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Prabhasakshi NewsRoom: Iran के खिलाफ Trump ने शुरू किया Operation Economic Outcast, India-China पर भी पड़ेगा बड़ा असर!

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 25 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
Prabhasakshi NewsRoom: Iran के खिलाफ Trump ने शुरू किया Operation Economic Outcast, India-China पर भी पड़ेगा बड़ा असर!

ईरान के खिलाफ लंबे खिंचते युद्ध के बीच अमेरिका ने अब आर्थिक मोर्चे पर ऐसा दांव चला है, जिसका असर सिर्फ तेहरान तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान को वैश्विक अर्थव्यवस्था से लगभग पूरी तरह काट देने के उद्देश्य से एक अभूतपूर्व आर्थिक अभियान शुरू करने का ऐलान किया है।

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इसे “ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट” और “आर्थिक डी-डे” करार देते हुए साफ संदेश दिया है कि अब लक्ष्य केवल ईरान पर प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि उसकी सरकार को चलाने वाली हर आर्थिक जीवनरेखा को काटना है।

स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि अमेरिका ईरान के वैश्विक वित्तीय संपर्कों पर आर्थिक हमला शुरू कर रहा है, ताकि अंततः तेहरान दुनिया में अकेला खड़ा रह जाए। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन अमेरिका की हर एजेंसी और हर उपलब्ध कानूनी संस्थागत शक्ति का इस्तेमाल करेगा।

उन्होंने एक तरह से भारत और चीन को भी संदेश दिया कि जो देश और संस्थाएं ईरान के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखेंगी, उन्हें भी अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था से दूर होने का जोखिम उठाना पड़ सकता है।

इसे भी पढ़ें: Donald Trump के Mail Voting आदेश को US Supreme Court से मिली हरी झंडी देखा जाये तो इस नई रणनीति की धार इसलिए अधिक खतरनाक मानी जा रही है क्योंकि अमेरिका अब केवल ईरान को निशाना नहीं बना रहा, बल्कि उन तीसरे देशों के नेटवर्क, कंपनियों, बैंकों, जहाजों और बिचौलियों पर भी शिकंजा कसने जा रहा है, जिनके जरिए तेहरान दशकों से प्रतिबंधों को दरकिनार कर तेल बेचता, धन का लेन-देन करता और जरूरी सामान हासिल करता रहा है।

अमेरिकी ट्रेजरी ने ईरान की अर्थव्यवस्था से जुड़े पांच प्रमुख क्षेत्रों यानि डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग को विशेष रूप से निशाने पर लिया है। वाशिंगटन ने करीब 60 ईरान-संबंधित संस्थाओं, व्यक्तियों और जहाजों पर प्रतिबंध भी लगा दिए हैं।

इनमें परमाणु, मिसाइल, साइबर और तेल नेटवर्क से जुड़े तत्व शामिल बताए गए हैं। कार्रवाई की जद संयुक्त अरब अमीरात, हांगकांग, चीन, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड और यूरोप तक फैले उन ब्रोकर नेटवर्क तक पहुंच रही है, जो कथित तौर पर ईरान की ‘शैडो फ्लीट’ और वित्तीय तंत्र को सहारा देते रहे हैं।

बेसेंट ने इस रणनीति को एक वन-टू पंच बताया है। पहला प्रहार ईरानी पेट्रोलियम निर्यात को बाधित करने के लिए पहले से लागू समुद्री नाकेबंदी और दबाव है, जबकि दूसरा प्रहार इतिहास के सबसे कठोर प्रतिबंधों का होगा।

अमेरिकी प्रशासन की मंशा सिर्फ ईरान की कमर तोड़ने तक सीमित नहीं दिखती; ट्रंप ने खुले तौर पर ईरान को “आर्थिक और सैन्य डेथ स्पाइरल” में फंसा बताया है।

