पाकिस्तान में हिंदू महिला रीता का अपहरण और जबरन निकाह मामला: कोर्ट के आदेश पर माता-पिता के पास लौटी बेटी, मिली बड़ी राहत
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पड़ोसी देश पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदू समुदाय की लड़कियों और महिलाओं पर होने वाले अत्याचार, अपहरण और जबरन मतांतरण (धर्मांतरण) के मामले आए दिन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों पर चिंता का विषय बनते रहे हैं।
अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन और न्याय की गुहार से जुड़ी ऐसी ही एक झकझोर देने वाली और सनसनीखेज घटना पाकिस्तान के सिंध प्रांत से सामने आई है, जहाँ 21 वर्षीय एक युवा हिंदू महिला को अपहरण और जबरन निकाह के दलदल से आखिरकार कानूनी संघर्ष के बाद मुक्ति मिल गई है।
पाकिस्तान की एक अदालत ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण और राहत भरे फैसले में 21 वर्षीय हिंदू महिला रीता को उसके माता-पिता और भाई के साथ सुरक्षित घर लौटने की अनुमति प्रदान कर दी। इस मामले ने एक बार फिर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा व्यवस्था और धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सिंध प्रांत से अपहरण और पंजाब ले जाने की पूरी साजिश समाचार एजेंसी पीटीआई (PTI) से प्राप्त विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरा मामला पाकिस्तान के सिंध जिले के संघार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली खिपरो तहसील की राणा राजपूत कॉलोनी से जुड़ा है।
यहीं की रहने वाली 21 वर्षीय रीता अचानक पिछले सप्ताह संदिग्ध परिस्थितियों में अपने घर से लापता हो गई थी। बेटी के अचानक गायब होने से परिवार में कोहराम मच गया। रीता के भाई रवि शंकर ने तुरंत स्थानीय पुलिस थाने में इसकी औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।
परिवार द्वारा दी गई शिकायत और दस्तावेजों के मुताबिक, जब उन्होंने अपने इलाके के सीसीटीवी फुटेज खंगाले, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। फुटेज में साफ तौर पर यह दिखाई दे रहा था कि कुछ अज्ञात और संदिग्ध लोग 24 अगस्त को रीता को जबरन घर से अगवा करके ले जा रहे हैं।
इतना ही नहीं, अपहरणकर्ता घर में रखी कीमती नकदी, आभूषण और उसका मोबाइल फोन भी अपने साथ ले गए थे, जिससे यह साबित होता है कि यह वारदात बेहद सुनियोजित तरीके से अंजाम दी गई थी।
गुजरांवाला ले जाकर इस्लाम कबूलवाने और निकाह का दबाव परिवार की शिकायत के अनुसार, अपहरणकर्ताओं ने रीता को सिंध प्रांत से निकालकर सीधे पंजाब प्रांत के गुजरांवाला शहर में पहुँचा दिया, जो कि लाहौर से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
वहां ले जाने के बाद इस बेकसूर हिंदू युवती पर कथित तौर पर भारी मानसिक और शारीरिक दबाव बनाया गया। उसे जबरन इस्लाम धर्म अपनाने (मतांतरण) के लिए मजबूर किया गया और नजीर हुसैन नामक एक ऐसे व्यक्ति से निकाह करने का दबाव डाला गया, जो पहले से ही शादीशुदा था।
पाकिस्तान में इस तरह के मामलों में अक्सर अपराधियों को स्थानीय प्रभावशाली लोगों और कट्टरपंथी तत्वों का संरक्षण प्राप्त होता है, जिसके कारण पीड़ित परिवार न्याय पाने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हो जाते हैं।
इस मामले में भी जब रीता के परिजनों को उसकी लोकेशन का पता चला, तो उन्होंने अपनी बेटी को बचाने के लिए हरसंभव कानूनी और सामाजिक प्रयास शुरू कर दिए। पुलिस की भूमिका और 'दारुल अमान' भेजने की जिद मामले के तूल पकड़ने और सोशल मीडिया तथा मानवाधिकार संगठनों के दबाव के बाद हरकत में आई पंजाब पुलिस ने आखिरकार रीता को बरामद कर लिया।
