राष्ट्रपति से सम्मानित होंगी बिहार की 2 शिक्षिकाएं,जानिए इनकी कहानी:बोरे पर बैठाकर बच्चों को पढ़ाती थीं, आज 3D-QR कोड से क्लास; पढ़िए कैसे बदली स्कूल की तस्वीर
“यह मेरे लिए बहुत खुशी और गर्व का पल है। लंबे समय तक मेहनत और लगन से काम करने के बाद आज मुझे यह सम्मान मिलने जा रहा है। सच है कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।
मैं इस उपलब्धि को पूरे बिहार, बिहार की बेटियों और खासकर गोपालगंज के लोगों को समर्पित करती हूं।” राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए सिलेक्ट हुईं गोपालगंज की टीचर पुष्पा प्रसाद ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत में यह बात कही। वहीं, बांका की टीचर खुशबू का कहना है, “मैं चुनौतियों से डरने की जगह उन्हें अपनी ताकत मानती हूं।
मेरे स्कूल में जॉइन करने से पहले जहां 10 बच्चे प्रजेंट होते थे, तो वहीं 5 महीने बाद उनकी आबादी 50% से ज्यादा बढ़ गई थी। मेरे लिए यह बदलाव सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि बच्चों और पेरेंट्स के बढ़ते विश्वास की कहानी है। बता दें बिहार की दो बेटियां नेशनल टीचर अवॉर्ड 2026 के लिए सिलेक्ट हुईं हैं।
गोपालगंज के कुचायकोट प्रखंड के राजकीय कन्या मध्य विद्यालय की सहायक शिक्षिका पुष्पा प्रसाद और बांका के उर्दू प्राथमिक विद्यालय, बिदायडीह की प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी इसमें शामिल हैं। दोनों को 5 सितंबर यानी टीचर्स डे के मौके पर नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु उन्हें सम्मानित करेंगी।
अब एक-एक कर दोनों टीचर्स की कहानी इस खबर में पढ़िए... पुष्पा बच्चों को कैसे पढ़ाती हैं, इसकी तस्वीरें देखिए... जब बोरे पर बैठे बच्चे दिखे, तब शुरू हुआ बदलाव दैनिक भास्कर से खास बातचीत में पुष्पा प्रसाद ने अपनी लाइफ के बारे में खुलकर बात की है। उन्होंने कहा, यह मेरे लिए बहुत खास और खुशी का पल है।
बार-बार अटेम्प्ट और मेहनत करने के बाद मैं यहां तक पहुंची हूं। कहा जाता है कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती है, आज उसका रिजल्ट सबके सामने है। मैं यह सम्मान पूरे बिहार, बिहारवासियों, बिहार की बेटियों और खासकर गोपालगंज के लोगों को समर्पित करती हूं। मेरे लिए ये अवॉर्ड सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है।
मैं इसे अपने बच्चों, साथी टीचर्स और पेरेंट्स सभी की सफलता मानती हूं। पुष्पा ने बताया, टीचिंग के शुरुआती दौर में जब मैंने बच्चों को जमीन पर बोरा बिछाकर पढ़ते देखा तो मेरे मन में यह सवाल आया कि आखिर इन बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से कैसे जोड़ा जाए।
मेरा मानना था कि बच्चों की स्थिति के लिए बच्चों को दोष देना सही नहीं है। असली जरूरत पेरेंट्स को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक करने की थी। इसके बाद मैंने स्कूल में हमेशा पैरेंट्स-टीचर मीटिंग शुरू कर दी। इस दौरान मैं पेरेंट्स से बातचीत करती थी। उन्हें बच्चों की पढ़ाई में भागीदार बनाने का प्रयास किया।
पुष्पा कहती हैं, मेरा मानना है कि मां बच्चे की पहली गुरु होती है। अगर मां शिक्षित और जागरूक होगी तो पूरा परिवार एजुकेटेड होगा और परिवार शिक्षित होगा तो समाज भी पढ़ा-लिखा होगा। धीरे-धीरे इसका असर स्कूल में दिखाई देने लगा। पेरेंट्स बच्चों की पढ़ाई को लेकर ज्यादा सीरियस हुए और बच्चों की स्कूल में प्रेजेंस बढ़ गई।
