रक्षक ही बना भक्षक कानून का पाठ पढ़ाने वाले पूर्व एसडीओपी पर दुष्कर्म का आरोप

रिटायरमेंट के करीब तीन साल बाद भोपाल से गिरफ्तार; महिला ने शादी का झांसा देकर कई बार दुष्कर्म करने का लगाया आरोप
पांढुर्णा/सौंसर। कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल चुके एक पूर्व पुलिस अधिकारी पर अब उसी कानून के तहत गंभीर आरोप लगे हैं। पांढुर्णा जिले के सौंसर में एसडीओपी के पद पर रह चुके के.के. वर्मा को पुलिस ने भोपाल से गिरफ्तार किया है।
एक महिला ने आरोप लगाया है कि एसडीओपी के पद पर रहते हुए के.के. वर्मा ने उसे शादी का झांसा देकर उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया। पुलिस के मुताबिक, रिटायरमेंट के करीब तीन साल बाद सामने आई शिकायत के आधार पर आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और एससी-एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।
गिरफ्तारी के बाद पुलिस आरोपी को पांढुर्णा लेकर आई और मामले की जांच शुरू कर दी है। मामले में लगाए गए आरोप गंभीर हैं, लेकिन उनकी पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी। फिलहाल पुलिस शिकायत में लगाए गए आरोपों, घटनाक्रम और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच कर रही है।
जिस वर्दी पर भरोसा, उसी पर आरोप
पुलिस की वर्दी को आम नागरिक कानून और सुरक्षा की उम्मीद से जोड़कर देखता है। ऐसे में किसी पूर्व पुलिस अधिकारी पर गंभीर आपराधिक आरोप लगना स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े करता है। हालांकि, आरोपों की सच्चाई का अंतिम निर्धारण न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।
पूर्व एसडीओपी के खिलाफ हुई कार्रवाई इस बात को भी रेखांकित करती है कि पद और जिम्मेदारी समाप्त होने के बाद भी कानून से ऊपर कोई नहीं होता। पुलिस अधिकारी हो या आम नागरिक, किसी भी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत मिलने पर कानून के अनुसार जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
अब जांच में सामने आएगी पूरी तस्वीर
पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जांच के दौरान शिकायतकर्ता के बयान, आरोपों से संबंधित परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों की पड़ताल की जाएगी। इसके बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि जिस अधिकारी ने अपने कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाली, वही अब एक गंभीर आपराधिक मामले में आरोपी के रूप में पुलिस कार्रवाई का सामना कर रहा है। नोट: यह समाचार पुलिस में दर्ज शिकायत, गिरफ्तारी और लगाए गए आरोपों पर आधारित है।
आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अथवा न्यायिक रूप से दोष सिद्ध होना अभी बाकी है। आरोपी को दोषी ठहराने का अंतिम अधिकार न्यायालय का है।