इतिहास

पैग़म्बर ए इस्लाम के जन्मदिन पर जानिए आखिर क्यों अपने वक्त से बहुत आगे थे हज़रत मुहम्मद

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 26 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
पैग़म्बर ए इस्लाम के जन्मदिन पर जानिए आखिर क्यों अपने वक्त से बहुत आगे थे हज़रत मुहम्मद

पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद ﷺ की विलादत का दिन सिर्फ मुसलमानों के लिए खुशी और अकीदत का दिन नहीं है, बल्कि यह उस शख्सियत की सीरत को पढ़ने का मौका भी है, जिसने करीब 1400 साल पहले ऐसे समाज की बुनियाद रखने की कोशिश की, जिसमें इंसान की इज्जत उसके खानदान, दौलत और कबीले से नहीं, बल्कि उसके किरदार और इंसाफ से तय हो।

आज हम जिन बातों को मानव अधिकार, सामाजिक न्याय, गरीबों के हक, पड़ोसी के अधिकार और समाज में जिम्मेदारी जैसी बड़ी बातें मानते हैं, उनमें से कई सवालों पर पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ ने अपने दौर में ही बेहद साफ रुख पेश किया था। और शायद यही वजह है कि उन्हें समझने के लिए सिर्फ उस दौर को देखना काफी नहीं है।

यह भी देखना पड़ता है कि जिस समाज में वे आए, वह कैसा था और उन्होंने उसमें क्या बदलाव पैदा किया। उस वक्त अरब समाज कबीलाई रिश्तों में बंटा हुआ था। आदमी की ताकत उसका कबीला था। कमजोर के लिए इंसाफ हासिल करना आसान नहीं था। गरीब, यतीम और गुलाम समाज के निचले पायदान पर खड़े थे।

ऐसे माहौल में पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ ने इंसान को उसके इंसान होने की बुनियाद पर देखने का संदेश दिया। उन्होंने ताकतवर को यह एहसास कराया कि ताकत का मतलब मनमानी नहीं है और कमजोर को यह भरोसा दिया कि वह भी इंसाफ का हकदार है। लेकिन उनकी सोच की खास बात सिर्फ यही नहीं थी।

मदीना पहुंचने के बाद एक ऐसा समाज सामने था जिसमें अलग-अलग कबीले और धार्मिक समुदाय रहते थे। पैगंबर ﷺ ने उनके साथ समझौते और जिम्मेदारियों की व्यवस्था कायम की।

जिसे आज आम तौर पर 'मिसाक-ए-मदीना' या 'मदीना का समझौता' कहा जाता है, उसमें अलग-अलग समुदायों के बीच आपसी जिम्मेदारियों, सुरक्षा और रिश्तों को व्यवस्थित करने की कोशिश दिखाई देती है।

इतिहासकारों और विद्वानों के बीच इस दस्तावेज के स्वरूप और इसकी पूरी ऐतिहासिक संरचना को लेकर बहस जरूर है, लेकिन मदीना में विभिन्न समुदायों के साथ समझौते और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की कोशिश पर व्यापक सहमति है।

यानी उस दौर में जब दुनिया के बहुत से समाज सत्ता और ताकत के आधार पर चलते थे, मदीना में लिखित समझौते, जिम्मेदारी और आपसी अधिकारों की बात सामने आ रही थी। पैगंबर ﷺ की एक और बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने सिर्फ अधिकारों की बात नहीं की, जिम्मेदारियों की बात भी की। पड़ोसी का हक है तो पड़ोसी के प्रति जिम्मेदारी भी है।

गरीब का हक है तो अमीर की जिम्मेदारी भी है। परिवार के अधिकार हैं तो परिवार के प्रति फर्ज भी हैं। समाज में ताकत मिली है तो उसके साथ जवाबदेही भी आती है। यही सोच किसी भी समाज को सिर्फ भीड़ से एक समुदाय बनाती है। उनकी तालीम में इल्म की भी बहुत अहमियत थी। उन्होंने ज्ञान को सिर्फ किसी खास वर्ग की जागीर नहीं रहने दिया।

पढ़ने-लिखने और सीखने की तरफ लोगों को प्रेरित किया। यह उस दौर के लिए बेहद अहम बदलाव था, क्योंकि ज्ञान और शिक्षा हर इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा नहीं थे। उनकी सीरत में हमें एक और बात बार-बार दिखाई देती है और वो है माफ करना।

मक्का में वर्षों तक विरोध, तकलीफ और बहिष्कार झेलने के बाद जब वह वक्त आया जब उनके पास अपने विरोधियों से बदला लेने की ताकत थी, तब उनकी सीरत का एक बड़ा संदेश बदले से ज्यादा माफी और सुधार का रहा। यहां एक बेहद जरूरी बात समझनी चाहिए।

पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ को 'अपने वक्त से आगे' कहना सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए कि आज की कोई आधुनिक सोच हमें उनकी किसी शिक्षा से मिलती-जुलती नजर आती है। असली बात यह है कि उन्होंने अपने दौर की सामाजिक बुराइयों को चुनौती दी और इंसान के किरदार, इंसाफ, जिम्मेदारी और रहम को समाज के केंद्र में रखा।

उन्होंने यह भी बताया कि किसी इंसान की असली कीमत उसकी दौलत नहीं है। आज भी दुनिया जाति, नस्ल, रंग, भाषा, दौलत और सामाजिक हैसियत के नाम पर बंटी हुई है। ऐसे में 1400 साल पहले दिया गया यह संदेश कि इंसान की इज्जत उसके किरदार और तकवा से है, आज भी उतना ही मौजूं लगता है।

विवाह और परिवार के मामले में भी पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ की शिक्षाएं अपने दौर के लिए बेहद महत्वपूर्ण थीं। निकाह को सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं, बल्कि अधिकारों और जिम्मेदारियों वाला समझौता माना गया।

पत्नी के लिए मेहर का अधिकार, उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी, विरासत में हिस्सा और वैवाहिक जीवन में उसके अधिकारों को स्पष्ट किया गया। तलाक को भी मनमानी का जरिया नहीं छोड़ा गया, बल्कि उसके लिए प्रक्रिया, इंतजार की अवधि और दोनों पक्षों के अधिकारों से जुड़े नियम निर्धारित किए गए।

इस्लामी कानूनी परंपरा में विवाह, तलाक और विरासत से जुड़े ये नियम बाद की सदियों में बाकायदा विस्तृत कानूनी व्यवस्था का हिस्सा बने। खास बात यह थी कि तलाक की स्थिति में भी महिला को पूरी तरह बेसहारा छोड़ने की सोच स्वीकार नहीं की गई।

कुरआन ने तलाक के मामले में भले तरीके से साथ रखने या भले तरीके से अलग होने की बात कही और मेल-मिलाप की कोशिशों को महत्व दिया। इस्लामी परंपरा में खुलअ जैसे रास्ते भी विकसित हुए, जिनके जरिए महिला वैवाहिक संबंध समाप्त करने की मांग कर सकती थी।

आज 21वीं सदी में दुनिया के अलग-अलग देशों में विवाह, तलाक, महिलाओं की संपत्ति और पारिवारिक अधिकारों को लेकर नए-नए कानून बनते और बदलते दिखाई देते हैं।

इसलिए जब पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ की सीरत को देखा जाता है तो यह बात ध्यान खींचती है कि 7वीं सदी के अरब समाज में ही विवाह और परिवार को केवल पुरुष की इच्छा पर छोड़ देने के बजाय अधिकारों और जिम्मेदारियों के एक व्यवस्थित ढांचे में रखने की कोशिश की गई थी। महिलाओं को संपत्ति और विरासत के अधिकार देना भी इसी बदलाव का हिस्सा था।

पैगंबर ﷺ की विलादत हमें सिर्फ एक तारीख याद नहीं कराती बल्कि ये हमसे एक सवाल भी पूछती है कि अगर हम उन्हें अपना रहनुमा मानते हैं, तो उनकी सीरत से हमने अपनी जिंदगी में कितना लिया? क्या हम अपने घर में इंसाफ करते हैं? क्या हम गरीब के साथ वही व्यवहार करते हैं जो अपने बराबर वाले के साथ करते हैं?

क्या हम अपने पड़ोसी के हक का ख्याल रखते हैं? क्या हम अपने से कमजोर इंसान की इज्जत करते हैं? और क्या हम उस इंसान को भी इंसाफ देने के लिए तैयार हैं, जिससे हमारी राय नहीं मिलती? शायद पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ को याद करने का सबसे खूबसूरत तरीका यही है कि उनकी सीरत को सिर्फ किताबों और तकरीरों तक सीमित न रखा जाए।

उनकी विलादत का असली पैगाम तब समझ आएगा, जब हमारे व्यवहार में इंसाफ आएगा, हमारी जुबान में नरमी आएगी, हमारे घरों में रिश्तों की कद्र होगी और हमारे समाज में कमजोर इंसान खुद को महफूज महसूस करेगा। क्योंकि बड़े लोग सिर्फ इतिहास में पैदा नहीं होते। कुछ लोग इतिहास की दिशा बदल देते हैं।

और पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ की सीरत को समझने की कोशिश की जाए तो यही उनकी सबसे बड़ी पहचान नजर आती है और उन्होंने एक ऐसे दौर में इंसान को उसके किरदार, जिम्मेदारी और इंसाफ के आईने में देखने की तालीम दी, जब समाज की पहचान काफी हद तक कबीले और ताकत से होती थी।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।