चॉक-ब्लैकबोर्ड से आगे निकली पढ़ाई, खेल बना जरिया पुष्पा की पढ़ाई का स्टाइल बहुत अलग था। उसकी सबसे बड़ी खासियत यही है कि उन्होंने बच्चों को सिर्फ किताब पढ़ाने की जगह खेल-खेल में शिक्षा को अपनाया। इस दौरान मैंने एहसास किया कि बच्चे खेल में ज्यादा इंट्रेस्ट लेकर पढ़ते हैं।
ऐसे में मैंने खेल और एक्टिविटी को पढ़ाई का हिस्सा बना दिया। बच्चे खेल में ज्यादा रुचि रखते हैं। मैंने सोचा कि जब खेल में ही उनकी रुचि है तो क्यों न खेल-खेल में उन्हें शिक्षा दी जाए। मैं रोज नए कॉन्सेप्ट और अलग-अलग एक्टिविटी के जरिए बच्चों को पढ़ाती हूं।
हार्ड सब्जेक्ट को छोटे-छोटे प्रयोगों के जरिए आसान बनाने का प्रयास करती हैं। अगर बच्चे रोज क्लास में आएं, चॉक-ब्लैकबोर्ड पर लिखी चीज देखें और उसे याद करने की कोशिश करें तो कुछ समय बाद पढ़ाई उन्हें बोझ लग सकती है, इसलिए मैंने बच्चों की बोरियत दूर करने के लिए लगातार नए प्रयोग किए।
टीएलएम से लेकर 3D और QR कोड तक प्रयोग पुष्पा प्रसाद ने बताया, मैंने टीचिंग-लर्निंग मटीरियल यानी TLM का क्रिएटिव इस्तेमाल किया है। मैंने एक्टिविटी बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा जोर दिया है।
मेरे इनोवेशन में पेड़ों पर QR कोड और 3D वीडियो जैसे प्रयोग भी शामिल किए हैं, इसका उद्देश्य बच्चों को सब्जेक्ट से जोड़ना और सीखने को ज्यादा इंट्रेस्टिंग बनाना है। यानी जिस चीज को बच्चे सामान्य तौर पर सिर्फ किताब में पढ़ते, मैं उसे एक्टिविटी और प्रयोग के जरिए सामने लाने की कोशिश करती हूं।
मेरा मानना है कि अच्छी शिक्षा का मतलब सिर्फ सिलेबस पूरा करना नहीं, बल्कि बच्चे को सब्जेक्ट समझाना है। ‘संसाधन नहीं हैं’ कहकर कभी नहीं रुकीं पुष्पा ने आगे बताया, सरकारी स्कूलों में अक्सर संसाधनों की कमी को चुनौती माना जाता है। मैंने इसी चुनौती को अपने लिए प्रयोग का अवसर बना लिया।
मैंने कभी संसाधनों की कमी का रोना नहीं रोया। जो उपलब्ध था, उसी से बच्चों के लिए नया करने की कोशिश की। मेरा फोक्स जीरो इंवेस्टमेंट इनोवेशन पर रहा है। यानी ऐसे प्रयोग, जिनमें ज्यादा पैसा खर्च किए बिना बच्चों को बेहतर तरीके से पढ़ाया जा सके।
मैंने स्पेशल चाइल्ड बच्चों को शिक्षा के मेनस्ट्रीम से जोड़ने के लिए भी काम किया है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए ब्रेल लिपि में टीचिंग मटेरियल तैयार करने का भी प्रयास किया गया।
जिन बच्चों को ज्यादा सहयोग की जरूरत होती है, उन पर अलग से ध्यान दिया जाता है, ताकि वे स्कूल से दूर न हों और सीखने की प्रक्रिया में पीछे न छूटें। पुष्पा ने आगे बताया, मैं फ्री टाइम और छुट्टियों में भी स्कूल पहुंचकर बच्चों के लिए एक्टिविटी रखती हूं और उन्हें पढ़ाती हूं।
खासकर छात्राओं को पेंटिंग और दूसरी को-कुलर एक्टिविटी से जोड़ने पर भी काम करती हूं। मेरा मानना है कि स्कूल की पढ़ाई सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बच्चों की रचनात्मक क्षमता को सामने लाना भी शिक्षक की जिम्मेदारी है।
पति को मानती हैं सफलता का सबसे बड़ा राज पुष्पा प्रसाद अपनी सफलता का सबसे बड़ा श्रेय अपने पति बाल्मीकि प्रसाद को देती हैं। साल 2004 में उनकी शादी पटना के बाढ़ के घोसवारी पंचायत निवासी बाल्मीकि प्रसाद से हुई थी। उनके पति खुद एक टीचर हैं।
पुष्पा कहती हैं, कहा जाता है कि हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है, लेकिन मैं गर्व के साथ कहती हूं कि मेरी सफलता का राज मेरे पति हैं। उनके सहयोग के बिना मैं यहां तक नहीं पहुंचती।
