Prahaar Movie Review: कसाब को सजा दिलाने की जंग, राजकुमार राव की दमदार एक्टिंग; फिर भी अधूरी रह गई ‘प्रहार’!
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Prahaar Movie Review: अविनाश अरुण के डायरेक्शन में बनी ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ उज्ज्वल निकम’ 16 अक्टूबर को थिएटर में रिलीज़ होगी और इसमें राजकुमार राव, वामिका गब्बी, ललित प्रभाकर, सिकंदर खेर, आशीष विद्यार्थी और जयदीप अहलावत हैं.
वहीं बता दें कि इस फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह कसाब ने कोर्टरूम में ड्रामा किया.
एक प्रॉसिक्यूटर, एक ट्रायल, एक छूटा हुआ मौका उज्ज्वल निकम की कहानी बताने से कहीं ज़्यादा, ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ उज्ज्वल निकम’ 26/11 के मुंबई टेरर अटैक और अकेले ज़िंदा पकड़े गए टेररिस्ट अजमल कसाब के प्रॉसिक्यूशन को फिर से दिखाती है.
यह फ़िल्म एक ठीक-ठाक कोर्टरूम ड्रामा है, लेकिन इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो केस की बारीक डिटेल्स से अनजान दर्शक पहले से न जानते हों.
जो बात इसे अलग बना सकती थी, वो थी निकम को खुद करीब से देखना, ट्रायल के लिए उनकी तैयारी और पुलिस के साथ उनके काम करने के रिश्ते को देखना. इसके बजाय, फिल्म ज़्यादातर जानी-पहचानी घटनाओं को बताने से ही खुश है.
यह एक ज़रूरी कहानी है, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन नतीजा जानने के बाद यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि फिल्म हमें उस आदमी के बारे में कुछ नया दिखाए जिसने इसे पक्का करने में मदद की.
ट्रायल सेंटर स्टेज पर है कहानी उज्ज्वल निकम (राजकुमार राव) के बारे में है, जो 26 नवंबर, 2008 के हमलों के बाद अजमल कसाब पर केस चलाने की ज़िम्मेदारी लेता है, जब आतंकवादी समुद्र के रास्ते मुंबई में घुस आए थे और 150 से ज़्यादा लोगों को मार डाला था.
कहानी का ज़्यादातर हिस्सा कोर्ट में होता है, जहाँ निकम का सामना डिफेंस लॉयर अब्बास काज़मी (सिकंदर खेर) से होता है.
फिल्म घर पर उनकी पत्नी ज्योति (वामिका गब्बी), बेटे और बेटी के साथ उनकी ज़िंदगी को भी दिखाती है.
उनकी पत्नी ज्योति की ओवेरियन कैंसर से लड़ाई कहानी में एक इमोशनल पहलू लाती है, लेकिन पर्सनल और प्रोफेशनल ट्रैक शायद ही कभी किसी भरोसे वाले तरीके से एक साथ आते हैं.
हम समझते हैं कि निकम की कोर्टरूम के अलावा भी ज़िम्मेदारियाँ हैं, फिर भी फ़िल्म यह ठीक से नहीं दिखा पाती कि एक ऐसे केस का बोझ उठाने का क्या मतलब है जिस पर पूरे देश का ध्यान है.
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फ़ैसले के पीछे का काम डायरेक्टर अविनाश अरुण को क्रेडिट मिलना चाहिए कि उन्होंने एक नेशनल ट्रेजेडी को मेलोड्रामैटिक तमाशा नहीं बनाया.
वो कार्रवाई को कंट्रोल में रखते हैं और कोर्टरूम की बातचीत को ज़्यादातर ड्रामा दिखाने देते हैं.
हालाँकि, फ़िल्म कोर्ट और निकम के घर पर इतना समय बिताती है कि एक प्रॉसिक्यूटर के तौर पर उनके असली काम को कम महत्व दिया जाता है.
इस लेवल के केस को तैयार करने में जो रिसर्च, प्लानिंग या पुलिस के साथ कोऑर्डिनेशन होता, उसके बारे में बहुत कम है.
राव और जयदीप अहलावत, जो निकम के पाकिस्तानी काउंटरपार्ट, ज़ुल्फ़िकार चौधरी का रोल कर रहे हैं, उनके बीच की बातचीत में एक ऐसी जान है जिसे फ़िल्म में और ज़्यादा इस्तेमाल किया जा सकता था.
कसाब का कबूलनामा और आखिर में टूटना भी असरदार है, जो हमें ट्रायल की गंभीरता की याद दिलाता है.
ये पल दिखाते हैं कि फ़िल्म क्या हासिल कर सकती है जब यह सिर्फ़ घटनाओं को दोहराने से आगे बढ़कर इसमें शामिल लोगों को सेंटर स्टेज पर आने देती है.
📡 स्रोत: NewsData.io