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सदियों पुरानी परंपरा -‘लाह’

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 5 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
सदियों पुरानी परंपरा -‘लाह’

मशीनों के दौर में भी जिंदा है सामूहिक फसल कटाई की सदियों पुरानी परंपरा, एक दिन में 25 से 30 बीघा तक कट जाती है फसल

सांचौर,5अक्टूबर। जिले के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों खेतों में लोकगीतों की गूंज के साथ ‘लाह’ की परंपरा देखने को मिल रही है। “बाजरे रो सोगरो, ग्वार फळी रो साग, सात मिठाई करे जेड़ो है इण किसान रो भाग...” जैसे लोकगीतों के बीच किसान सामूहिक रूप से खरीफ फसलों की कटाई कर रहे हैं। यह परंपरा केवल फसल काटने तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण समाज में आपसी सहयोग, भाईचारे और अपनत्व की भावना को मजबूत करने का माध्यम भी है।

लाह के तहत गांव के किसान एक-दूसरे के खेतों में बिना किसी पारिश्रमिक के सामूहिक रूप से फसल काटने में मदद करते हैं। एक लाह में करीब 40 से 50 किसान शामिल होते हैं और सभी मिलकर एक ही दिन में 25 से 30 बीघा तक खेत की फसल काट देते हैं। सामान्य तौर पर इतनी फसल काटने में कई दिन लग सकते हैं। सामूहिक श्रम की इस परंपरा से किसानों को मजदूरी और अन्य अतिरिक्त खर्च से भी राहत मिलती है।

इन दिनों खेतों में बाजरी, मोठ, मूंग, तिल और ग्वार जैसी खरीफ फसलों की कटाई चल रही है। लाह के दौरान खेतों में काम का माहौल किसी उत्सव से कम नहीं होता। किसान गीत गाते हुए मिल-जुलकर फसल काटते हैं और पूरे दिन सामूहिक श्रम के साथ आपसी मेलजोल भी बढ़ता है। लाह के दिन किसानों के लिए पारंपरिक मारवाड़ी भोज का भी आयोजन किया जाता है। किसान अपने साथियों के लिए भोजन की व्यवस्था करते हैं, जबकि महिलाएं बाजरे की रोटी और ग्वार फली का साग तैयार करती हैं। बाजरे का सोगरा, देसी घी और ग्वार फली का साग इस पारंपरिक भोज का प्रमुख हिस्सा होता है।

आधुनिक दौर में जहां फसलों की कटाई के लिए मशीनों का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है, वहीं ग्रामीण अंचलों में लाह की परंपरा आज भी जीवित है। यह परंपरा ग्रामीण जीवन की सामूहिकता और श्रम संस्कृति को दर्शाती है। लाह केवल खेतों में फसल काटने की परंपरा नहीं, बल्कि दिलों की दूरी मिटाने और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने का अवसर भी है। हर फसल के साथ यह परंपरा ग्रामीण समाज को यही संदेश देती है कि मिल-जुलकर किया गया श्रम न केवल काम को आसान बनाता है, बल्कि समाज में एकता, अपनापन और भाईचारा भी कायम रखता है।

1)नरेश कुमार - किसान

2)ओमी देवी - महिला किसान

3)रायचंद बिश्नोई - किसान

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।