इसके बाद पुलिस ने सोमवार को उसे एक न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया। हैरानी की बात यह रही कि पुलिस और सरकारी मशीनरी ने अदालत में यह मांग रखी कि रीता को सरकारी संरक्षण वाले शेल्टर होम 'दारुल अमान' में भेज दिया जाए।
पुलिस और संबंधित अधिकारियों का दावा था कि युवती अपने माता-पिता के पास वापस नहीं लौटना चाहती है और वह अपनी मर्जी से वहां रहना चाहती है। पुलिस के इस रुख से एक बार फिर यह आशंका गहराने लगी थी कि कहीं प्रशासनिक तंत्र किसी दबाव के तहत पीड़ित युवती को उसके परिवार से दूर रखने की साजिश तो नहीं रच रहा है।
वकीलों का कड़ा विरोध और अदालत में रीता का साहसिक बयान हालांकि, पीड़ित परिवार की तरफ से अदालत में पैरवी कर रहे वकीलों—असद जमाल और खेता राम—ने पुलिस और प्रशासन की इस मांग का पुरजोर विरोध किया।
उन्होंने अदालत को स्पष्ट शब्दों में बताया कि पुलिस के दावे पूरी तरह से बेबुनियाद हैं और वास्तव में रीता अपने भाई के साथ अपने माता-पिता के घर सुरक्षित लौटना चाहती है, जो खुद अदालत परिसर में मौजूद था।
वकीलों की दलील सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए स्वयं रीता को बुलाया और उससे शपथ लेकर उसका मूल बयान दर्ज करने के निर्देश दिए।
अदालत के अधिकारी ने जानकारी दी कि अपने मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयान में रीता ने पूरी निडरता और स्पष्टता के साथ कहा कि उसने कोई स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन या निकाह नहीं किया है, बल्कि वह अपनी मर्जी से और अपने पूरे होश-हवास में अपने माता-पिता के घर वापस जाना चाहती है।
कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और परिवार को सुपुर्दगी रीता का यह बयान सामने आने के बाद अदालत के सामने सच्चाई पूरी तरह से स्पष्ट हो गई। इसके बाद माननीय मजिस्ट्रेट ने बिना किसी देरी के फैसला सुनाते हुए रीता को पूरी स्वतंत्रता दी और उसे उसके भाई के साथ घर जाने की अनुमति दे दी।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी निर्देश दिया कि स्थानीय प्रशासन और पुलिस यह सुनिश्चित करे कि रीता और उसके परिवार को किसी भी प्रकार का खतरा न हो, तथा उन्हें सिंध स्थित उनके पैतृक घर तक पूरी सुरक्षा और हिफाजत के साथ पहुँचाया जाए।
अदालत के इस फैसले के बाद पीड़ित परिवार ने राहत की सांस ली है और न्याय मिलने पर संतोष व्यक्त किया है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति और मानवाधिकारों की पुकार यह घटना एक बार फिर इस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है कि पाकिस्तान में हिंदू, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की युवतियों की स्थिति कितनी असुरक्षित है।
जबरन अपहरण, मतांतरण और कम उम्र में जबरन निकाह के मामलों में अक्सर पुलिस और स्थानीय प्रशासन का रवैया ढुलमुल रहता है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब तक पाकिस्तान सरकार और न्यायपालिका इस तरह के मामलों में अपराधियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानून बनाकर त्वरित सजा सुनिश्चित नहीं करती, तब तक वहां की अल्पसंख्यक बेटियों का जीवन सुरक्षित नहीं हो सकता।
बहरहाल, रीता के मामले में अदालत की संवेदनशीलता और उसके अपने साहसिक बयान के कारण उसे एक बड़ी नर्क जैसी स्थिति से मुक्ति मिल गई है, लेकिन ऐसे हजारों अन्य मामले आज भी न्याय की आस में अंधेरे में दम तोड़ रहे हैं।
📡 स्रोत: NewsData.io