राजनीति

पूर्व CM ने कस दिया 'पेंच':जेलर ने बचाया 'कामवाली बाई' का पैसा; 33 करोड़ लगाकर भी छाया 'अंधेरा'

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
पूर्व CM ने कस दिया 'पेंच':जेलर ने बचाया 'कामवाली बाई' का पैसा; 33 करोड़ लगाकर भी छाया 'अंधेरा'

नमस्कार, पूर्व मुखियाजी ने मीडिया के सामने खड़े होकर मीडिया को ही खरी-खरी सुना दी। हालांकि पूर्व मंत्रीजी ने सोशल मीडिया के न्यूजमैन को हड़का दिया। भ्रष्टाचार अब पुरुषों की बपौती नहीं, महिला अफसर भी खूब नाम कमा रही हैं और बारां में 33 करोड़ का ब्रिज बना, लेकिन दिन के काम का। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1.

पूर्व मुखियाजी ने सुनाई 'खरी-खरी' पूर्व मुखिया मीडिया से आहत हैं। उन्हें लगता है कि मीडिया सरकार की भाषा बोलती है। पूर्व मुखियाजी चाहते हैं कि मीडिया विपक्ष की भाषा भी बोले। रेपो रेट और जीडीपी पर एक्सपर्ट बात करने के बाद उन्होंने उदास होकर कहा- देश में तमाम इश्यू हैं। पब्लिक को खड़ा होना पड़ेगा।

मेन स्ट्रीम मीडिया को आगे आना होगा। सोशल मीडिया पर लोग बढ़िया काम कर रहे हैं। उन्हें मुबारक। वे सलाम के पात्र हैं। वे बोलने की हिम्मत कर रहे हैं। बाकी लोग हिम्मत नहीं कर रहे। डरे हुए हैं। दबे हुए हैं। उनके स्वार्थ होंगे। अभी देश को बचाने की जरूरत है। संविधान को बचाने की जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्य से लोग रिएक्ट नहीं कर पा रहे।

लोगों को सीबीआई-ईडी-पुलिस का डर है। इसके बाद पूर्व मुखियाजी को निकाय चुनाव याद आ गए। वे आहत स्वर में बोले- बाड़ाबंदी को बैन कर देना चाहिए। देखा नहीं आपने, हमारे पार्षद उनकी बाड़ाबंदी में थे। इस प्रकार मुखियाजी ने बहुत सारी बातें कहकर मीडिया को मीडिया की भूमिका के बारे में बताया। हालांकि बाड़ाबंदी की बात आती है तो वे अपनी सरकार बचाने के दिन याद करते हैं, इस बार ऐसा नहीं हुआ।

पूर्व मुखियाजी ने तो सोशल मीडिया की तारीफ की। लेकिन करौली ने पूर्व मंत्रीजी ने सोशल मीडिया पत्रकार की फजीहत कर दी। करौली के सपोटरा में एक युवक का मर्डर हो गया। पूर्व मंत्रीजी पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने धरने पर बैठे थे। नौसिखिया पत्रकार ने पूर्व मंत्रीजी के आगे माइक कर दिया। बोला - पीड़ित परिवार का धरना चल रहा है।

आप समर्थन देने पहुंचे हैं। क्या कहेंगे?

समर्थन की बात सुनकर पूर्व मंत्री तुनक गए। चिढ़कर बोले- पत्रकार महोदय, बोलना तो सीखो पहले। क्या समर्थन? क्या बोल रहो हो? ऐसे ही बन गए पत्रकार? ले लिया यूट्यूब चैनल और चल गया काम? हम न्याय दिलाने आए हैं या समर्थन दिलाने?

चलो आगे बढ़ो। पत्रकार नौसिखिया जरूर था लेकिन थोड़ा सकपका पर दोबारा सवाल कर डाला- आपका क्या समर्थन रहेगा पीड़ित परिवार को?

फिर समर्थन की बात पर पूर्व मंत्री ने कैमरा पकड़कर दूसरी दिशा में मोड़ दिया। पत्रकार ने निष्कर्ष की भाषा में कहा- लगता है मंत्रीजी हमसे नाराज हैं। 2.

