Podcast: सोनाली घोष ने साझा किए काजीरंगा के अनकहे किस्से
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अक्टूबर 28, नई दिल्ली: भारतीय वन सेवा (IFS) की अधिकारी सोनाली घोष ने वन्यजीव संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष, जलवायु परिवर्तन और जंगलों की सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से बात की। PB-Shabd के विशेष पॉडकास्ट में उन्होंने बताया कि वन्यजीवों की सुरक्षा में फ्रंटलाइन वनकर्मियों की भूमिका बेहद अहम है।
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की पहली महिला फील्ड डायरेक्टर रह चुकीं सोनाली घोष को अक्टूबर 2025 में प्रतिष्ठित IUCN WCPA केंटन आर. मिलर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। पॉडकास्ट में उन्होंने अपने वन सेवा के अनुभव साझा करते हुए बताया कि वन्यजीव संरक्षण केवल जानवरों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उनके प्राकृतिक आवास को बचाना, उनकी संख्या और व्यवहार का अध्ययन करना तथा इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को कम करना भी शामिल है।
गैंडों के संरक्षण में वनकर्मियों की अहम भूमिकासोनाली घोष ने बताया कि एक समय ऐसा था, जब काजीरंगा में गैंडों का शिकार बड़ी चुनौती बन गया था। उन्होंने कहा कि 2011 और 2013 के दौरान कुछ समय ऐसे भी थे, जब एक महीने में दो से तीन गैंडों का शिकार हो जाता था। हालांकि, उन्होंने जनवरी 2024 के बाद से एक सींग वाले गैंडे के शिकार की कोई घटना नहीं होने की बात कही।उन्होंने इसका श्रेय अग्रिम पंक्ति में तैनात वनकर्मियों को दिया, जो दिन-रात गश्त कर अवैध गतिविधियों पर नजर रखते हैं। उनके मुताबिक, गैंडा असम और देश की पहचान का अहम हिस्सा है, इसलिए उसके संरक्षण के लिए लगातार प्रयास करना जरूरी है।
क्लाउडेड लेपर्ड के शावकों को जंगल में छोड़ावन्यजीव संरक्षण से जुड़ा अपना अनुभव साझा करते हुए घोष ने क्लाउडेड लेपर्ड के दो शावकों को बचाने की घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जब वे डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) थीं, तब इन शावकों को बचाया गया था। शुरुआत में उनकी प्रजाति की पहचान करना भी मुश्किल था।बाद में उनकी पहचान क्लाउडेड लेपर्ड के रूप में हुई। वन विभाग की टीम ने उनकी देखभाल की और उन्हें जंगल में स्वतंत्र रूप से रहने तथा शिकार करने के लिए तैयार किया। करीब एक साल बाद दोनों शावकों को उसी जंगल में छोड़ दिया गया, जहां से उन्हें बचाया गया था।
बाढ़ के दौरान वन्यजीवों की सुरक्षा बड़ी चुनौतीकाजीरंगा के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होने का जिक्र करते हुए घोष ने बताया कि ब्रह्मपुत्र नदी में आने वाली बाढ़ वहां के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है। इससे उद्यान के जलाशयों को पानी मिलता है और जल निकायों में जमा जलकुंभी जैसी वनस्पतियां भी बह जाती हैं।हालांकि, तेज बाढ़ के दौरान जानवर उद्यान से निकलकर कार्बी आंगलोंग की पहाड़ियों की ओर चले जाते हैं। ऐसे समय में वन विभाग के सामने मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और जानवरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की चुनौती होती है।
मानव गतिविधियां वन्यजीवों के लिए बड़ी चुनौतीजलवायु परिवर्तन और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में बदलाव पर बात करते हुए घोष ने कहा कि मानवीय गतिविधियों के कारण प्रजातियों के विलुप्त होने की प्रक्रिया तेज हुई है। उन्होंने असम के राज्य पक्षी व्हाइट-विंग्ड वुड डक का उदाहरण दिया, जिसकी संख्या में पिछले तीन दशकों में कमी आई है।उन्होंने बताया कि इस पक्षी के प्राकृतिक आवास में कमी एक प्रमुख चिंता है।
जंगलों की संरचना में बदलाव और जलवायु परिवर्तन भी इसके कारण हो सकते हैं। ऐसे में वन्यजीवों की संख्या में गिरावट के कारणों को समझना और उनके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है।घोष ने यह भी कहा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना वन प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फसलों के पकने के मौसम में हाथियों के जंगल से बाहर आने पर उनकी और स्थानीय लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी वन विभाग की जिम्मेदारी है।
जंगल को किताब की तरह देखती हैं घोषजंगल के प्रति अपने नजरिये को साझा करते हुए सोनाली घोष ने कहा कि वन अधिकारियों के लिए जंगल को देखने का नजरिया आम पर्यटकों से अलग होता है। जहां पर्यटक वन्यजीवों को देखने और तस्वीरें लेने के लिए जंगल जाते हैं, वहीं वन अधिकारियों को पेड़-पौधों, वनस्पतियों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन करना पड़ता है।उन्होंने जंगल की तुलना एक किताब से करते हुए कहा कि उसका हर दिन और हर पन्ना कुछ नया सिखाता है।
सोनाली घोष के अनुभव बताते हैं कि वन्यजीव संरक्षण के लिए केवल सख्त निगरानी ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन, स्थानीय समुदायों का सहयोग और प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा भी जरूरी है।