न्यूजीलैंड की संसद ने भारत के साथ हुए एफटीए को दी मंजूरी, अधिकतर निर्यात पर जीरो ड्यूटी
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Date-16 September 2026
न्यूजीलैंड की संसद ने बुधवार को भारत के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) को 93-29 (पक्ष-विपक्ष) के मत से मंजूरी दे दी है। यह जानकारी व्यापार और निवेश मंत्री टॉड मैक्ले की ओर से दी गई। मैक्ले ने कहा कि वोट से इस समझौते और इससे होने वाले संभावित आर्थिक फायदों के लिए संसद का मजबूत समर्थन मिला है।
उन्होंने कहा कि एफटीए से न्यूजीलैंड के निर्यातकों को भारत में ज्यादा पहुंच मिलेगी, जो दुनिया की सबसे बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। मैक्ले के अनुसार, जब यह समझौता लागू होगा, तो भारत को होने वाले न्यूजीलैंड के 57 प्रतिशत निर्यात पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। पूरी तरह लागू होने पर, 95 प्रतिशत निर्यात पर शुल्क हटा दिए जाएंगे या काफी कम कर दिए जाएंगे।
उन्होंने यह भी बताया कि अकेले कीवीफ्रूट इंडस्ट्री को पांच वर्षों में शुल्क के तौर पर लगभग 125 मिलियन न्यूजीलैंड डॉलर की बचत होने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा कि इस समझौते से बॉर्डर पर तेजी से क्लीयरेंस मिलेगी और भारत के बढ़ते मध्यम वर्ग तक बेहतर पहुंच मिलेगी, जो भोजन, टेक्नोलॉजी, शिक्षा, पर्यटन, प्रोफेशनल सेवाओं और अन्य उत्पादों की मांग बढ़ा रहा है।
मैक्ले ने कहा कि न्यूजीलैंड-भारत के बीच बातचीत की घोषणा मार्च 2025 में की गई थी और सरकार को उम्मीद है कि यह समझौता इस साल के आखिर तक लागू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि एफटीए से न्यूजीलैंड के निर्यातकों को अपने बिजनेस संबंध बढ़ाने में मदद मिलेगी और इससे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन द्वारा 2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार को दोगुना करने के लक्ष्य को भी समर्थन मिलेगा। यह समझौता तब लागू होगा जब दोनों देश अपनी-अपनी मंजूरी प्रक्रिया पूरी कर लेंगे।
💡 पृष्ठभूमि (Background)
न्यूजीलैंड की संसद ने भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) को मंजूरी दी, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापार में नई दिशा खुलती है। यह समझौता भारत में न्यूजीलैंड के निर्यात पर अधिकांश उत्पादों पर जीरो ड्यूटी लागू करता है, जिससे व्यापार लागत कम होगी। यह कदम दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को मजबूत करता है और निवेश के अवसर बढ़ाता है। आम जनता के लिए इसका मतलब है कि न्यूजीलैंड के उत्पादों की कीमतें कम हो सकती हैं और भारतीय उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिल सकते हैं। साथ ही, न्यूजीलैंड के निर्यातकों को भार