परिवार की जिम्मेदारियों के बीच स्कूल और बच्चों के लिए लगातार काम करना आसान नहीं था, लेकिन पति के सहयोग और प्रोत्साहन ने मुझे आगे बढ़ने की ताकत दी। वहीं, बाल्मीकि प्रसाद ने कहा, पुष्पा ने स्कूल में सिर्फ एक टीचर के रूप में काम नहीं किया, बल्कि बच्चों के साथ पेरेंट्स और मां जैसा व्यवहार किया।
यह उपलब्धि पूरे बिहार, खासकर कुचायकोटा और गोपालगंज के लिए गर्व की बात है। जिन इलाकों में शिक्षा की लौ तक नहीं पहुंची थी, वहां बच्चों के बीच रहकर पुष्पा ने लगातार काम किया। स्कूल के कई बच्चे बहुत ही ज्यादा पिछड़े ग्रामीण इलाकों से आते हैं। उनके पेरेंट्स में भी शिक्षा को लेकर जागरूकता की कमी थी।
ऐसे परिवारों तक पहुंचकर बच्चों को स्कूल से जोड़ना पुष्पा के काम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। 2006 से शिक्षण सफर, 2013 से कन्या मध्य विद्यालय में सेवा पुष्पा प्रसाद ने साल 2006 में टीचिंग में अपना करियर शुरू किया था। इसके बाद 25 मार्च 2013 से राजकीय कन्या मध्य विद्यालय, कुचायकोट में अपनी सेवाएं दे रही हैं।
इस लंबे सफर में उन्होंने लगातार नए प्रयोग किए। उनकी पहचान धीरे-धीरे जिला और राज्य स्तर पर बनी और अब वह राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गई हैं। उनके पिता रघुनंदन प्रसाद एयरफोर्स में कार्यरत थे। इसी वजह से पुष्पा की शुरुआती पढ़ाई केंद्रीय विद्यालय में हुई।
पिता के तबादले के बाद उन्होंने हरियाणा के नजफगढ़ से 10वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी की। बता दें कि पुष्पा शुरुआत से टीचर नहीं बनना चाहतीं थीं। उनका सपना कंप्यूटर सेंटर खोलने का था। बाद में पति के प्रोत्साहन से उन्होंने टीचिंग लाइन को करियर के रूप में अपनाया। अब बांका की खुशबू कुमारी की कहानी...
अगर पुष्पा प्रसाद ने बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाने का तरीका अपनाया, तो बांका की खुशबू कुमारी ने सॉन्ग, डांस और मनोरंजक गतिविधियों को अपनी क्लास की ताकत बना दिया।
बांका के उर्दू प्राथमिक विद्यालय, बिदायडीह की प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी ने पिछड़े और अल्पसंख्यक बहुल इलाके के बच्चों में पढ़ाई के प्रति इंट्रेस्ट पैदा करने के लिए पारंपरिक तरीकों से अलग प्रयोग किए। उनकी क्लास में छोटे बच्चे सिर्फ किताब खोलकर नहीं बैठते। उन्हें गानों, डांस, एक्टिविटी और टीएलएम के जरिए पढ़ाया जाता है।
इन सारे मेहनत का असर हुआ कि अब ज्यादातर बच्चे क्लास में प्रेजेंट होने लगे। 27 जुलाई 2025 को स्कूल पहुंचीं तो सामने थी अलग चुनौती खुशबू कुमारी ने 27 जुलाई 2025 को उर्दू प्राथमिक विद्यालय बिदायडीह में प्रधान शिक्षिका के रूप में योगदान दिया।
स्कूल की स्थिति और बच्चों के सीखने के माहौल को समझने के बाद उन्होंने तय किया कि पढ़ाई को बच्चों के लिए बोझ नहीं बनने देना है। खुशबू ने बताया, बिदायडीह जैसे पिछड़े इलाके में बच्चों को लगातार स्कूल लाना और उन्हें पढ़ाई से जोड़े रखना बड़ी चुनौती थी। मैंने इस खेल की शुरुआत बच्चों के इंट्रेस्ट समझने से की।
बच्चे गाना सुनना पसंद करते थे, खेलना पसंद करते थे और एक्टिविटी में ज्यादा पार्ट लेते थे। खुशबू ने इसी को पढ़ाई का आधार बना लिया। गाने-डांस से बच्चों को सिखाया अल्फाबेट्स खुशबू ने बताया, छोटे बच्चों के लिए लेटर्स और शब्द याद करना कई बार मुश्किल होता है। मैंने इस मुश्किल को मनोरंजक बना दिया।