जेलर और जेइएन का करप्शन भ्रष्टाचार अब सिर्फ पुरुषों की बपौती नहीं रहा। महिला अधिकारी भी कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। बीते दिनों दो ऐसे मामले आए जिन्हें भ्रष्टाचारी पुरुष अफसर चुनौती की नजर से देख सकते हैं। झुंझुनूं के चिड़ावा में जेईएन मैडम 15 हजार लेते धरी गईं। मैडम कृषि कनेक्शन की बिजली लाइन बदलने के एवज में रिश्वत मांग रही थीं।

मांगे तो मैडम ने 25 हजार थे। लेकिन फिर बड़ा दिल दिखाते हुए फेस्टीवल सीजन में 10 हजार की छूट देते हुए 15 हजार पर राजी हो गई थीं। इतना उपकार करने के बाद भी शिकायतकर्ता धोखेबाज निकला। वह सीधे एसीबी के पास पहुंच गया और चुगली खा गया। एसीबी ने रकम जेईएन साहिबा की टेबल की दराज से निकाल ली। गिरफ्तार करके टीम ले जाने लगी तो पहले मैडम ने बच्चे छोटे होने की दुहाई दी।

उन्हीं बच्चों की सूरत याद कर रिश्वत को ना भी कहा जा सकता था। खैर, दूसरा मामला जरा अनोखा है। वे अजमेर महिला जेल की जेलर थीं। घर में साफ-सफाई का काम था। अब जेलर साहिबा की महिला जेल में इतनी महिला बंदी बंद हैं तो सफाईवाली को बाहर से बुलाकर पैसा क्यों खर्च करना?

कुछ इसी तरह का तिकड़मी विचार जेलर मैडम के दिमाग में आया। उन्होंने जेल प्रहरी साहिबा को ऑर्डर दिया कि मर्डर के जुर्म में बंद अमुक दो बंदियों को छोड़ दो। जेल प्रहरी ने जेलर का ऑर्डर माना और दो महिला बंदियों को छोड़ दिया। उन्हें अपनी कार में लेकर मैडम अपने फ्लैट पर पहुंची और साफ-सफाई में लगा दिया। दोनों महिला बंदी मामूली कैदी नहीं थीं। दोनों ने अपने-अपने प्रेमी के साथ मिलकर मर्डर किया था। बंदियों को घर ले जाने के लिए जेलर ने सारे कानून कायदों को ताक पर रख दिया। मामला खुला तो गिरफ्तार हो गईं। अब उसी जेल में पहुंचाया गया है, जिस जेल की जेलर थीं। 3.

चलते-चलते..

भ्रष्टाचार की बेल बिना खाद पानी कहीं भी उग जाती है। यह त्योहारी सीजन में तेजी से फैलती है। सरकारी निर्माण ठेकों में तो यह बेल बारहों मासी सदाबहार रहती है और तेजी से फलती-फूलती है। बारां में 33 करोड़ की लागत से रेलवे ओवर ब्रिज बनाया गया। ब्रिज बनकर तैयार हो गया। इसके ऊपर से गाड़ियां भी सरपट दौड़ने लगीं।

लेकिन इतना पैसा खर्च करने के बावजूद यह ब्रिज दिन के मतलब का है। क्योंकि रात में ब्रिज से गुजरना खतरे से खाली नहीं। रात में पूरा ब्रिज अंधेरे में डूबा रहता है। 33 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद इतना पैसा भी नहीं बचा कि बिजली के खंभे भी लगाए जा सकें। अब इस पर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। सवाल उठ रहे हैं। ठेका कंपनी का जिक्र हो रहा है।

नगर परिषद के हवाले दिए जा रहे हैं। नगर परिषद के आयुक्त महोदय का कहना है कि यह काम पहले क्यों नहीं कराया, यह मेरी जानकारी में नहीं है। कुल मिलाकर, लाइट का तो पता नहीं लेकिन लीपापोती का काम जोरों से चल रहा है। इनपुट सहयोग- रामप्रसाद मेहता (बारां), भरत मूलचंदानी (अजमेर), चंद्रमौली पचरंगिया (चिड़ावा, झुंझुनूं)।

वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।

📡 स्रोत: NewsData.io

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