यहां सवाल यह है कि क्या आर्थिक घेराबंदी वास्तव में शासन परिवर्तन या नीतिगत बदलाव ला पाएगी, या फिर इसका परिणाम पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए कहीं अधिक विस्फोटक साबित होगा? इस समीकरण में चीन का मुद्दा अमेरिका की सबसे बड़ी परीक्षा है।

दरअसल, बीजिंग ईरानी तेल का प्रमुख खरीदार बना हुआ है और उसने डिस्काउंटेड क्रूड की खरीद स्वतंत्र रिफाइनरियों तथा जटिल शिपिंग और भुगतान नेटवर्क के जरिए जारी रखी है। अगस्त में चीन को ईरानी तेल की आपूर्ति जुलाई के करीब 8.23 लाख बैरल प्रतिदिन से घटकर लगभग 5.34 लाख बैरल प्रतिदिन रही, लेकिन यह प्रवाह अब भी महत्वपूर्ण है।

चीन ने एकतरफा अमेरिकी प्रतिबंधों को समस्या का समाधान न मानते हुए खारिज किया है। जब बेसेंट से पूछा गया कि क्या ईरान से जुड़े चीनी बैंकों पर भी कार्रवाई हो सकती है, तो उनका जवाब था,“अमेरिकी प्रतिबंधों की पहुंच से कोई ऊपर नहीं है।” भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे तात्कालिक असर रणनीतिक से अधिक व्यापारिक हो सकता है।

चावल, चाय और फार्मास्यूटिकल्स सहित भारतीय निर्यात का एक हिस्सा ईरान तक दुबई के रास्ते पहुंचता रहा है। यूएई द्वारा व्यापार पर लगाए गए प्रतिबंधों और अमेरिका की नई सख्ती से ये रास्ते और कठिन हो सकते हैं। भारत-ईरान द्विपक्षीय व्यापार पहले ही 2018-19 के लगभग 17 अरब डॉलर के शिखर से 90 प्रतिशत से अधिक गिर चुका है।

नई अमेरिकी कार्रवाई भारतीय निर्यातकों के सामने भुगतान, लॉजिस्टिक्स और वैकल्पिक व्यापार मार्गों की चुनौती और बढ़ा सकती है। उधर, तेहरान ने भी जवाबी चेतावनी देकर दुनिया की चिंता बढ़ा दी है।

ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसेन रज़ाई ने कहा है कि यदि यह “आर्थिक युद्ध” जारी रहा तो फारस की खाड़ी से तेल की एक बूंद भी निर्यात नहीं होने दी जाएगी।

यदि यह धमकी वास्तविक कार्रवाई में बदलती है तो सऊदी अरब, यूएई, कतर, ओमान, कुवैत और बहरीन के बंदरगाहों, समुद्री मार्गों और ऊर्जा ढांचे पर खतरा मंडरा सकता है। दुनिया के लिए यह केवल ईरान पर प्रतिबंधों की कहानी नहीं, बल्कि संभावित वैश्विक ऊर्जा संकट की भूमिका भी बन सकती है।

देखा जाये तो इस आर्थिक युद्ध की सबसे बड़ी कीमत फिलहाल ईरान की आम जनता चुका रही है। सोमवार को ईरानी रियाल गिरकर करीब 20.2 लाख रियाल प्रति अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। युद्ध शुरू होने के बाद चावल की कीमतों में लगभग 60 प्रतिशत और बीफ के दाम में 150 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि बताई जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने ईरानी जीडीपी में 5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट का अनुमान लगाया है। बहरहाल, ट्रंप प्रशासन इसे ईरान को झुकाने की अंतिम आर्थिक लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है।

लेकिन मुद्दा यह है कि क्या अमेरिका तेहरान को दुनिया से काट पाएगा, या फिर ईरान को अलग-थलग करने की कोशिश खुद वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और पश्चिम एशिया की स्थिरता को एक नए संकट में धकेल देगी। “आर्थिक डी-डे” शुरू हो चुका है और अब इसकी असली लड़ाई ईरान की सीमाओं के बाहर लड़ी जाएगी।

📡 स्रोत: NewsData.io

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