पर्वतीय प्रणालियों को पहले से अलग परिस्थितियों में ला सकते हैं और कुछ क्षेत्रों में जोखिमों की प्रकृति बदल सकते हैं. इसका सीधा असर भविष्य की विकास योजनाओं पर पड़ेगा.
हिमालयी क्षेत्र में सड़क, पुल, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाएं और पर्यटन केंद्र तेजी से विकसित हो रहे हैं. इन परियोजनाओं की योजना बनाते समय केवल वर्तमान भूगोल और पिछले आपदा रिकॉर्ड को आधार बनाना पर्याप्त नहीं होगा.
जिस स्थान को आज अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जा रहा है, वहां आने वाले दशकों में ग्लेशियरों, पर्माफ्रॉस्ट और ढलानों की स्थिति बदल सकती है. इसलिए किसी परियोजना की व्यवहार्यता जांच में उसके पूरे जीवनकाल के दौरान बदलते पर्वतीय जोखिमों को शामिल करना जरूरी होगा. रसुवा की घटना ने आपदा चेतावनी की एक दूसरी सीमा भी उजागर की है.
जिन घटनाओं में कुछ घंटे या दिन पहले खतरे का संकेत मिल जाता है, वहां चेतावनी प्रणाली बेहद प्रभावी साबित हो सकती है.
लेकिन जब पहाड़ का कोई हिस्सा अचानक टूटता है और कुछ ही मिनटों में नदी घाटी तक पहुंच जाता है, तब चेतावनी से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि जोखिम वाले क्षेत्र में निर्माण कितना है, लोग कहां बसे हैं और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा किस जगह बनाया गया है.
इसलिए हिमालय के लिए भविष्य की रणनीति में ‘पहले चेतावनी, फिर बचाव’ के साथ ‘पहले से जोखिम कम करना’ भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा.
नदी के किनारे बस्तियों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की स्थिति, जलग्रहण क्षेत्रों में निर्माण, सुरंगों और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा, वैकल्पिक सड़क संपर्क और स्थानीय स्तर पर त्वरित निकासी योजनाओं को नए सिरे से देखा जाना होगा. स्थानीय समुदायों की भूमिका भी इसमें महत्वपूर्ण हो सकती है.
ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोग मौसम, बर्फ, नदी और ढलानों में होने वाले बदलावों को लंबे समय से देखते आए हैं. वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय अनुभव को एक साथ जोड़कर ऐसे संकेतों की पहचान की जा सकती है, जिन्हें केवल उपग्रह या सेंसर से पकड़ना कठिन हो.
आईसीआईएमओडी भी हिमालयी आपदा जोखिम घटाने में भूमि उपयोग की बेहतर योजना और स्थानीय तथा पारंपरिक ज्ञान को शामिल करने पर जोर देता है. नेपाल की यह त्रासदी इसलिए केवल एक देश की प्राकृतिक आपदा नहीं है.
हिमालय भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान तक फैली एक साझा पर्वतीय प्रणाली है और इसके जल तथा पर्यावरणीय बदलावों का प्रभाव करोड़ों लोगों तक पहुंचता है.
एक देश में ऊंचाई पर होने वाला बदलाव दूसरे देश में नदी, बाढ़, बिजली और जल सुरक्षा के रूप में सामने आ सकता है. 26 अगस्त की घटना ने इसी साझा चुनौती को बेहद कठोर तरीके से सामने रखा है. हिमालय अब केवल पिघलते ग्लेशियरों और कम होते बर्फ भंडार की कहानी नहीं रह गया है.
बदलती बर्फ, गर्म होती ऊंचाई, अस्थिर होती ढलानें और तेजी से बढ़ता निर्माण मिलकर आपदा का नया चेहरा तैयार कर रहे हैं. आने वाले वर्षों में चुनौती सिर्फ यह पता लगाने की नहीं होगी कि अगली बाढ़ कब आएगी, बल्कि यह समझने की होगी कि अगली आपदा शुरू कहां से हो सकती है—नदी से, झील से या खुद पहाड़ से.
📡 स्रोत: NewsData.io