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रायपुर एयरपोर्ट की जमीन का किसान ने ₹13000 करोड़ मांगा:पहले ₹3500 करोड़ क्लेम किया, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तहसीलदार करेगा अंतिम फैसला

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 22 अगस्त 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
रायपुर एयरपोर्ट की जमीन का किसान ने ₹13000 करोड़ मांगा:पहले ₹3500 करोड़ क्लेम किया, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तहसीलदार करेगा अंतिम फैसला

रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पर मालिकाना हक का दावा करने वाले किसान अश्विनी बांधे की कानूनी लड़ाई अब फैसले की ओर बढ़ रही है। 2018 तक करीब 3500 करोड़ रुपए का दावा करने वाले बांधे ने अब अपना क्लेम बढ़ाकर 13 हजार 173 करोड़ रुपए कर दिया है।

उनका कहना है कि यह राशि 1942 में जमीन के रिक्विजिशन (अस्थायी कब्जे में लेना) से लेकर अब तक के लीज अमाउंट, रिवाइज्ड कंपनसेशन और उस पर देय राशि की गणना के आधार पर तय की गई है। बता दें कि अश्विनी बांधे ने स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और गार्डन की जमीन को अपने पूर्वजों की बताया है।

सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश के बाद मामले में नया मोड़ आया है। कोर्ट ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड और दस्तावेजों की दोबारा जांच कर यह पता लगाने को कहा है कि जमीन रिक्विजिशन से पहले किसके नाम दर्ज थी। पुराने रिलीज ऑर्डर और जांच रिपोर्ट को भी देखा जाएगा।

अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार तहसीलदार को मामले में अंतिम आदेश देना है। कहानी की शुरुआत 1942 के युद्धकालीन अधिग्रहण से 53 साल के किसान अश्विनी बांधे का दावा है कि उनके पूर्वजों की जमीन को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने सैन्य जरूरतों के लिए अस्थायी तौर पर अपने कब्जे में लिया था।

उस समय डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत देशभर में सैन्य प्रतिष्ठानों और एयरफील्ड के लिए बड़ी मात्रा में जमीन रिक्विजिशन की गई थी। इसी प्रक्रिया के तहत रायपुर के माना एयरफील्ड के लिए भी जमीन ली गई। बांधे के मुताबिक, उनके पूर्वजों की करीब 30 एकड़ 18 डिसमिल जमीन भी इसी प्रक्रिया में ली गई थी।

उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक जमीन के बदले 1300 रुपए प्रति एकड़ प्रतिमाह के हिसाब से राशि तय की गई थी। उनका कहना है कि यह जमीन स्थायी रूप से सरकार को नहीं दी गई थी, बल्कि युद्धकालीन जरूरत खत्म होने के बाद इसे वापस किया जाना था। लेकिन युद्ध खत्म होने और देश की आजादी के बाद भी जमीन परिवार को वापस नहीं मिली।

यहीं से परिवार की लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई। 1978 और 1987 में जमीन को रिक्विजिशन से रिलीज करने के आदेश जारी हुए, जबकि 1985 में रक्षा मंत्रालय ने उपयोग में नहीं आने वाली जमीन लौटाने के निर्देश दिए। इसके बावजूद परिवार को जमीन का कब्जा नहीं मिला और 2003 में अश्विनी बांधे ने कानूनी लड़ाई शुरू की। 2026 में मामला हाईकोर

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

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