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रसरंग में मायथोलॉजी:जीवन, समय और ब्रह्मांड को देखने की ऐसी है भारतीय दृष्टि

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 18 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
रसरंग में मायथोलॉजी:जीवन, समय और ब्रह्मांड को देखने की ऐसी है भारतीय दृष्टि

यह समझाने के लिए कि ब्रह्मांड में हर प्रजाति के लिए समय का अनुभव अलग होता है, हिंदू पुराणों में समय की विशालता को कुछ इस तरह व्यक्त किया गया है : मनुष्यों का संपूर्ण जीवनकाल इंद्र की एक पलक झपकने के बराबर है, इंद्र का संपूर्ण जीवनकाल ब्रह्मा की एक पलक झपकने के बराबर, ब्रह्मा का संपूर्ण जीवनकाल विष्णु की एक पलक झपकने के बराबर, विष्णु का संपूर्ण जीवनकाल शिवजी की एक पलक झपकने के बराबर और शिवजी का संपूर्ण जीवनकाल देवी की एक पलक झपकने के बराबर है।

चूंकि सभी जीवों की उत्पत्ति देवी से हुई है, इसलिए कोई नहीं जानता कि देवी का जीवनकाल कितना लंबा है। विभिन्न प्राणियों के बल की तुलना करने के लिए जैन ग्रंथों में भी इसी तरह की एक व्यवस्था मिलती है: बारह योद्धा एक वृषभ के बराबर बलवान होते हैं, दस वृषभ एक अश्व के बराबर, बारह अश्व एक महिष के बराबर, पंद्रह महिष एक गज के बराबर और पांच सौ गज एक सिंह के बराबर बलवान होते हैं।

दो हजार सिंह एक शरभ (आठ पैरों वाला मांसाहारी प्राणी) के बराबर, दस लाख शरभ एक बलदेव के बराबर, दो बलदेव एक वसुदेव के बराबर, दो वसुदेव एक चक्रवर्ती के बराबर, एक लाख चक्रवर्ती एक नागराज के बराबर और एक करोड़ नागराज एक इंद्र के बराबर बलवान होते हैं। वहीं, अनगिनत इंद्रों का बल भी एक तीर्थंकर के बल के सामने नगण्य है।

इन कथनों में बड़ा और छोटा होने की धारणाएं निरपेक्ष नहीं, बल्कि तुलनात्मक हैं। हर चीज का आकार, महत्व या सामर्थ्य किसी दूसरी चीज के संदर्भ में ही तय होता है। इस विश्व में हमसे बड़ा या छोटा कोई न कोई हमेशा मौजूद है। मापने और तुलना करने की इसी प्रवृत्ति से मनुष्य में माया उत्पन्न होती है।

वेदों और जैन ग्रंथों में ऐसे विशाल अंकों का उल्लेख मिलता है, जिनका दैनिक जीवन में सामान्यतः कोई उपयोग नहीं होता। उदाहरणार्थ, जैन ग्रंथों में 10 की घात 224 अंक मिलता है (1 के बाद 224 शून्य)। यह मान्यता है कि पहले तीर्थंकर ऋषभनाथ इतने वर्ष पहले जीवित थे। दैनिक जीवन में उपयोग न होने वाले ऐसे विशाल अंकों की गणना करना इस बात का संकेत है कि इन धर्मों में अनंत की धारणा समझाने का प्रयास हो रहा था।

हम सीमित जीव हैं जो असीम विश्व में रहते हैं। हमें यह बात कभी भूलनी नहीं चाहिए कि हमारे ऊपर और हमारे नीचे कोई न कोई हमेशा होता है। हम शून्यता से लेकर अनंतता तक फैले सांतत्य (निरंतरता) में जीते हैं। सांतत्य, तुलनात्मक बल और विशाल संख्याओं की अवधारणाओं ने भारतीय सृष्टिशास्त्र और गणित, दोनों में योगदान दिया है।

भारतीय और पाश्चात्य चिंतन के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि पाश्चात्य सोच में मान्यता थी कि विश्व सीमित और निर्धारित है। उसमें विशाल अंक और माप नहीं होते हैं। संभवतः यही अंतर दोनों परंपराओं में निश्चितता और अनिश्चितता के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोणों को समझने में मदद करता है। भारतीय विश्वदृष्टि हमें अनिश्चितता और अप्रत्याशित घटनाओं के बीच अपने अस्तित्व को समझने का एक नजरिया देती है।

भारतीय विश्वदृष्टि में असंख्य संख्याओं के साथ-साथ ऐसी चीजों की भी कल्पना है, जिन्हें पूरी तरह गिना या मापा नहीं जा सकता। इस दृष्टि से जीवन की हर घटना को पहले से निश्चित मानना कठिन है और सब कुछ हमारे नियंत्रण में भी नहीं होता। भगवद्गीता में कर्म करने और उसके फल के प्रति आसक्ति न रखने का संदेश इसी संदर्भ में समझा जा सकता है।

इसके विपरीत, पाश्चात्य विश्वदृष्टि में सीमित अंक हैं और सभी कुछ गणनीय है। इसलिए, उसके अनुसार जीवन में सभी कुछ निश्चित है। गॉड जीवन को पूर्व से तय कर सकते हैं। बाइबिल में कहा गया है, जैसी करनी वैसी भरनी। अनंतता से भरे इस विश्व के सामने हमारा व्यक्तिगत मूल्य नगण्य प्रतीत हो सकता है। बौद्ध धर्म शून्य की समझ प्राप्त करने के लिए आसक्त रहा।

हिंदू धर्म की कुछ धाराओं में परम सत्ता या ब्रह्म में विलीन होने की आकांक्षा दिखाई देती है, जबकि जैन धर्म संख्या-रेखा पर हमारा स्थान ढूंढने के लिए आसक्त है। इसीलिए, सांप-सीढ़ी जैसे खेलों का आविष्कार हुआ, जिनमें सीढ़ियां हमें ऊपर, सौभाग्य की ओर ले जाती और सांप हमें नीचे, विपत्ति की ओर ले जाते।

विश्व के प्रति किसी प्रकार का योगदान करने पर हम ऊपर उठते हैं और उपभोग करने पर हम नीचे गिरते हैं। तीनों धर्म मानते हैं कि हम अपने कृत्यों से उत्पन्न गणित अर्थात अपने कर्म के खाते के आधार पर अनगिनत बार जन्म लेते हैं। हमें डर होता है कि अनगिनत, उदासीन अंकों की इस भूल भुलैया में हमें कोई मान्यता नहीं देगा।

और इसी डर से हम अपना झूठा मूल्य निर्धारित करते हैं : हमारा अहम्।

📡 स्रोत: NewsData.io

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