ओबीसी आरक्षण विवाद:पुरानी नियुक्तियों को सुरक्षा और 50% सीमा का मुद्दा
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →मध्यप्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण के कानूनी विवाद में पहले से नौकरी पा चुके कर्मचारियों की नियुक्तियां बचाने के लिए आंध्रप्रदेश के एक पुराने मामले से रास्ता निकाला गया। हाईकोर्ट में चेबरोलू लीला प्रसाद राव बनाम आंध्रप्रदेश राज्य के फैसले का सहारा लिया गया। इसमें सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने माना था कि असंवैधानिक आरक्षण नीति के लिए नियुक्त कर्मचारी दोषी नहीं हैं।
इसलिए विशेष परिस्थितियों में उनकी नियुक्तियां रद्द करने के बजाय संरक्षित रखी गई थीं। इस सिद्धांत को मानवीय अपवाद कहा गया। 2023 के अध्ययन से बताया कितने ओबीसी नौकरी में : हाईकोर्ट में प्रस्तुत 2023 के अध्ययन के मुताबिक, मध्यप्रदेश की सरकारी नौकरियों में एससी, एसटी और ओबीसी का संयुक्त प्रतिनिधित्व 63.76% है।
अकेले ओबीसी की हिस्सेदारी 28.16% बताई गई। यह मौजूदा 14% आरक्षण कोटे के दोगुने से अधिक और प्रस्तावित 27% से 1.16 प्रतिशत अंक ज्यादा है। कोर्ट में तर्क दिया गया कि सरकारी नौकरियों में पहले से पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने पर केवल अधिक जनसंख्या के आधार पर 50% आरक्षण सीमा पार करने को असाधारण परिस्थिति नहीं माना जा सकता।
मप्र की सरकारी नौकरियों में 28.16 फीसदी ओबीसी, यह प्रस्तावित 27% कोटे से 1.16 फीसदी अधिक 2019 से 2026 : ऐसे बढ़ा विवाद एक दर्जन फैसलों का संदर्भ, बिहार की नजीर याचिकाकर्ताओं ने पटना हाईकोर्ट के 20 जून 2024 के फैसले का हवाला दिया। इसमें बिहार में कुल आरक्षण 50% से बढ़ाकर 65% करने वाला कानून असंवैधानिक ठहराया गया था।
उस मामले में सरकारी नौकरियों में एससी, एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व 68.52% बताया गया था। 46 वकीलों ने की पैरवी : मामले में कुल 46 वकीलों ने हिस्सा लिया। इनमें याचिकाकर्ताओं की ओर से 17 और प्रतिवादी पक्ष से 29 वकील थे। प्रतिवादी पक्ष में सरकार के 10, हस्तक्षेपकर्ताओं के 14 और एमपीपीएससी के 5 वकील शामिल थे।
सुनवाई में इंद्रा साहनी, मराठा आरक्षण, एम.
नागराज, एमआर बालाजी और राम सिंह सहित सुप्रीम कोर्ट के एक दर्जन से अधिक फैसलों के न्यायिक सिद्धांतों का संदर्भ आया। इधर, सियासी गर्मी...
भाजपा-कांग्रेस ने एक दूसरे पर लगाए आरोप कमलनाथ सरकार की कानूनी चूक से उलझा ओबीसी आरक्षण: खंडेलवाल कमलनाथ सरकार ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक लाभ के लिए ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का अध्यादेश जल्दबाजी में जारी किया, लेकिन मजबूत संवैधानिक आधार नहीं दिया। अब कांग्रेस अपनी गलती छिपाकर भाजपा पर आरोप लगा रही है।
भाजपा 27% ओबीसी आरक्षण दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। कानूनी अध्ययन के बाद रणनीति बनेगी। जरूरत पड़ने पर सर्वदलीय चर्चा होगी। -हेमंत खंडेलवाल, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सरकार की कमजोर पैरवी से लगा झटका, सुप्रीम कोर्ट जाएंगे : पटवारी भाजपा सरकार की कमजोर पैरवी के कारण 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण की योजना को झटका लगा।
कमलनाथ सरकार ने 2019 में आरक्षण बढ़ाया था, लेकिन भाजपा ने मामला उलझाया। वकीलों पर करोड़ों खर्च किए। उन्होंने कहा कि 87-13% फॉर्मूले से भर्तियां अटकी हैं। कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट जाएगी। सरकार तत्काल एसएलपी दायर करे, विधानसभा का विशेष सत्र बुलाए और जातिगत जनगणना कराए। -जीतू पटवारी, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ओबीसी महासभा ने दी आंदोलन की चेतावनी: ओबीसी महासभा ने हाईकोर्ट के फैसले पर निराशा जताई है।
संगठन के राष्ट्रीय कोर कमेटी सदस्य लोकेंद्र गुर्जर ने कहा कि हजारों अभ्यर्थियों का भविष्य अनिश्चितता में है। महासभा इसके खिलाफ जल्द प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू करेगी।
📡 स्रोत: NewsData.io