न पेड़ उगे, न एक बूंद तेल निकला:किसानों का पाम ऑयल कागजों में, पांच साल में 46 करोड़ सब्सिडी नहीं बांट पाए
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता घटाने के लिए केंद्र सरकार ने अगस्त 2021 में राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-ऑयल पाम शुरू किया था। पांच साल में देश का पाम ऑयल उत्पादन 11.20 लाख टन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया। छत्तीसगढ़ में स्थिति यह है कि प्रोसेसिंग यूनिट लगना तो दूर, लक्ष्य के मुताबिक पौधरोपण भी नहीं हो पाया और प्रदेश में एक बूंद तेल का उत्पादन नहीं हुआ।
5 साल में प्रदेश में 16,400 हेक्टेयर में ऑयल पाम लगाने का लक्ष्य था। जबकि 7,315 किसानों के 10,796 हेक्टेयर में ही पौधे लगे। यानी लक्ष्य करीब 66% रही। किसानों को सब्सिडी देने के लिए मिले 70 करोड़ रुपए में से केवल 23.81 करोड़ रुपए ही बांटे जा सके। कई जिलों के किसान दो से तीन साल से पौधों का इंतजार कर रहे हैं।
कहीं निर्धारित आकार से छोटे पौधे भेजे गए तो कहीं कंपनियों ने सप्लाई ही नहीं की। जिला अधिकारी लगातार पत्र और रिमाइंडर भेज रहे हैं, लेकिन कंपनियां जवाब नहीं दे रहीं। भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि 5 साल बाद भी राष्ट्रीय मिशन में छत्तीसगढ़ का योगदान 1% से कम है। पिछले साल किसानों को पाम फ्रूट बेचकर सिर्फ 66 लाख मिले।
लोरमी के ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी भानू प्रताप जांगड़े ने 25 अगस्त को कंपनी प्री यूनिक्स को पत्र लिखकर 4 किसानों को भेजे 679 पौधों को अमानक बताया था। मांगे गए पौधों की ऊंचाई 3.5 से 4 फीट थी, जबकि कंपनी ने सिर्फ 1.5 से 2 फीट के पौधे भेजे। सफल किसान का उदाहरण: 30 एकड़ से 58.8 लाख की कमाई महासमुंद के भड़ेसर निवासी किसान मुकेश चंद्राकर 2016 से ऑयल पाम की खेती कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि 30 एकड़ से हर साल करीब 300 टन पाम फ्रूट मिलता है। इसे बेचकर लगभग 58.8 लाख रुपए की आय होती है। इसी रकबे में धान से करीब 19.5 लाख ही मिलते। प्रदेश में प्रोसेसिंग यूनिट नहीं होने के कारण उन्हें पांच साल तक फल बेचने के लिए ओडिशा जाना पड़ा। उनका उदाहरण बताता है कि खेती में संभावना है, लेकिन स्थानीय स्तर पर खरीदी और प्रोसेसिंग का ढांचा तैयार नहीं हुआ है।
16,400 हेक्टेयर का लक्ष्य, 10,796 हेक्टेयर में ही रोपण नर्सरी खाली, नौ पत्रों के बाद भी नहीं आए पौधे बतौली की बेलकोटा रोपणी में इस साल एक भी पौधा नहीं है। वरिष्ठ उद्यान विस्तार अधिकारी केशव नाथ सिदार ने बताया कि 18 हेक्टेयर में रोपण के लिए 19 किसानों को 2,574 पौधे देने थे। कंपनी को 29 जुलाई को पत्र लिखा गया, लेकिन पौधे नहीं मिले।
लखनपुर के गुमगराकलां में भी पौधों की सप्लाई नहीं हुई। दंतेवाड़ा की सहायक संचालक उद्यानिकी मीना मंडावी ने बताया कि कंपनी प्री यूनिक्स से 15,222 पौधे मांगे गए थे, लेकिन समय पर सप्लाई नहीं हुई। चार अगस्त को भेजे पत्र में पौधों की गुणवत्ता पर भी आपत्ति दर्ज कराई गई। बाद में कंपनी का जवाब मिलने पर कुछ पौधे लगवाए गए।
अंबिकापुर जिले को 16,164 पौधों की जरूरत थी। सहायक संचालक कार्यालय ने जून से सितंबर के बीच कंपनी को नौ पत्र-रिमाइंडर भेजे। अधिकारी हितेंद्र मेश्राम ने बताया कि कंपनी पूरी सप्लाई नहीं कर सकी। अब इसका फॉलोअप संचालनालय स्तर से किया जा रहा है। दो साल बाद पौधे मिले, अब खेत में कीचड़ कौहाबांधा के किसान नंदलाल पटेल के दामाद दउवा ने बताया कि दो हेक्टेयर में ऑयल पाम लगाने के लिए 3 साल पहले आवेदन किया था।
पौधे पिछले सप्ताह पहुंचे, अब खेत में कीचड़ होने से इन्हें लगाना मुश्किल है। कारीडोंगरी के रामचरण ने बताया कि उनके साथ प्रेमसिंह और दुखीदास के कुल 413 पौधे घरों के बाहर रखे हैं। आवेदन दो साल पहले किया था। सीतापुर के कृपाचंद्र ने 2025-26 में दो हेक्टेयर में 150 पौधे लगाए थे। उद्यान विस्तार अधिकारी विजय प्रकाश निकुंज के मुताबिक, इस सीजन में पौधे नहीं मिले।
कंपनी से भी जवाब नहीं आया। लक्ष्य पूरा होता तो सालाना 800 करोड़ रुपए का कारोबार: मिशन के मुताबिक 41 हजार एकड़ में पौधरोपण होना था। प्रति एकड़ औसतन 10 टन फ्रेश फ्रूट का उत्पादन मानें तो सालाना करीब 4.1 लाख टन फल मिलते। सितंबर की 19,500 रुपए प्रति टन की दर से इसकी कीमत लगभग 800 करोड़ रुपए होती।
फिलहाल पौधरोपण से लेकर फल खरीदी और प्रोसेसिंग तक पूरी शृंखला अधूरी है। जो कंपनियां पहले विफल रहीं, उन्हें फिर दे दी जिम्मेदारी विभाग का दावा- पौधे पूरे, किसानों की तैयारी अधूरी जहां पौधे नहीं मिले हैं, वहां किसानों ने खेत तैयार नहीं किए हैं। तार की बाड़, बोर और दूसरी जरूरी तैयारियां पूरी होने पर कंपनी पौधे उपलब्ध कराएगी।
जब भी पर्याप्त रकबे में उत्पादन शुरू होगा प्रोसेसिंग यूनिट लगाई जाएगी।’ -लोकेश कुमार, संचालक, उद्यानिकी विभाग
📡 स्रोत: NewsData.io