राहुल गांधी के दौरे का राजनीतिक विरोध जायज़, लेकिन मृतक के घर जाकर संवेदना व्यक्त करने की भारतीय संस्कृति को ‘पॉलिटिकल टूरिज्म’ कहना भारतीयता का अपमान
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मारूफ अहमद खान
प्रधान संपादक, वॉयस ऑफ क्रांति
राहुल गांधी के बालाघाट दौरे का राजनीतिक विरोध करना किसी भी राजनीतिक दल का लोकतांत्रिक अधिकार है। उनके दौरे और राजनीतिक उद्देश्य पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन बीमारी और कुपोषण के कारण अपने बच्चों को खो चुके आदिवासी परिवारों के घर जाकर उनकी पीड़ा सुनना और उन्हें सांत्वना देना भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है।
किसी परिवार के घर दुख की घड़ी में पहुंचना, उसकी पीड़ा सुनना और उसे सांत्वना देना हमारी मानवीय संवेदना का परिचायक है। ऐसे में किसी राजनीतिक नेता की यात्रा के राजनीतिक उद्देश्य पर बहस करना अलग विषय है, लेकिन पीड़ित परिवार के दुख को सुनने और सांत्वना देने के प्रयास को केवल ‘पॉलिटिकल टूरिज्म’ कहना उस मानवीय संवेदना को छोटा करता है, जिसे भारतीय समाज हमेशा महत्व देता आया है।
राजनीति में विरोध और आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा हैं। राहुल गांधी के दौरे को लेकर राजनीतिक दल अपनी-अपनी बात रख सकते हैं। सरकार उनके सवालों का जवाब दे सकती है और विपक्ष सरकार से जवाब मांग सकता है। लेकिन जब सामने किसी परिवार का व्यक्तिगत दुख हो, तब संवेदना को भी राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं होना चाहिए।
किसी नेता की राजनीतिक मंशा पर सवाल उठाना आपका अधिकार हो सकता है, लेकिन किसी मृतक के परिवार के घर जाकर उनकी पीड़ा सुनने और उन्हें सांत्वना देने की परंपरा को राजनीतिक पर्यटन कहना भारतीयता की उस मूल भावना पर सवाल खड़ा करता है, जिसमें दुख के समय किसी के साथ खड़ा होना सबसे बड़ी मानवीय जिम्मेदारियों में माना गया है।
राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन संवेदना का सम्मान भी उतना ही जरूरी है।