विदेश

पाकिस्तान से यारी पड़ी इतनी भारी, पुराना कर्ज चुकाने के लिए सऊदी ले रहा 8 अरब डॉलर का लोन

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 3 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
पाकिस्तान से यारी पड़ी इतनी भारी, पुराना कर्ज चुकाने के लिए सऊदी ले रहा 8 अरब डॉलर का लोन

जिस देश ने पाकिस्तान के साथ अपनी नजदीकियों को इमोशनल लेवल पर बढ़ाया उस देश की इकॉनमी का क्या हाल हुआ। पहले तुर्की के अर्दगन ने पाकिस्तान का हाथ थामा। आज वहां महंगाई आसमान छू रही है। फिर बांग्लादेश में शेख हसीना गई और यूनुस आए। पाकिस्तान से करीबियां बढ़ी और आज बांग्लादेश आईएमएफ के सामने कटोरा लेकर खड़ा है।

अब क्या यही पाकिस्तानी श्राप दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार के मालिक सऊदी अरब को लग गया है। जिस सऊदी की रईसी की मिसाल दी जाती थी। आज वह अपने पुराने कर्ज की किश्तें चुकाने के लिए $8 बिलियन का नया लोन ढूंढ रहा है। दरअसल सच्चाई बहुत डरावनी है।

सऊदी अरब का नेशनल डेप्ट मैनेजमेंट सेंटर आज दुनिया के बड़े बैंकों के दरवाजे खटखटा रहा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट कहती है कि सऊदी को $8 बिलियन का ताजा लोन चाहिए। लेकिन क्यों चाहिए? क्योंकि 2026 में सऊदी की कुल फाइनेंसिंग जरूरत करीब 58 बिलियन है।

इसमें से 14 बिलियन यानी करीब 25% पैसा सिर्फ इसलिए चाहिए ताकि जो पुराने लोन लिए थे उनका प्रिंसिपल अमाउंट चुकाया जा सके। इसे ही कहते हैं पाकिस्तान मॉडल। जब आपकी कमाई, आपके पुराने कर्जों का ब्याज और किस्त भी ना चुका पाए तो आप दिवालियापन की पहली सीढ़ी पर खड़े होते हैं।

इसे भी पढ़ें: सऊदी अरब के रेगिस्तान में भारत का तूफान, इजरायल भी हैरान! सऊदी की यह हालत 2026 में अतुलनीय और अविश्वसनीय है। अच्छा यहां पर एक और बड़ा संकट है जिसे क्राउडिंग आउट इंपैक्ट कहते हैं। सऊदी के बैंकों को बनाया गया था। वहां के व्यापारियों और प्राइवेट सेक्टर को पैसा देने के लिए।

लेकिन आज एमबीएस और उनकी सरकार इन बैंकों का सारा पैसा खुद ही सोख रही है। नतीजा सऊदी अरब का प्राइवेट क्रेडिट ग्रोथ जो कभी 10% से ऊपर था अब गिरकर 5% के करीब आ गया। एमबीएस का सपना था कि विज़न 2030 के तहत प्राइवेट सेक्टर इकॉनमी में 65% योगदान देगा। लेकिन जब प्राइवेट सेक्टर के पास पैसा ही नहीं होगा तो वह ग्रोथ कैसे करेगा?

सारा पैसा तो सरकार अपने डेफिसिट को भरने में लगा रही है। जब युद्ध के पीक पर तेल $126 प्रति बैरल था तब सऊदी का तेल एक्सपोर्ट आधा रह गया। क्योंकि हूती विद्रोहियों और ईरान के डर से शिपिंग प्रीमियम बढ़ गया और सप्लाई चेन ठप हो गई। अब युद्ध कुछ शांत हुआ और सऊदी ने मार्केट में तेल उतारा तो कीमतें गिरकर $70 पर आ गई।

यानी मलाई अमेरिका और रूस खा गए और सऊदी के हाथ लगा खाली कटोरा। ऊपर से ट्रंप का दबाव है कि अमेरिका में निवेश करो और पाकिस्तान की फौज को पैसे दो। इसे भी पढ़ें: मुस्लिम NATO की पहली मीटिंग में ऐसा ऐलान, बुरे फंसे नेतन्याहू! सऊदी अरब आज एक ऐसी राह पर है जहां उसकी असली ऑयल लेड इकॉनमी दम तोड़ती दिखाई दे रही है।

अब यहां पर एक सवाल यह है कि सऊदी अरब में इतनी समस्या है तो क्या इसका विद्रोह होगा? देखिए सऊदी अरब में एक अनहा नियम है कि सरकार जनता को खूब पैसा, सब्सिडी और ऐशो आराम देगी और बदले में जनता राजा के खिलाफ आवाज नहीं उठाएगी। इसे सोशल कॉन्ट्रैक्ट कहते हैं। लेकिन अब पैसा खत्म हो रहा है।

एमबीएस ने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट्स जैसे नियम और मुकाब पर ब्रेक लगा दिया।

📡 स्रोत: NewsData.io

📰 पूरी खबर पढ़ें (NewsData.io पर जाएं)
J
JKS News Desk

वॉयस ऑफ क्रांति की संपादकीय टीम आपके लिए भोपाल, मध्यप्रदेश और देश की सटीक और विश्वसनीय समाचार प्रस्तुत करती है।