ककहरा सिखाने के दौरान गाने और डांस को शामिल किया। बच्चे ताल के साथ लेटर्स दोहराते, एक्टिविटी में पार्ट लेते और सीखते। इससे क्लास का माहौल बदल जाता था। जहां बच्चा पहले पढ़ाई से बचने की कोशिश करते थे, वहीं अब एक्टिविटी पर बेस्ड क्लास में वो खुद पार्ट लेने लगे थे।
इस दौरान मेरे पढ़ाई करवाने वाले वीडियो भी यूट्यूब पर फेमस हो गए। खुशबू ने आगे कहा, मेरा मानना है कि छोटे बच्चों को सिर्फ लिखकर और पढ़कर नहीं सिखाया जा सकता। उन्हें देखकर, सुनकर, बोलकर और एक्टिविटी में हिस्सा लेकर सीखने का मौका देना जरूरी है, इसीलिए मैंने अपनी क्लास में इंटरटेंमेंट एक्टिविटी को शामिल किया।
बच्चों को ग्रुप में काम करने, बोलने और अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका दिया। मेरी कोशिश थी कि बच्चे स्कूल आने को मजबूर हो जाएं। ‘पढ़ाई बच्चों के लिए बोझ नहीं, खुशी होनी चाहिए’ खुशबू ने बताया, मेरे इस तरह से प्रयोगों का सबसे बड़ा असर बच्चों की स्कूल प्रेजेंस में देखने को मिला।
स्कूल से जुड़े अधिकारियों और रिपोर्ट्स के मुताबिक बच्चों की उपस्थिति 90 फीसदी से ज्यादा पहुंची। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ा नहीं था। इसका मतलब था कि बच्चे लगातार स्कूल आने लगे और क्लास में पार्ट लेने लगे हैं। मेरी कोशिश थी कि बच्चों के लिए स्कूल ऐसी जगह बने जहां पढ़ाई के साथ मुझे आनंद भी मिले।
नेशनल टीचर अवॉर्ड के लिए सिलेक्ट होने के बाद खुशबू कुमारी ने कहा, काम को सम्मान मिलता है तो खुशी के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है। बच्चों को बेहतर तरीके से पढ़ाने और उनके चेहरे पर सीखने की खुशी देखने से मुझे हमेशा प्रेरणा मिली। मेरे लिए इस अवॉर्ड के लिए सिलेक्ट होना सपने से सच होने जैसा है।
मैं ये उपलब्धि अपने स्कूल के बच्चों, परिवार, सहयोगियों और खासकर पति को समर्पित करती हूं। पति भी शिक्षक, परिवार ने दिया पूरा साथ खुशबू कुमारी मूल रूप से कटोरिया प्रखंड के राधानगर की रहने वाली हैं। उनके पति मनीष कुमार आनंद भी टीचर हैं और बांका में न्यू प्राथमिक विद्यालय, कोला में प्रधान शिक्षक के पद पर पोस्टेड हैं।
खुशबू कहती हैं, मेरे सफर में परिवार और पति का सहयोग महत्वपूर्ण रहा। ट्रेनिंग को नौकरी की जगह मिशन की तरह करने में परिवार का समर्थन मेरे लिए ताकत बना। खुशबू के काम को राष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ पुरस्कार से ही पहचान नहीं मिलेगी।
मिनिस्ट्री ऑफ एजुकेशन की तरफ से उनके काम पर शॉर्ट फिल्म तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। इसके लिए मिनिस्ट्री ऑफ एजुकेशन के अंदर मिनी रत्न PSU EdCILइंडिया लिमिटेड को जिम्मेदारी दी गई है। फिल्म निर्माण से जुड़ी टीम उनके स्कूल पहुंचकर उनके पढ़ाने के तरीके और काम को रिकॉर्ड करेगी।
यानी बिदायडीह के छोटे से स्कूल की कहानी अब देशभर में दिखाई जाएगी। 5 सितंबर को राष्ट्रपति के हाथों सम्मान दोनों ही टीचर राष्ट्रीय मंच पर बिहार को रिप्रजेंट करेंगी। 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित करेंगी।
पुष्पा के लिए यह पुरस्कार उनकी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि नई जिम्मेदारी की शुरुआत है। उनका कहना है कि सम्मान मिलने के बाद भी उनका सबसे बड़ा लक्ष्य वही रहेगा- ग्रामीण और कमजोर जगह से आने वाले बच्चों को बेहतर शिक्षा देना।
📡 स्रोत: NewsData.io