सहारनपुर कलेक्ट्रेट की 116 साल पुरानी मस्जिद को अवैध बताकर ढहाया गया, भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे की खामोशी कई सवाल खड़े करती है
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सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की करीब 116 साल पुरानी मस्जिद को ढहा दिया गया। प्रशासन की ओर से इसे सरकारी जमीन पर बना अनधिकृत निर्माण बताया गया है और अदालत की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कार्रवाई किए जाने की बात कही गई है। मामला अब सिर्फ एक धार्मिक स्थल के ध्वस्तीकरण तक सीमित नहीं है।
मस्जिद के इतिहास, जमीन के पुराने रिकॉर्ड, अदालत में चली प्रक्रिया और सबसे बढ़कर कार्रवाई के समय को लेकर कई सवाल सामने आ रहे हैं। मस्जिद पक्ष की ओर से दावा किया गया है कि याकूब खान और वालिद खान ने वर्ष 1911 में इस मस्जिद का निर्माण कराया था।
बाद में उन्होंने कलेक्ट्रेट और सरकारी कार्यालयों के निर्माण के लिए अपनी जमीन का एक हिस्सा दे दिया था। अगर यह दावा पुराने दस्तावेजों से सही साबित होता है, तो इस पूरे इतिहास को सामने रखना जरूरी है।
जिस जमीन पर आज सरकारी इमारतें खड़ी हैं, उसका अतीत क्या है और उस समय जमीन के मालिकों और सरकार के बीच क्या व्यवस्था हुई थी, यह जानना भी इस विवाद को समझने के लिए जरूरी है। दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि मस्जिद सरकारी जमीन पर बनी थी और इसे अनधिकृत निर्माण माना गया। यानी इस मामले में दोनों पक्षों के दावे अलग हैं।
ऐसे में पुराने राजस्व रिकॉर्ड और दूसरे दस्तावेज ही यह तय करने में मदद कर सकते हैं कि जमीन और मस्जिद की वास्तविक स्थिति क्या थी। इसलिए प्रशासन को चाहिए कि वह पूरे मामले से जुड़े दस्तावेज और कार्रवाई का आधार सार्वजनिक करे, ताकि लोगों के सामने पूरी तस्वीर साफ हो सके।
लेकिन इस मामले में सबसे ज्यादा सवाल कार्रवाई के समय को लेकर उठ रहे हैं। मस्जिद को गिराने की कार्रवाई सुबह करीब 5 बजे शुरू की गई। आखिर इतनी सुबह कार्रवाई करने की जरूरत क्यों पड़ी? अगर अदालत की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और प्रशासन के पास कार्रवाई का कानूनी आधार मौजूद था, तो दिन निकलने तक इंतजार करने में क्या परेशानी थी?
क्या प्रशासन को किसी विरोध की आशंका थी या कानून-व्यवस्था को लेकर कोई विशेष वजह थी? अगर ऐसी कोई वजह थी तो उसे भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यहां एक बात साफ है कि अदालत का फैसला अपनी जगह है और उसका सम्मान होना चाहिए। अगर अदालत ने प्रशासन के पक्ष में फैसला दिया है तो उसके आधार पर कार्रवाई की जा सकती है।
लेकिन अदालत का फैसला आने के बाद प्रशासन ने कार्रवाई किस तरीके से की, इस पर सवाल पूछना भी गलत नहीं है। सुबह पांच बजे किसी धार्मिक स्थल को गिराने का फैसला क्यों लिया गया, यह सवाल प्रशासन से पूछा जाना चाहिए।
किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी कार्रवाई में सिर्फ कानूनी प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि प्रशासन का तरीका भी महत्वपूर्ण होता है। अगर कार्रवाई कानून के मुताबिक थी तो उसे लेकर पूरी जानकारी सार्वजनिक करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। इससे अफवाहों और गलतफहमियों की गुंजाइश भी खत्म होगी।
इस पूरे मामले में भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे की खामोशी भी कई सवाल खड़े करती है। आखिर अल्पसंख्यक मोर्चा किसलिए है?
क्या उसकी भूमिका सिर्फ चुनाव के समय मुसलमानों के बीच जाकर पार्टी की नीतियां बताने तक सीमित है या फिर जब किसी अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ा वास्तविक और संवेदनशील मामला सामने आए तो वह अपनी ही सरकार और प्रशासन से सवाल भी करेगा?
अगर मस्जिद को अवैध माना गया है तो अल्पसंख्यक मोर्चा प्रशासन से यह पूछ सकता था कि इसके पुराने दस्तावेज क्या कहते हैं। जमीन के रिकॉर्ड को लेकर विवाद है तो उसकी स्थिति साफ करने की मांग की जा सकती थी। अदालत की प्रक्रिया को लेकर कोई सवाल है तो उसकी जानकारी जनता के सामने रखने की बात कही जा सकती थी।
और सबसे महत्वपूर्ण, सुबह 5 बजे हुई कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाया जा सकता था। लेकिन इस मामले में जिस तरह की खामोशी दिखाई दे रही है, उससे यह सवाल तो उठेगा ही कि अल्पसंख्यक मोर्चा आखिर किसकी आवाज है। सत्ता के साथ खड़ा होना आसान है, लेकिन अपनी ही सरकार और प्रशासन से सवाल पूछना मुश्किल होता है।
किसी राजनीतिक संगठन की असली परीक्षा भी ऐसे ही वक्त में होती है। यहां यह कहना भी जरूरी है कि अगर कोई निर्माण वास्तव में अवैध है तो सिर्फ धार्मिक स्थल होने के कारण उसे कानून से अलग नहीं रखा जा सकता। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। लेकिन बराबर कानून का मतलब यह भी है कि कार्रवाई पूरी प्रक्रिया और पारदर्शिता के साथ हो।
किसी पुराने धार्मिक स्थल को हटाने के मामले में प्रशासन को यह बताना चाहिए कि उसके पास क्या रिकॉर्ड हैं और कार्रवाई किस आधार पर की गई। सहारनपुर की इस मस्जिद को लेकर 1911 में निर्माण, याकूब खान और वालिद खान की जमीन तथा बाद में सरकारी कार्यालयों के लिए जमीन दिए जाने के दावे किए जा रहे हैं।
इन दावों की वास्तविकता पुराने दस्तावेजों से ही सामने आएगी। इसलिए इस इतिहास को राजनीतिक बहस से अलग रखकर रिकॉर्ड के आधार पर देखा जाना चाहिए। लेकिन सुबह 5 बजे की कार्रवाई का सवाल फिर भी अपनी जगह रहेगा। इतनी सुबह कार्रवाई क्यों हुई? क्या कोई विशेष परिस्थिति थी? क्या प्रशासन को विरोध का अंदेशा था?
और अगर सब कुछ सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत था तो दिन के उजाले में कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इन सवालों का जवाब मिलना चाहिए। और भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे को भी अपनी खामोशी तोड़नी चाहिए। क्योंकि मुसलमानों के बीच जाकर राजनीति करना और मुसलमानों के किसी वास्तविक मुद्दे पर उनके साथ खड़ा होना दो अलग बातें हैं।
अगर कोई संगठन खुद को अल्पसंख्यकों की आवाज बताता है तो उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह जरूरत पड़ने पर सत्ता से भी सवाल पूछे। सहारनपुर की मस्जिद अब वहां नहीं है, लेकिन उसके इतिहास और उसे गिराए जाने के तरीके को लेकर सवाल अभी बाकी हैं।
प्रशासन को इन सवालों का जवाब देना चाहिए और भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे को भी यह तय करना चाहिए कि वह सिर्फ चुनावी राजनीति का हिस्सा है या वास्तव में अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर अपनी आवाज उठाने की जिम्मेदारी भी समझता है।